“व्यवहारिक अनुभव ज्ञान केर भंडार।”

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— कीर्ति नारायण झा।       

“बौआ पढलनि तऽ मुदा गुनलनि नहिं” अर्थात पढाई मात्र कयला सँ सम्पूर्ण गुण प्राप्त भेनाइ सम्भव नहि अछि अपितु ओकरा ब्यवहार में आनि ओकरा सम्पूर्णता प्रदान कयल जा सकैत अछि नहिं तऽ ओहि महात्मा जी के सुगा जकाँ सुगा सभ रटि लेने छल जे “शिकारी अओताह, जाल बिछाओताह मुदा लोभ सँ ओहि में फँसवाक नहिं अछि” मुदा ब्यवहार में नहिं अनलाक कारणे सभ सुगा सभ जाल में फँसि गेल। एक अन्य कथा केर अनुसार एक दिन एकटा नाव पर चारि टा विद्वान् बैसलाह, नाव चलाओनिहार सेहो बैसि कऽ नाव चलवय लागल। एकटा विद्वान् नाविक सँ पूछलखिन जे अहाँ पढल लिखल छी? जबाब भेटलनि जे नहिं। हम तऽ मात्र नाव चलेनाइ जनैत छी तऽ ओ विद्वान् जबाब देलखिन्ह जे अहाँक चौथाइ जिनगी तऽ ओहिना बरवाद भऽ गेल। दोसर विद्वान् पूछलखिन जे भूगोल जनैत छी? कहू हिमालय पहाड़ कोन दिशा में छै? नाविक उत्तर दैत अछि जे हम भूगोल नहि पढने छी ताहि पर दोसर विद्वान् उत्तर देलखिन्ह जे अहाँ के आधा जिनगी तऽ ओहिना बरवाद भऽ गेल। तैसर विद्वान् पूछलखिन जे इतिहास जरूर पढने होयब। गौतम बुद्ध के जन्म कतय भेल छलैन्ह? नाविक उत्तर दैत अछि जे हम इतिहासो नहिं पढने छी तखन तेसर विद्वान् उत्तर देलखिन्ह जे अहाँ के तीन चौथाई जिनगी तऽ बरवाद भऽ गेल। तावत नदी मे तूफान आबि गेलै आ नाव डगमगाय लगलै, नाविक पूछलकै जे अहाँ सभके हेलअ अबैत अछि ने? बुझाइत अछि जे हमर नाव डूबि जाएत। चारू विद्वान् उत्तर देलखिन्ह जे हमरा सभके हेलअ नहिं अबैत अछि। नाविक उत्तर दैत अछि जे जँ हेलअ नहिं अबैत अछि तऽ अहाँ सभक सम्पूर्ण जीवन बेकार अछि आ सएह भेवो कएल। चारू विद्वान् डूबि गेलाह आ नाविक हेलि कऽ बाहर आबि गेल। कहवाक तात्पर्य ई जे ब्यवहारिक ज्ञान पुस्तक के ज्ञान सँ श्रेष्ठ होइत छैक। ब्यवहारिक ज्ञान के विषय में रामकृष्ण परमहंस लिखने छैथि जे धिया पूता ब्यवहारिक ज्ञान के छोड़ि मोट मोट किताब पढैत अछि आ लक्ष्य के प्राप्त करवाक प्रयास करैत अछि, जखन कि विद्या के वास्तविक उद्येश्य की होइत छैक जे ओ नहिं बूझैत अछि। शास्त्र अथवा ग्रंथ ईश्वर धरि पहुँचवाक मार्ग मात्र देखबैत छैक मुदा जँ एक बेर अहाँ ब्यवहारिक रूप सँ ओहिठाम धरि पहुँचवाक सही मार्ग बुझि जाइत छी तऽ शास्त्र अथवा ग्रन्थ के कोनो आवश्यकता नहिं के बराबर पड़ैत छैक आ तखन ब्यवहारिक ज्ञान काज करैत छैक।ब्यवहारिक ज्ञान प्राप्त करवाक लेल कतहु जयवाक काज नहि पड़ैत छैक, परिवारक सदस्य अथवा अड़ोस पड़ोस में सतत् नाना प्रकार के ब्यवहार सभ देखाइत रहैत छैक। अपना सभक ओहिठाम कहल जाइत छैक जे फलां बाबू के धन भेला सँ की हेतैन्ह? ब्यवहार के नाम पर एक खण्ड सुपारी सेहो नहिं देलखिन्ह। ब्यवहार के उदाहरण अपना सभक ओहिठाम सर्वश्रेष्ठ मानल जाइत अछि, पाहुन के दरबज्जा पर पहुँचतहि “आयल जाउ आ पेएर धोल जाउ” पाहुन एतवा कहला पर तृप्त भऽ जाइत छैथि। बिधि आ ब्यवहार के मामला में अपन सभक मिथिला सर्वोपरि अछि। नीक ब्यवहार सँ केहनो ओझराएल काज सोझरा जाइत छैक आ जँ अब्यवहारिकता भेल तऽ सभटा सत्यानाश। नीक ब्यवहार सदैव सफलता केर कुंजी मानल जाइत अछि। एक दोसर आँगन मे सामान आदान प्रदान में वर्तन कखनहु खाली नहिं वापस कयल जाइत छैक अपना सभक ओहिठाम, ई सभ ब्यवहार थिकै आ एहेन अनेको ब्यवहार अपना सभक ओहिठाम दैनिक जीवन में होइत रहैत छैक जे अमूल्य धरोहर अछि मिथिलावासी के लेल..