“मिथिलाक संस्कृति सँ जुड़ल एकटा महान पाबनि अछि ” तिला – संक्रांति”।

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— आभा झा।     

 

मिथिलाक संस्कृति सँ जुड़ल एकटा महान पाबनि अछि ” तिला – संक्रांति”। बच्चामे तिला संक्रांति केर बड़ उत्साह रहैत छल। माँ भोरे-भोर चारि बजे स्नान करयकेँ लेल उठा दैत छल। बाबूजी घूरक इंतजाम पहिने सँ करि कऽ राखैत छलाह। हमसब पाँचो भाई-बहिन स्नान कऽ घूरक चारूकात आगि सेकय लेल बइस जाइत रही। ओकर बाद इंतजार रहैत छल जे चुलौर, तिलबा कखन माँ आनत। कनिक फरीछ होइ तखन माँ चुलौर, तिलबा, तिलकुट प्लेटमे सरिया कऽ हमरा सबकेँ खाइ लेल अनैत छल। एहि पाबनि सँ पहिने चूड़ा कुटेनाइ – चूड़ा भुजनाइ – तिल धोनाइ — सुखेनाइ —– तिलबा बनेनाइ सभक तैयारी एक हफ्ता पहिने सँ शुरू भऽ जाइत छल।
तिला संक्रांति पूरा भारतमे हर्षोल्लासक संग मनाओल जाइत अछि। कुंभकेँ पहिल स्नानक शुरूआत सेहो तिला संक्रांतिक दिन सँ ही शुरू भऽ जाइत अछि। एहि दिन सँ ही प्रयागराजमे शूरू होइ वाला कुंभ महोत्सवक पहिल शाही स्नान शुरू होइत अछि। ज्योतिषशास्त्रक अनुसार, जखन सूर्य धनु राशि सँ निकलि कऽ मकर राशिमे प्रवेश करैत अछि, तखन तिला संक्रांतिक पावन पर्व मनाओल जाइत अछि। एकर संग ही सूर्यकेँ मकर राशिमे प्रवेश करयकेँ संग-संग सूर्य उत्तरायण हुअ लगैत अछि, जकरा बहुत ही शुभ काल मानल जाइत छैक। मानल जाइत अछि कि संक्रांतिकेँ दिन सँ ही वसंत ॠतुक शुरूआत भऽ जाइत अछि, दिन पैघ आ राति छोट हुअ लगैत अछि। जाहि कारण एहि पाबनिकेँ नब ॠतु और मौसमक स्वागतक तौर पर सेहो मनाओल जाइत अछि। माघ मासक संक्रांतिकेँ मकर संक्रांति कहल जाइत अछि। अपन मिथिलामे तिला संक्रांतिक नाम सँ जानल जाइत अछि। एहि दिन सँ सूर्य दक्षिणायण सँ निकलि कऽ उत्तरायणमे प्रवेश करैत अछि। शास्त्रक अनुसार, उत्तरायणकेँ समय अवधिकेँ देवी-देवताक दिन और दक्षिणायणकेँ देवताक रातिकेँ रूपमे मनाओल गेल अछि। एहि दिन सँ विवाह, मुड़न, गृह प्रवेश, जनेऊ और नामकरण आदिक लेल शुभ समय शुरू भऽ जाइत अछि।तिला संक्रांतिक एहि पावन पर्वक पौराणिक महत्व अछि, कहल जाइत अछि कि एहि दिन सूर्य भगवान अपन पुत्र शनि सँ भेट करय लेल हुनकर घर जाइत छथि, जे कि शनि देव मकर राशिकेँ स्वामी छथि, ताहि दुवारे एहि पाबनिकेँ मकर संक्रांतिक नाम सँ जानल जाइत अछि। ओतहि दोसर मान्यता अछि, कि भगवान विष्णु एहि दिन पृथ्वी लोक पर असुरक संहार कयने छलाह, यैह खुशीमे तिला संक्रांतिक पाबनि मनाओल जाइत अछि।
तिला संक्रांतिक धार्मिक महत्व – शास्त्रक अनुसार तिला संक्रांतिकेँ दिन सँ सूर्य देवता उत्तरायण होइत छथि और उत्तरायण देवताकेँ अयन अछि। एक अयन देवताक एक दिन होइत अछि एहि तरहें 360 अयन देवताक एक वर्ष बनि जाइत अछि। सूर्यक स्थितिकेँ अनुसार वर्षक आधा भागकेँ अयन कहल जाइत छैक। सूर्यकेँ उत्तर दिशामे जाइकेँ उत्तरायण कहल जाइत अछि और एहि दिन सँ खरमास समाप्त भऽ जाइत अछि। खरमासमे कोनो तरहक शुभ कार्य नहिं होइत छैक।
मान्यताक अनुसार, कोनो व्यक्तिकेँ उत्तरायणमे मृत्यु होइ सँ मोक्षक प्राप्ति होइत छैक। एहि पाबनिकेँ लोक प्रकृति सँ जोड़ि कऽ सेहो देखैत छथि, जतऽ प्रकाश और ऊर्जा देबय वाला भगवान सूर्य देवक पूजा होइत छैन्ह। एहि कारण एहि दिन दान, पूजा-पाठ, जप-तप, स्नान आदि धार्मिक क्रिया-कलापक एक अलग ही महत्व छैक। कहल जाइत अछि कि एहि दिन दान-पुण्य कयला सँ सौ गुना बढ़ि कऽ पुनः प्राप्त होइत अछि। जाहि कारण आइयो लोक तिला संक्रांतिक दिन गंगामे स्नान करयकेँ संग ही बढ़ि-चढ़ि कऽ दान करैत अछि।
तिला संक्रांतिक वैज्ञानिक महत्व – जेना तिला संक्रांति मनाबैकेँ धार्मिक महत्व अछि ओहि तरहें एहि पाबनिकेँ मनाबैकेँ वैज्ञानिक महत्व सेहो अछि। तिला संक्रांतिक समय सँ ही नदीमे वाष्पन क्रिया होइत अछि और एहि दौरान नदीमे स्नान कयला सँ अनेक प्रकारक रोग दूर भऽ जाइत अछि ताहि दुवारे एहि दिन नदीमे स्नान करयकेँ विशेष महत्व छैक। चूँकि एहि समय सर्दी सेहो रहैत अछि और एहि दिन तिल-गुड़क सेवन कैल जाइत अछि, जे शरीरकेँ गर्मी प्रदान करैत अछि, जाहि सँ शरीरमे ऊर्जाक वृद्धि होइत अछि। एकर संग ही एहि दिन खिचड़ीकेँ सेवन सेहो अनिवार्य रूप सँ कैल जाइत अछि। खिचड़ी खाइकेँ वैज्ञानिक कारण अछि, कि खिचड़ी पाचनकेँ दुरूस्त रखैत अछि। ओतहि यदि खिचड़ीमे मटर आ अदरक मिला कऽ खिचड़ी बनेला पर ई शारीरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़बैकेँ संग ही बैक्टीरिया सँ लड़यमे मदद करैत अछि।
जाड़मे तिला संक्रांतिक अपन विशेष महत्व अछि। दही-चूड़ा मिथिलाक खास व्यंजन अछि। मिथिलामे तिला संक्रांति पाबनिक दिन दही आ चूड़ा संग खिचड़ी खेबाक परंपरा अछि। संक्रांति दिन उड़ीदक दालि आओर चाउरक खिच्चड़ि , चुलौड़-तिलबाक संग तिल-चाउर, गुड़ चढ़ैत छनि। कहल गेल अछि, खिचड़ीकेँ चारि यार घी, पापड़ ,दही, अचार। तिल गुणवान अछि परंतु गुड़क बिना बेस्वाद, जकरा खायल नहिं जा सकैत अछि। गुड़क बिना तिलक महत्व नहिं और घीकेँ बिना खिचड़ी अधूरा।एक -दोसरकेँ महत्व बुझैत समाजमे समरस भऽ कऽ रहनाइ संदेश अछि तिला संक्रांतिकेँ। संक्रांति प्रतीक अछि परिवर्तनक, सामाजिक समरसताक, एकता व बंधुत्वक।समाज एकजुट होयत तऽ संक्रांति अवश्य घटित होयत, नब सवेरा जरूर आओत, संबंधक सर्द राति जरूर ऊष्मा भरल दिवसमे परिवर्तित होयत। जय मिथिला जय मैथिली।

आभा झा
गाजियाबाद