“सैद्धांतिक शिक्षाक संग प्रायोगिक अत्यंत आवश्यक।”

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— उग्रनाथ झा।     

हमरा लोकनि बाल्यावस्था सऽ सुनैत आबि रहल छि जे मानवीय रचना अपन ज्ञान आ अनुभव सं सर्वोत्कृष्ट मानल गेल अछि। अंत: ज्ञान आ अनुभव अर्जन करबाक लेल सतत अभिभावक लोकनि प्रेरित करैत रहला अछि । बहुत रास एहनो गप्प होईत छैक जे सुनल अथवा पढ़ल बातक चर्च करब त बुढ़ बुढ़ा’नूस कहैत छलाह जे एखन अनुभव नहि छह तै एना बजैत छह। आखिर ई ज्ञान आ अनुभव शब्दक कीं अभिप्राय छैक ?
हमरा जनैत ज्ञान ओ थिक जे लिखित अथवा मौखिक संवाद के व्यक्ति विशेष के अंदर उपलब्ध बौद्धिक क्षमता के विकास में सहायक हो । व्यक्ति विशेषमे ज्ञानक वृद्धि या त पुस्तक पढ़ि’क पुष्ट होएत छैक वा सत्संग स’ । चाहे ज्ञानक भंडार रूपी पुस्तकक अध्ययन सं प्राप्त करी । मौखिक व्याख्यान रूपी भोज में परसल जा वाणी सं प्राप्त करी ।
जखन की अनुभव मानव शरीर में उपस्थित ज्ञानेन्द्रीयक प्रयोग सं बौद्धिक चेतनाक विकास में सहायक होईछ। जतय ज्ञान पथप्रदर्शन में नि:सहाय भऽ जाएछ ओतहि व्यवहारिक अनुभवहि’टा सहायक सिद्ध होईछ।
‌‌ एहि तरहे बहुधा देखबा में अबैछ जे लिखित/मौखिक संवादस’ ज्ञान प्राप्तिक पछाति ओकर व्यवहारिक प्रयोग पर बल देल जा रहल छैक।जौ ओ ज्ञान व्यवहार में नहि आओत त धीरे धीरे ओ ज्ञान प्राप्ति अकर्मण्यता दिश अग्रेस भ जाए छैक। ताहि हेतु शिक्षा दू तरहे बाटल छैक सिद्धांतिक आ व्यवहारिक।
हमरा लोकनिक पुरातन संस्कृति में जे शैक्षनिक आधार छल ओ छल गुरुकुल जाहि ठम पोथि आ व्यवहार आधारित शिक्षा के प्राथमिकता छल । जतय गुरुआचरण के देख शिष्य ओहि सं प्राप्त अनुभवक अनुशरण करैत पोथीक ज्ञान प्राप्त करैत छलाह । जेना संध्या वंदन आ कर्मकांड में मंत्रोच्चार सिखला के उपरान्त करणी (बेबहार) देख’ क’ सिखल जा सकैछ अर्थात ज्ञानेन्द्रीय सं दृश्य अनुभवक आधार । यदि मंत्र रटिए लेब मुदा ओकर करणीक अनुभव नहि होएत त सिखल सभ बेकार । मुदा जौ करणी व्यवहारिक रूपे सिखल हो आ पोथिक अक्षर ज्ञान नहि हो त श्रुतिश्रवण सं मंत्र सिखल जा सकै छै। औठा छाप स्रीगण सभ सीलाई कटाई सिक्की मौनी ईत्यादी सं अनुभव सं करैत छलखिन । इंच टेप के नाप नहि बुझ अबैन त बित आ आंगूर के व्यवहार नाप में करैत आ सटीक आ सुंदर अभिष्ट तैयार करै छलैथ ।
वर्तमान में मैकाले शिक्षापद्धति से हो ओहि व्यवहारिक अनुभव के स्थान देलक अछि। जाहि सैद्धांतिक शिक्षाक संग प्रायोगिक शिक्षा देल जाए छैक । मुदा नैतिक आ समाजिक शिक्षा जरूर ह्रास भेल अछि।हमरा लोकनि अपन अध्ययन के क्रम में अनुभव केने छि जहन किताब के लिखित कथ्य ठिक सं बुझना योग्य नहि होए त ओकरा भिन्न भिन्न दृष्टांतक माध्यमे अथवा कोनो खेल-धुप के सहायता सं स्पष्ट कैल जाएत छल । इएह छल अनुभव आ व्यवहारिक पक्ष।
आम बोल चालक भाषा स्वरूप देखि सकै छि जे पहिलुक महिला वा पुरुष शिक्षा विहिन रहितो अपन नैतिक आ चारित्रिक गुण के आधार पर अपन कीर्ति आ य़श के पतक्खा फहरौबति छलाह । आखिर एहि में हुनक व्यवहारिक अनुभवे त छैक जे घर परिवार आ समाज बीच रहि सिखै छलाह । जाहि समय में घड़ी नहि छल ओहि में समय अनुभव त सुर्य के छाहरि देख पता चलैत छल । आखिर व्यवहारिक अनुभव सं पोथि ज्ञान रहित मनुष्य उत्कृष्टताक शिखर छुबा में सफल रहल ।उदाहरण रूपमे एक सं एक कला सेवी समाज सेवी भेट जेताह जे स्कुलक मुंह नै देखलाह मुदा अनुभव आधार पर एक सं एक उत्कृष्ट सामाजिक कार्य संपादित केलाह । अधिकत्तर समाजिक पारिवारिक कार्य जेकर शिक्षा विद्यालय पाठ्यक्रम में नहि छैक मुदा समाज के हर वर्ग ओहि मे निपुण भेटत जेकर मूल रहस्य ओकरा द्वारा अपन ज्ञानेन्द्रिय के समुचित दोहन करैत अनुभव के आधार पर उपार्जित व्यवहारिक प्रयोग छैक।
एहि आधार पर कहि सकैत छि जे पोथि ज्ञान आवश्यक त छैक मुदा जौ ओहि ज्ञान के अपना जीवनमे उपयोगक व्यवहारिक अनुभवक ज्ञान नहि हो त पोथि ज्ञान विष व्यापिन तीर समान छैक जे कखनो भी घातक भ सकै त अछि ।जेना ऋषि स’ ज्ञान पाबि सुग्गा के श्रूतिज्ञान त भ गेल रहै जे शिकारी आओत जाल ओछाओत खोराकी छिंटत लोभमे फसब नहि। मुदा एहि वाक्य व्यवहारिक पक्ष सं अनजान ओ एहि पांति के गबैत ओ ओहि जाल में फसि गेल छल ।आ अपन प्राण के संकट ग्रस्त लेलक।
तै कहल गेल छै पुस्तक ज्ञानक खान छैक मुदा ओकर सहि व्यवहारिक प्रयोग हो तखन । अन्यथा अर्थक अनर्थ भ सकै छै । तै उपरोक्त आधार देखैत कहल जा सकैछ जे व्यवहारिक अनुभव ज्ञानक प्रमुख स्रोत छैक।