“घरेलू हिंसा शब्द अपना सभक ओहिठाम एकटा नव शब्द थिकै।”

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— कीर्ति नारायण झा।         

भोरका घाघस बकरी के ढुइस, कनियाँ बर के झगड़ा सभटा फुइस अथवा कनियाँ बरक झगड़ा पंच भेल लबड़ा एहेन अनेको फकरा अपना सभक ओहिठाम प्रसिद्ध अछि। इ सभ झगड़ा के श्रेणी में नहिं अबैत छैक इ सभ बेसी स्नेह होयवाक परिचायक मानल जाइत अछि। घरेलू हिंसा शब्द अपना सभक ओहिठाम एकटा नव शब्द थिकै। पहिले अपना सभक ओहिठाम पारिवारिक कलह नहिं होइत छलैक कारण सभ अपन समाज सँ बान्हल रहैत छलाह आ जाहि ठाम एहि कलह के बहुत खराब दृष्टि सँ देखल जाइत छलैक। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप सँ लोक एहि अप्रिय घटना केर चर्चा सभक समक्ष लोक कऽ दैत छलखिन्ह जाहि सँ लोक हीन भावना सँ बचवाक लेल सभ मिलि जुलि कऽ शान्तिपूर्वक रहैत छलाह। आस्ते आस्ते समाज के विकास भेल गेलैक, लोक में शिक्षा के प्रति आकर्षण बढल गेलैक एकरा संगे संगे परिवारक बीच के दूरी दुर्भाग्यवश सेहो बढैत गेलैक। परिवार शब्द सँ काका काकी, पीसी सभ अलग होइत गेलीह आ मात्र पति पत्नी आ अपन बच्चा धरि परिवार सीमित भऽ गेल। बच्चा सभ पर एकर बहुत पैघ प्रभाव पड़लैक। बच्चाक निर्मल मोन पर पितियउत अथवा पिसियौत शब्द केर बहुत खराब असर पड़ैत गेलैक ओकरा सिकुड़ल परिवार केर अनुभव होमय लगलैक जकरा विषय में ओ अपन माय बाप सँ किछु नहि चर्चा करैत अन्दर सँ कुढय लागल। ओ बच्चा के लेल सभ अप्पन होयवाक स्थान पर आन शब्द ओकर दिमाग मे भरल गेलैक। पति पत्नी सेहो पारिवारिक दूरी के बढैत देखि अपना के असहज अनुभव करय लगलाह। मनुखक इ प्रवृति होइत छैक जे अप्पन मोनक बोझ जँ दोसर सँ चर्चा करैत अछि तऽ ओकर मोन किछु हल्लुक भऽ जाइत छैक मुदा पारिवारिक एहि सम्बन्ध के दूरी सँ लोक के मोन मे आशंका बढि गेलैक जे लोक छोट बात के आओर बेसी बढा चढा कऽ नहि बातक बतंगर बना दैथि। एहि प्रकारे मोनक भीतर के विभिन्न प्रकारक बात के रखलाक कारणे परिवार में छोट छोट बात जकरा नजरअंदाज कयल जा सकैत अछि ओ पारिवारिक हिंसा के रूप धारण करैत गेल जाहि सँ समस्त परिवार तऽ प्रभावित होइते अछि एकरा संग एखन छोट छोट बच्चा जे कलह शब्द केर परिभाषा नहिं बुझैत अछि ओहो एहि सँ दुष्प्रभावित होमय लागल। पारिवारिक हिंसा के अन्य कारण में पहिले के लोक के मुंह सँ सुनैत छलियन्हि जे जतबे टा के चादर होअय अपन पएर ओतबे पसारबाक चाही मुदा आब ओ बदलि गेलैक अछि “यावत जीवेत सुखम जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतम पीवेत ” आब लोक के देखसी बहुत बढि गेलैक अछि भले औकाति नहिं रहय। एहि भौतिकवादी जमाना में पारिवारिक कलह के इ बहुत पैघ कारण होइत अछि। एकर अतिरिक्त अपन समाजक केंसर दहेज प्रथा पारिवारिक हिंसा के मूल कारण मानल जा सकैत अछि। इच्छा अनंत होइत छैक आ जकरा कियो पूरा नहिं कऽ सकैत अछि आ जकर दुष्परिणाम पारिवारिक हिंसा के जन्म दैत अछि। हमरा हिसाबे एकरा सभ के रोकवाक लेल हमरा सभके अपन माय – बापक जीवन सँ प्रेरणा लेवाक चाही जे सदैव अपन धिया पूता के अपन जीह पर नियंत्रण रखवाक शिक्षा दैत छलखिन्ह। हमरा सभके सदैव स्मरण रखवाक चाही जे कम संसाधन में अत्यंत तृप्ति भऽ ओ लोकनि अपन जीवन कतेक शान्तिमय ढंग सँ व्यतीत कयलनि। “संतोषम् परमं सुखम्” के मूल मंत्र मानि एहि पारिवारिक हिंसा के बहुत हद तक नियंत्रित कयल जा सकैत अछि