विभूति आनन्द जीक एकटा उपन्यासक अंश”नहियें नबबौ रे जट्टा…”

#उपन्यास_अंश
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                      नहियें नबबौ रे जट्टा…

आब संजय, ओ संजय नहि रहलै. ओ आब शहरुआ भऽ गेलै. तें आब हम नहि, कहाॅंदन मंदिरा ओकर दोस्त भऽ गेलै…
सएह देखियौ जे पुरुखक स्वभाव मे कोना अंतर आबि जाइत छै ! कहाँदन ओकरा जाल मे जहिया सॅं फॅंसलै, पी कऽ बुत्त रहैत छै ! दीन-दुनियाँ सँ कोनो माने-मतलब नहि. आब ओकरा वएह बदलल दुनियाँ नीक लगैत छै ! हम तॅं मोनो नहि पड़ैत हैबै !
सोचैत छी, एकबेर भेंट होइत तँ कहीं हमरा कहने छोड़ि दिअय ! जाधरि गाम पर रहल, आ हमहूँ नानीगाम मे रहैत रही, कहाॅं रहै एहि सभक लति ! पाबनि-तिहार मे पान टा खा लेल करय. से तँ हमरो जिद्द करय ! मुदा ओह, आब तँ कहाँदन गामक नामो तक नहि सूनऽ चाहैत छै !…
आइ रमण भेटा गेल रहय ! बच्चा मे संगे-संगे पढ़ैत रही. आब ओ सेहो पटने मे रहैए. पुछलिऐ तँ कहलक– ‘हँ, देखते रहै छियन ! पर अब ऊ, ऊ कहाॅं रहलखिन, हमरो से जब अनचिन्हारे हो गेलखिन !…’
– ‘ठीक-ठाक छै ने ?’
– ‘हँ, शादियो करलखिन ! पहिलकी धोखा दे देलकन, पर दारूबाज बना के ! बाद मे भाइ सभ लगि-भिड़ के अपन जात-बेरादर मे करा देलखिन, जे कहीं सुधर जयथिन. अब त’ एगो बेटीयो हइन ! पर तैयो पलिवार से कोइ मतलब न…’

सएह, केहन प्रेमिल-हृदय रहय आ केहन भऽ गेल ! कते ‘केयर’ करय ! हमहूँ ओकरा जॅं गलत पर टोकिऐ तॅं मानि गेल करय. सभ कें कहै कहाॅंदन जे हमरा मेधा मे प्राण पलैए…
खैर, हमरो जीवन तँ सएह भऽ गेल ! ठीके कतहु पढ़ने रहिऐ जे अहाँ जकरा सँ प्रेम करब, ओ तॅं नहियें भेटत, मुदा जे भेटत, तकरा सँ कहियो नहि प्रेम हैत !
हमरा तँ तें खैर, दुख आ संघर्षे टा भेटल. मुदा संजय तँ एहि संसारे सँ कोनो मतलब नहि रखने अछि. नीके छै, हमरा जकाँ पीड़ा तँ नहि ने भोगैत अछि !
मुदा हमरा सँ बेसी कायर अछि ओ ! आ तें दुख होइत रहैत अछि. मुदा ओहन दुख भेनहि की !…

दुख होइत अछि जे संजय गाम मे नहि अछि. आ नहि तँ ओकरे मे गाम शेष रहलै. मुदा तैयो हम जाइत रहैत छी. बहुत किछु ओकर ओतऽ छै, आ जे सभ क्यो कें नहि अनुभव भ’ सकैत छै. हम अनुभव करैत छिऐ. आ जे तें हमरा अनेक लाथे बजा लेल करैत अछि गाम. अपन नेनपनक नानी गाम…
सासुर मे रही. कतेक समयक बाद रामदाना बेचऽ बला आयल रहै. आवाज सुनलिऐ, आ कीनि कऽ मँगा लेलिऐ.
फेर तँ संजय मोन पड़िये गेल ! एह, कोना कऽ हम सभ ओहि रामदाना बलाक आबाज सुनिऐ, आ अपन-अपन अंगना सँ निछोहे दौड़ि पड़िऐ ! इहो नहि देखिऐ जे संग मे पाइ अछि, कि नहि…
ओहि दिन नानी रुपैया देलनि आ कहलनि– ‘जो कीन कऽ खा ले ! आ हे, अपन संजैयो के बजा लिहें !’
से हम की जानऽ गेलिऐ जे ओ अपन अंगना सॅं आबि कऽ जेना धपायले अछि, हमर हाथ सॅं रुपैया झपटैत पड़ायल ! हम नानी दिस तकलिऐ, ओ बिहुॅंसि देलक ! हम की करितहुॅं, हारि कऽ ओकर पाछू-पाछू दौड़ि पड़लहुॅं– ‘हे रे संजैया, हमर हिस्सा के पाइ दऽ दे ! ई हमर नानी के देल अइछ ! हम अपन अलगे कीनब, आ अलगे खायब…’
– ‘नइ गे मेधा, बड़काबला पैकेटमे बेसी रहै छै ! तू नइ बुझै छीही. फैदा हेतौ. तैं एक्के टा लै छियौ, ओही मे सऽ दुनू गोटे खायब !’ संजय दौगितो जाय, आ कहितो जाय…
– ‘किए, हम फराके खायब !’
– ‘नइ गे, संगे खयला सऽ प्रेम बढ़ै छै !…’
मुदा हम तॅं बुझलिऐ जे ओ ठकि कऽ बेसी खा लेत. तें फेर कहलिऐ– ‘नइ रे, अँइठ खयला सऽ संस्कार खराप होइ छै. हमरा तोरा संगे नइ खाइ के अइछ…’

आ से अंत मे बात तॅं हमरे रहल. मुदा ओहि झिकातीरी मे रुपैया दू टुकड़ी भऽ गेलै ! मुदा नेनपनक बुद्धि, से दुनू गोटे आधे-आधे रुपैया लेने ओतऽ पहुॅंचल रही. मुदा ओ नहि देलक.
तामस उठि गेल ! घुरि घरपर आबि नानी कें कहलिऐ । मुदा ओ उन्टे तमसा गेलि– ‘तऽ आब खाइ जो ! एतबो ने बुझै जाइ छिही जे फाटल रुपैया नइ चलै छै !’

से रामदाना खाइत संजय बेर-बेर मोन पड़ैत रहल. मुदा आब से कत्तय ! फेर तॅं एक टा कवित्त दिमाग मे नाचि गेल–
‘प्रीतम बसे पहाड़ पर, मैं बसु यमुना तीर ।
अब तो मिलन कठिन हुआ, पाँव पड़े जंजीर !’
मोन भेल, ओकरा ध्यान सँ हटा लैत छिऐ ! अनेरो मोन जहिं-तहिं बौआय लगैए. फेर सोचलिऐ, हमरो तँ घर-परिवार भेल. आब हमहूॅं बच्चा तँ नहि रहलहुँ. फेर जाहि उम्रक अतीत, स्मरण मे अछि, ओ अतीत की फेर घुरि कऽ अओतै !
फेर भेल, आब नानीये गाम रहल कहाॅं ! नानी रहय, ता धरि नानी गाम. मामा-मामीक राज मे जयबो करब कि नहि. मुदा फेर संजय ! आह, से जँ एहन कहियो संयोग बनितय जे एकबेर ओ गाम अबितय, आ हमहूँ रहितहुँ ! आ अनचोके भेंट भ’ जैतय !
मुदा नहि, नानी कहै– ‘जे भाग्य मे नइ रहै छै, प्रेम सेहो ओकरे स’ होइ छै…’
जाह, ओहो प्रेम आखिर केहन प्रेम भेलै ! आकि ओहि मे नानीक अपन कोनो एकान्त पीड़ा तँ ने छलै नुकायल !
आ दुर जो, हमहूँ की-कहाॅं सभ ने सोचऽ लगलिऐ ! मुदा ताही सभहक गुनि-धुनि मे लाइ सेहो खा गेलिऐ, आ स्वादो नहि बुझि सकलिऐ !

आ से आइ कतेक समयक बाद संजय हमर ‘रिक्वेस्ट’ ‘एक्सेप्ट’ कयलक ! हम तुरंत मैसेज कयलिऐ– ‘रे संजैया, तूँ चिन्ह गेलहिन हमरा !’
– ‘नै तँ !…’
हम उदास भऽ गेलहुँ.
फेर मैसेज आयल– ‘अरे मजाक केलियौ ! की बात करै छें ! तोरा अइ जनम की, अगिलो जनम मे चिन्ह लेबौ ! पिछला जनम सऽ तऽ चिन्हते छियौ…’
आ हम क्षणहि मे खुश भऽ गेलिऐ, आ स्माइली स्टीकर सटैत पीठे पर एक टा फोटो पठौलिऐ– ‘देखहिन तऽ संजय जे अइ फोटो मे ई बच्चा सभ केना फटक्का फोड़ै छै ! किछु मोन पड़ै छौ ?’
– ‘हँ गे, ई तऽ अपने सभ के बच्चा के फोटो छौ !’ ओ लिखलक.
– ‘एह कते समय बदलि गेलै, नै ! आ ई जीवनो केहन भऽ गेलै…’
– ‘सुन न, तूॅं रहबीहिन ने एखन गाँव मे ?’
– ‘नै ! नानी बीमार रहय, ओकरे देखऽ आयल रहिऐ…

( एक आम लड़कीक संघर्ष-कथा…)