गीता-दर्पणः गीता सँ जुड़ल महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

गीता सँ जुड़ल महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी

गीताभ्यासेन ये जाताः साधकेष्वपि संशयाः।
अत्र तेषां समाधानं क्रियते हि समासतः॥

गीताक अभ्यास सँ साधकक मोनक संशय केँ समाधान हेतु ई अध्याय स्वामी रामसुखदासजी महाराज अपन प्रसिद्ध पोथी ‘गीता-दर्पण’ मे रखलनि अछि।

गीता-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न ‒ कौरव-सेनाक त शंख, भेरी, ढोल आदि कतेको तरहक बाजा बाजल (१।१३), लेकिन पाण्डव सेनाक केवल शंख टा बाजल (१ । १५-१९), एना कियैक?

उत्तर ‒ युद्ध मे विपक्षक सेनापर विशेष व्यक्ति लोकनिक मात्र असर पड़ैत अछि, सामान्य व्यक्तिक नहि । कौरव-सेनाक मुख्य व्यक्ति भीष्मजीक शंख बजेलाक बाद सम्पूर्ण सैनिक सब द्वारा अपन-अपन (कतेको तरहक) बाजा बजायल गेल, जेकर पाण्डव-सेनापर कोनो असर नहि पड़ल। लेकिन पाण्डव-सेनाक मुख्य व्यक्तिय सब मात्र अपन-अपन शंख बजौलनि, जेकर तुमुल ध्वनि कौरव लोकनिक हृदय केँ विदीर्ण कय देलक।

प्रश्न ‒ भगवान्‌ तँ जनिते रहथि जे भीष्मजी दुर्योधन केँ प्रसन्न करबाक लेल मात्र शंख बजौलनि अछि (१।१२), ई युद्धारम्भक घोषणा नहि थिक। तैयो भगवान्‌ शंख कियैक बजौलनि (१।१४)?

उत्तर ‒ भीष्मजीक शंख बजिते कौरवसेनाक सब बाजा एक संग बाजि उठल। तेँ एहेन समयपर अगर पाण्डवसेनाक बाजा नहि बजितय त खराब लगैत, पाण्डवसेनाक हार सूचित होइत और व्यवहार सेहो उचित नहि लगैत । तेँ भक्तपक्षपाती भगवान्‌ पाण्डवसेनाक सेनापति धृष्टद्युम्न केर परवाह नहि कय सबसँ पहिने शंख बजौलनि।

प्रश्न ‒ अर्जुन त पहिले अध्याय मे धर्मक बहुतो-रास बात कहलनि अछि। जखन ओ धर्म केर एतबा बात सब जनैत रहथि, तखन फेर हुनका मोह केना भेलनि?

उत्तर ‒ कुटुम्ब लोकनिक ममता विवेक केँ दबा दैत छैक, ओकर मुख्यता केँ नहि रहि गेला सँ मनुष्य केँ मोह-ममता मे ओझरा दैत छैक। अर्जुन केँ सेहो कुटुम्ब लोकनिक ममताक कारण मोह भ’ गेलनि।

प्रश्न ‒ जखन अर्जुन पाप होइ मे लोभ केँ कारण मानैत रहथि (१ । ३८, ४५), तखन फेर ओ ‘मनुष्य नहियो चाहैत पाप कियैक करैत अछि’ (३ । ३६) ‒ ई प्रश्र कियैक कयलनि?

उत्तर ‒ कौटुम्बिक मोह केर कारण अर्जुन (पहिल अध्याय मे) युद्ध सँ निवृत्त होय केँ धर्म और युद्ध मे प्रवृत्त होय केँ अधर्म मानैत रहथि अर्थात् शरीर आदि केँ लयकय हुनकर दृष्टि केवल भौतिक छलन्हि । अतः ओ युद्ध मे स्वजन लोकनि केँ मारय मे लोभ केँ हेतु मानैत रहथि। मुदा आगाँ गीताक उपदेश सुनैत-सुनैत हुनका मे अपन कल्याणक इच्छा जाग्रत् भ’ गेलनि (३ । २)। अतः ओ पुछैत छथि जे मनुष्य नहियो चाहैत नहि करय योग्य काज मे प्रवृत्त कियैक होइत अछि? तात्पर्य अछि जे पहिल अध्याय मे त अर्जुन मोहाविष्ट भ’ कय कहि रहल छलथि आर तेसर अध्याय मे ओ साधक केर दृष्टि सँ पुछि रहल छथि।

प्रश्न ‒ शरीरी (जीवात्मा) अविनाशी अछि, एकर विनाश कियो कइये नहि सकैत अछि (२ । १७), ई न मारैत अछि आर न मारल जाइत अछि (२ । १९), तखन फेर मनुष्य केँ प्राणी सभक हत्याका पाप लगबाके नहि चाही?

उत्तर ‒ पाप त पिण्ड-प्राणक वियोग करबाक लगैत अछि; कियैक तँ प्रत्येक प्राणी पिण्ड-प्राण मे रहय चाहैत अछि, जियय चाहैत अछि। यद्यपि महात्मा लोक जियय नहि चाहैछ, तैयो हुनका लोकनि केँ मारय के बड़ा भारी पाप लगैत अछि; कियैक तँ हुनकर जिनाय संसारमात्र चाहैत अछि। हुनका जीले सँ प्राणिमात्र केर परम हित होइत अछि, प्राणिमात्र केँ सदा-सदा लेल रहयवला शान्ति भेटैत छैक। जे वस्तु प्राणी सभक लेल जतेक आवश्यक होइत अछि, तेकरा नाश करय के ओतबे बेसी पाप लगैत अछि।

प्रश्नः आत्मा नित्य अछि, सर्वत्र परिपूर्ण अछि, स्थिर स्वभाववला अछि, तखन फेर एकर पुरान शरीर केँ छोड़िकय दोसर नव शरीर मे चलि गेनाय केना सम्भव छैक?

उत्तर – जखन ई प्रकृतिक अंश शरीर केँ अपन मानि लैत अछि, ओकरा संग तादात्म्य स्थापित कय लैत अछि, तखन ई प्रकृतिक अंश केँ आयब-जायब केँ, ओकर जियय-मरय केँ अपन एनाय-गेनाय, जिनाय-मरनाय मानि लैत अछि। एहि दृष्टि सँ एकर अन्य शरीर मे चलि गेनाय कहल गेल अछि। वास्तव मे, तत्त्व सँ एकर एनाय-गेनाय, जिनाय-मरनाय अछिये नहि।

प्रश्नः भगवान् कहैत छथि जे क्षत्रियक लेल युद्धक सिवाय कल्याणक दोसर कोनो साधन अछिये नहि, तखन कि लड़ाइये टा कयला सँ क्षत्रियक कल्याण होयत, दोसर कोनो साधन सँ कल्याण नहि होयत?

उत्तर – एहेन बात नहि छैक। ओहि समय युद्ध केर प्रसंग छल आर अर्जुन युद्ध केँ छोड़िकय भिक्षा माँगब श्रेष्ठ बुझैत छलाह, अतः भगवान् कहलखिन जे एना स्वतः प्राप्त धर्मयुद्ध शूरवीर क्षत्रियक लेल कल्याण केर बहुत पैघ साधन थिक। अगर एहेन मौका पर शूरवीर क्षत्रिय युद्ध नहि करता तँ हुनक अपकीर्ति होइत छन्हि। ओ आदरणीय पूजनीय मनुष्यक दृष्टि मे लघुता केँ प्राप्त भ’ जाइत छथि। वैरी लोक हुनका नहि कहय योग्य वचन कहय लगैत छथि। तात्पर्य भेल जे अर्जुनक सामने युद्धक प्रसंग छल, ताहि लेल भगवान् युद्ध केँ श्रेष्ठ साधन कहलनि। युद्धक सिवाय दोसर साधन सँ क्षत्रिय अपन कल्याण नहि कय सकैत छथि – ई बात नहि छैक कियैक तँ पहिने सेहो बहुतो रास राजा लोकनि चौथापन मे, वन मे जाकय साधन-भजन करैत रहथि आर हुनकर कल्याण सेहो भेलनि।

प्रश्नः कर्म आरम्भ नहि करब आर कर्म त्याग करब – ई दुनू बात एक्के भेल। कियैक तँ दुनू मे कर्मक अभाव अछि। तेँ भगवान् केँ कर्माभाव सँ सिद्धि नहि हेतनि – एना कहबाक चाहैत छल। तैयो भगवान् गीताक अध्याय ३ केर ४म् श्लोक मे उपर्युक्त दुनू बात एक्के संग कियैक कहलनि?

उत्तरः भगवान् ई दुनू बात कर्मयोग आ ज्ञानयोग केर दृष्टि सँ अलग-अलग कहलनि अछि। कर्मयोग मे निष्कामभाव सँ कर्म केँ कयले सँ समताक पता लगैत अछि। कियैक त मनुष्य जखन कर्म करबे नहि करत त “सिद्धि-असिद्धि” मे हम सम रहलहुँ कि नहि तेकर पता केना चलत, अतः भगवान् कहैत छथि जे कर्म आरम्भ नहि कयला सँ सिद्धिक प्राप्ति नहि होइत छैक। ज्ञानयोग मे विवेक सँ समता के प्राप्ति होइत छैक, मात्र कर्म त्याग कयला सँ नहि। अतः भगवान् कहैत छथि जे कर्म केर त्याग कय देला मात्र सँ सिद्धिक प्राप्ति नहि होइत छैक। तात्पर्य भेल जे कर्मयोग आ ज्ञानयोग दुनू मार्ग मे कर्म करब बाधक नहि छैक।

प्रश्नः कियो मनुष्य हरदम कर्म नहि करैछ आर नीन्द लेबाक लेल, साँस लेबाक लेल, आँखि केँ खोलबाक-मुनबाक लेल, आदि केँ सेहो ओ ‘हम करैत छी’ एना नहि मानत, त फेर तेसर अध्याय के ५म् श्लोक मे ई केना कहल गेल अछि जे कियो मनुष्य कोनो अवस्था मे क्षणहु मात्र लेल कर्म कएने बिना नहि रहि सकैत अछि?

उत्तरः जा तक स्वयं प्रकृति के संग अपन सम्बन्ध मानैत अछि, ता तक मनुष्य कोनो क्रिया करय अथवा नहि करय, ओकरा मे क्रियाशीलता रहिते टा छैक। ओ क्रिया दुइ प्रकारक होइत छैक – क्रिया केँ कयनाय आ क्रिया केँ भेनाय। ई दुनू विभाग प्रकृति केर सम्बन्ध सँ मात्र होइत छैक। मुदा जखन प्रकृति केर सम्बन्ध नहि रहैछ तखन ‘कयनाय’ वा ‘भेनाय’ नहि रहैछ, प्रत्युत ‘अछि’ सैह टा रहैछ। ‘कयनाय’ मे कर्त्ता, ‘भेनाय’ मे क्रिया आर ‘अछि’ मे तत्त्व रहैछ। वास्तव मे ‘कर्तृत्व’ रहलो पर ‘अछि’ रहैत अछि आर ‘क्रिया’ रहलो पर ‘अछि’ रहैत अछि अर्थात् ‘कर्त्ता’ और ‘क्रिया’ मे तँ ‘अछि’ केर अभाव नहि रहैछ, मुदा ‘अछि’ मे कर्त्ता आ क्रिया दुनू के अभाव रहैछ।

प्रश्नः वर्षा के संग त हवनरूप यज्ञ केर सम्बन्ध अछि अर्थात् विधि-विधान सँ हवनरूप यज्ञ कयल जाय त वर्षा भ’ जाइत अछि, तैयो तेसर अध्यायक १४म् श्लोक मे ‘यज्ञाद्भवति पर्जन्यः’ पद मे आयल ‘यज्ञ’ शब्द सँ हवनरूप यज्ञ नहि लय कय कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञ कियैक लेल गेल?

उत्तरः वास्तव मे देखल जाय त कर्तव्यच्यूत भेला सँ, अकर्तव्य टा कयला सँ वर्षा नहि होइत अछि आर अकाल पड़ैत अछि। कर्तव्य-कर्म कयला सँ सृष्टिचक्र सुचारुरूप सँ चलैत अछि आर कर्तव्य-कर्म नहि कयला सँ सृष्टिचक्र के चलय मे बाधा अबैत छैक। जेना बैलगाड़ीक चक्का ठीक रहला पर गाड़ी ठीक चलैत छैक, मुदा कोनो एकोटा चक्का मे कनिकबो टा टुकड़ा टूटि जाय त ओहि सँ पूरे गाड़ी केँ धक्का लगैत छैक। तहिना कियो अपन कर्तव्य सँ च्यूत होइत अछि त ओहि सँ पूरे सृष्टि केँ धक्का लगैत छैक। वर्तमान समय मे मनुष्य अपन-अपन कर्तव्यक पालन नहि कय रहल अछि, प्रत्युत अकर्तव्यक आचरण कय रहल अछि, ताहि कारण अकाल पड़ि रहल अछि, कलह-अशान्ति बढि रहल अछि। जँ मनुष्य अपन-अपन कर्तव्यक पालन करय त देवता सेहो अपन-अपन कर्तव्यक पालन करता आ वर्षा भ’ जायत।

दोसर बात, अर्जुनक प्रश्न ३/१-२ (तेसर अध्यायक पहिल आ दोसर श्लोक) आर भगवानक उत्तर ३/७-९ तथा प्रकरण ३/१०-१३ केँ देखल जाय त कर्तव्य-कर्महि केर प्रवाह अछि आर आगूक श्लोक ३/१४-१६ मे सेहो कर्तव्य-कर्महि केर बात अछि। अतः एतय कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञ लेनाइये ठीक अछि।

प्रश्नः परमात्मा त सर्वव्यापी छथि, तखन हुनका ३/१५ (गीताक तेसर अध्याय केर १५म् श्लोक) मे केवल यज्ञ मे नित्यप्रतिष्ठित कियैक कहल गेल अछि? कि ओ दोसर जगह नित्यप्रतिष्ठित नहि छथि? 

उत्तरः सर्वव्यापी परमात्मा केँ यज्ञ अर्थात् कर्तव्य-कर्म मे नित्यप्रतिष्ठित कहबाक तात्पर्य ई अछि जे यज्ञ हुनकर उपलब्धिस्थान थिक, जेना जमीन मे सब ठाम जल भेलोपर ओ इनारे सँ प्राप्त होइत अछि, तहिना परमात्मा सब जगह परिपूर्ण भेलोपर अपन कर्तव्य-कर्म केँ निष्काम भावपूर्वक पालन कयले सँ प्राप्त होइत छथि। तात्पर्य ई भेल जे अपन कर्तव्य-कर्म केर पालन कयला सँ सर्वव्यापी परमात्माक अनुभव भ’ जाइत अछि।

प्रश्नः भगवान् कहैत छथि जे ‘हमहुँ कर्तव्य केर पालन करैत छी’, कियैक त, जँ हम सावधानीपूर्वक कर्तव्यक पालन नहि करी त लोक सेहो कर्तव्यच्यूत भ’ जायत (३/२२-२४), तखन फेर वर्तमान मे लोक कर्तव्यच्यूत कियैक भ’ रहल अछि? 

उत्तरः भगवान् केर वचन तथा आचरण के असरि वैह लोक पर पड़ैत छैक, जे आस्तिक अछि, भगवान् पर श्रद्धा-विश्वास राखयवला अछि। जे भगवान् पर श्रद्धा-विश्वास नहि रखैत अछि, ओकरा उपर भगवानक वचन व आचरण केर असरि नहि पड़ैत छैक।

प्रश्नः ज्ञानवान पुरुष अपन प्रकृति (स्वभाव) के अनुसार चेष्टा करैत अछि (३/३३), लेकिन ओ बन्धन मे नहि पड़ैत अछि। दोसरो प्राणी अपन प्रकृति के अनुसारे चेष्टा करैत अछि लेकिन ओ बन्धन मे पड़ि जाइत अछि। एना कियैक? 

उत्तरः ज्ञानी महापुरुष केर प्रकृति राग-द्वेष रहित, शुद्ध होइत छैक। तेँ ओ प्रकृति केँ अपना वश मे कइये केँ कोनो चेष्टा करैत अछि, ताहि सँ ओ कर्म सँ नहि बन्हाइत अछि। लेकिन अन्य प्राणीक प्रकृति मे राग-द्वेष रहैत छैक आर ओ प्रकृति के वश मे भ’ कय राग-द्वेषपूर्वक कार्य करैत अछि, तेँ ओ कर्म सँ बन्हा जाइत अछि। अतः मनुष्य केँ अपन प्रकृति, अपन स्वभाव शुद्ध-निर्मल बनेबाक चाही आर अपन अशुद्ध स्वभावक वश मे भ’ कय कोनो काज नहि करबाक चाही।

प्रश्नः ४म् अध्यायक ७म् श्लोक मे भगवान कहलनि अछि जे हम अपना आप केँ साकार रूप सँ प्रकट करैत छी, आर फेर ओ ९म् अध्यायक ४म् श्लोक मे कहैत छथि जे अव्यक्त रूप सँ सम्पूर्ण संसार मे व्याप्त छी, आर जखन एकटा देश मे प्रकट भ’ जाइत छथि, तखन ओ सब देश मे फेर कोना व्याप्त रहि सकैत छथि आर जे सर्वव्यापक छथि, ओ एक देश मे केना प्रकट भ’ जाइत छथि?
उत्तरः जखन एक प्राकृत अग्नि सेहो सब जगह व्यापक रहैत एक देश मे प्रकट भ’ जाइत अछि आर एक देश मे प्रकट भेलोपर अग्निक सब देश मे अभाव नहि होइत छैक, तखन भगवान् तँ प्रकृति सँ अतीत छथि, अलौकिक छथि, सब किछु करय लेल समर्थ छथि, ओ जँ सब जगह व्यापक रहितो एक देश मे प्रकट भ’ जाइथ तँ एहि मे कहनाइये की! तात्पर्य अछि जे अवतार लेलो पर भगवानक सर्वव्यापकता जहिनाक तहिना बनल रहैत अछि।
प्रश्नः मनुष्य योनि मे कर्मजन्य सिद्धि शीघ्र भेटि जाइत अछि (४/१२), मुदा ई बात देखय मे नहि अबैत अछि, एना कियैक?
उत्तरः कर्मजन्य सिद्धि, कर्मक फल दुइ तरहक होइत अछि – तात्कालिक आर कालान्तरिक। तात्कालिक फल शीघ्र देखय मे अबैत अछि आर कालान्तरिक फल समय पाबिकय देखय मे अबैत अछि, शीघ्र देखय मे नहि अबैत अछि। भोजन कयलहुँ आ भूख मेटा गेल, जल पीलहुँ आ प्यास मेटा गेल, गर्म कपड़ा ओढलहुँ आ जाड़ दूर भ’ गेल – ई सब तात्कालिक फल थिक। तहिना, केकरो प्रसन्न करबाक लेल ओकर स्तुति-प्रार्थना कयला सँ, ओकर सेवा कयला सँ ओ प्रसन्न भ’ जाइत अछि। ग्रह सभक साङ्गोपाङ्ग विधिपूर्वक पूजा कयला सँ ग्रह शान्त भ’ जाइत अछि, महामृत्युञ्जय मंत्र केर जप कयला सँ रोग दूर भ’ जाइत अछि, गया मे विधिपूर्वक श्राद्ध कयला सँ जीव प्रेतयोनि सँ छुइट जाइत अछि आ ओकर सद्गति भ’ जाइत छैक – ई सब कर्मक तात्कालिक फल थिक। एहि तात्कालिक फल केँ दृष्टि मे राखियेकय लोक देवता सभक उपासना करैत अछि। अतः मनुष्यलोक मे कर्मजन्य सिद्धि शीघ्र भेटि जाइत छैक एना कहल गेल अछि।
प्रश्नः ज्ञानीजन ब्राह्मण, चाण्डाल, गाय, हाथी, कुत्ता आदि मे समदर्शी होइत छथि (५/१८), तखन फेर वर्ण, आश्रम आदि केर अड़ंगा कियैक?
उत्तरः ज्ञानी महापुरुष लोकनिक व्यवहार तँ ब्राह्मण, चाण्डाल, गाय, हाथी, कुत्ता आदिक शरीर केँ लय कय यथायोग्य मात्र होइत छन्हि। शरीर नित्य-निरन्तर बदलैत अछि, अतः एहेन परिवर्तनशील शरीर मे हुनका लोकनिक विषमता रहैत अछि आर रहबाके चाही। कारण जे, सब प्राणीक खानपान आदि व्यवहारक एकता, समानता त कियो कइये नहि सकैत अछि, अर्थात् सभक संग व्यवहार मे विषमता त रहबे करत। एहेन विषमता मे सेहो तत्त्वदर्शी पुरुष एक परमात्मा टा केँ समानरूप सँ देखैत छथि। ताहि हेतु भगवान् तत्त्वज्ञ पुरुष लोकनिक लेल ‘समदर्शिनः’ कहलनि अछि, नहि कि ‘समवर्तिनः’। समवर्ती यानि समान व्यवहार करयवला त यमराजक, मृत्यु केर नाम (समवर्ती परेतराट् – अमरकोष ९/९/५८) जे कि सब केँ समान रूप सँ मारैत अछि।

प्रश्नः भगवान् प्राणीमात्र केर सुहृद् छथि (५/२९), बिना कोनो कारण के सभक हित चाहनिहार छथि, तखन फेर ओ प्राणी सब केँ ऊँच-नीच गति सब मे कियैक पठबैत छथि?

उत्तरः सभक सुहृद् भेले सँ त ओ भगवान् प्राणी सब केँ ओकर कर्मक अनुसार ऊँच-नीच गति सब मे पठाकय ओकरा पुण्य-पाप सँ शुद्ध करैत छथि। पुण्य-पापरूप बन्धन सँ ऊँच उठबैत छथि। (९/२०-२९; १६/१९-२०) ।

प्रश्नः गीता मे कतहु तँ सात्त्विक, राजस आर तामस गुण सब केँ भगवान् सँ उत्पन्न कहल गेल अछि (७/१२), कतहु प्रकृति सँ उत्पन्न कहल गेल अछि (१३/१९, १४/५) आर कतहु स्वभाव सँ उत्पन्न कहल गेल अछि (१८/४९), तखन गुण भगवान् सँ उत्पन्न होइत अछि या प्रकृति सँ उत्पन्न होइत अछि अथवा स्वभाव सँ उत्पन्न होइत अछि? 

उत्तरः जतय भक्तिक प्रकरण अछि ओतय गुण केँ भगवान् सँ उत्पन्न कहल गेल अछि, जतय ज्ञानक प्रकरण अछि ओतय गुण केँ प्रकृति सँ उत्पन्न कहल गेल अछि आर जतय कर्मविभाग केर वर्णन अछि ओतय गुण केँ स्वभाव सँ उत्पन्न कहल गेल अछि।

भगवान् सभक मालिक छथि। तेँ मालिक केर दृष्टि सँ देखल जाय त गुण भगवान् सँ उत्पन्न होइछ। सभक उत्पत्ति केर कारण प्रकृति छैक। तेँ कारण केर दृष्टि सँ देखल जाय त गुण प्रकृति सँ उत्पन्न होइछ। व्यवहारक दृष्टि सँ देखल जाय त गुण प्राणी सभक स्वभाव सँ उत्पन्न होइछ। तात्पर्य अछि जे ई गुण मालिक केर दृष्टि सँ भगवानक थिक, कारणक दृष्टि सँ प्रकृतिक थिक आर संसार मे अभिव्यक्तिक दृष्टि सँ व्यक्तिक थिक। अतः तीनू बात सही अछि।

प्रश्नः जे अनेकों जन्म सँ सिद्ध भेल, अनेकों जन्म सँ साधन करैत आयल अछि, वैह परमगति केँ प्राप्त होइत अछि (६/४५), तखन फेर सब मनुष्य अनेकजन्मसंसिद्ध नहि भेला सँ एक्कहि जन्म मे अपन उद्धार कोना कय सकैत अछि?

उत्तरः ई श्लोक योगभ्रष्ट केर प्रकरण मे आयल अछि। पहिल मनुष्यजन्म मे संसार सँ उपराम भ’ कय साधन कयला सँ शुद्धि भेलैक, फेर अन्त समय मे साधन सँ विचलित भेला सँ ओ स्वर्गादि लोक मे गेल त ओतय भोग सब सँ अरुचि भेला सँ शुद्धि भेटलैक, आर फेर ओतय सँ शुद्ध श्रीमान लोकनिक घर मे जन्म लय केँ परमात्मप्राप्तिक लेल यत्न कयला सँ शुद्धि भेटलैक। एहि तरहें ओकर तीन जन्म मे शुद्ध भेनाइये अनेकजन्मसंसिद्ध होयब थिक। मुदा वास्तव मे देखल जाय त मनुष्यमात्र अनेकजन्मसंसिद्ध अछि। अगर ओ एहि मनुष्यजन्म केर पहिने स्वर्गादि लोक मे गेल अछि त ओतय स्वर्गप्रापक पुण्य सभक फल भोगला सँ शुद्ध भेल। अगर ओ नर्क मे गेल अछि त ओतय नरकप्रापक पाप सभक फल भोगला सँ शुद्ध भेल। अगर ओ चौरासी लाख योनि सब मे गेल अछि त ओहि प्राणी सब केर प्रापक पाप सभक फल भोगला सँ शुद्ध भेल। एहि तरहें शुद्ध भेनाइये प्रत्येक मनुष्यक अनेकजन्मसंसिद्ध होयब थिक। अतः प्रत्येक मनुष्य अपन उद्धार, कल्याण कय सकैत अछि। प्रत्येक मनुष्य भगवत्प्राप्ति केर अधिकारी अछि। अगर ओ अधिकारी नहि होइतय त भगवान् ई मनुष्य शरीरे कियैक दीतथि!

प्रश्नः बहुतो जन्मक अन्त मे “सब किछु वासुदेवहि छथि” – एना ज्ञान होइत अछि (७/१९), तखन फेर एहि जन्म मे मनुष्य भगवत्प्राप्ति केना कय सकैत अछि? 

उत्तरः एहि श्लोक मे आयल “बहुनां जन्मनामन्ते” पद के अर्थ “बहुतो जन्म के अन्त मे” नहि थिक, प्रत्युत “बहुतो जन्मक अन्तिम जन्म एहि मनुष्य शरीर मे” – ई अर्थ अछि। कारण जे ई मनुष्य जन्म सम्पूर्ण जन्मक अन्तिम जन्म थिक। भगवान् मनुष्य केँ कल्याण हेतु अपना दिश सँ ई अन्तिम जन्म देलनि अछि अर्थात् मनुष्य केँ अपन कल्याण करबाक लेल पूरा अधिकार देलनि अछि। आब एकर आगू ई नया जन्मक तैयारी कय लियए अथवा अपन उद्धार कय लियए, एहि मे ई सर्वथा स्वतंत्र अछि।

गीता मे भगवान् कहलनि अछि जे “मनुष्य अन्तकाल मे जाहि-जाहि भाव के स्मरण करैत अछि या करैत शरीर छोड़िकय जाइत अछि, ताहि ताहि भाव केँ मात्र प्राप्त होइत अछि” (८/३); “जे-जे मनुष्य जाहि-जाहि देवताक उपासना करय चाहैत अछि, से-से देवताक प्रति ओकर श्रद्धा केँ दृढ़ कय दैत छी” (७/२१) – ई भगवद्वचन सब सँ मनुष्यजन्म केर स्वतंत्रता सिद्ध होइत अछि। मनुष्य सकामभाव सँ शुभकर्म करैत स्वर्गादि मे सेहो जा सकैत अछि; पापकर्म कय केँ पशु-पक्षी, भूत-पिशाच आदि योनि मे तथा नर्क मे सेहो जा सकैत अछि; आर पाप-पुण्य सँ रहित भ’ कय भगवान् केँ सेहो प्राप्त कय सकैत अछि। एहि अन्तिम मनुष्यजन्म मे ई जे चाहय से कय सकैत अछि।

जेना ई मनुष्यजन्म सम्पूर्ण जन्म केर अन्तिम जन्म थिक, तहिना ई सम्पूर्ण जन्म केर आदि जन्म सेहो थिक; कियैक तँ एहि मनुष्यजन्म मे कयल गेल कर्महि केर फल स्वर्ग, नरक आर चौरासी लाख योनि मे भोगय पड़ैत अछि। एहि मनुष्यजन्म मे सम्पूर्ण जन्मक बिया रोपल जाइत अछि।

प्रश्नः भगवान् भूत, वर्तमान आ भविष्य के सम्पूर्ण प्राणी केँ जनैत छथि (४/२६); अतः कोन प्राणी केहेन गति मे जायत – सेहो भगवान् जनिते छथि अर्थात् भगवान् जेकर जेहेन गति जनैत छथि ओकर वैह गति होयत तखन फेर मनुष्य केँ अपन उद्धार केर स्वतंत्रता कहाँ रहि गेल? 

उत्तरः भगवान केर भूत, वर्तमान आ भविष्यक प्राणी केँ जे जननाय अछि, से ओकर गति सब केँ निश्चित करय मे नहि अछि जे अमुक प्राणी अमुके गति मे जायत। भगवान् अपन अंश सम्पूर्ण प्राणी केँ स्वतः जनैत छथि आर सम्पूर्ण प्राणी भगवानक जानकारी मे स्वतः अछि – एहि मे उपर्युक्त कथन केर तात्पर्य अछि। अगर भगवानक जननाय प्राणीक गति निश्चिते करय मे होइतय त फेर भगवान् “ई मनुष्य हमरा प्राप्त नहि कय केँ मृत्युक रस्ता मे पड़ि गेल” (९/३); “हमरा प्राप्त नहि कय केँ अधोगति मे चलि गेल” (१६/२०) – एहेन पश्चाताप नहि करैछ; कियैक तँ जँ वैह ओकर सभक गति केँ निश्चित कएने छथि तँ फेर पश्चाताप कोन बात के? दोसर बात, श्रुति आ स्मृति भगवानहि केर आज्ञा थिक – “श्रुतिस्मृति ममैवाज्ञे”। श्रुति आ स्मृति मे विधि-निषेध आयल अछि जे शुभ कर्म करू, निषिद्ध कर्म नहि करू; शुभ कर्म कयला सँ अहाँक सद्गति होयत आर निषिद्ध कर्म कयला सँ अहाँक दुर्गति होयत। अगर भगवान् प्राणी सभक गति केँ पहिनहि निश्चित कय रखने रहितथि त श्रुति आर स्मृतिक विधि-निषेध केकरा उपर लागू होइतय? तात्पर्य अछि जे मनुष्य अपन उद्धार करय मे स्वतंत्र अछि।

प्रश्नः ९म् अध्यायक ६म् श्लोक मे भगवान् कहैत छथि जे सम्पूर्ण प्राणी हमरा मे स्थित अछि आर १३म् अध्याय के ३०म् श्लोक मे कहैत छथि जे सम्पूर्ण भाव प्राणि आदि एक प्रकृति मे स्थित अछि, त वास्तव मे प्राणी भगवान् मे स्थित अछि या प्रकृति मे?

उत्तरः भगवान् केर अंश भेला सँ सम्पूर्ण प्राणी तत्त्वतः भगवानहि मे स्थित अछि आर ओ भगवान् सँ कखनहुँ अलग भ’ए नहि सकैत अछि। मुदा ओहि प्राणी सभक जे शरीर अछि, ओ प्रकृति सँ उत्पन्न भेला सँ, प्रकृतिक अंश भेला सँ, प्रकृतिये मे स्थित अछि।

प्रश्नः हम सम्पूर्ण प्राणी मे समान रूप सँ छी; मुदा जे हमर भजन करैत अछि ओ हमरा मे आ हम ओकरा मे छी (९/२९) – भगवान् केर ई पक्षपात कियैक? यदि पक्षपात थिक त ‘हम सब मे सम छी’ – से केना? 

उत्तरः यैह पक्षपात त समता थिक। अगर भगवान् भजन करनिहार आर भजन नहि करनिहार के संग एक्कहि समान भाव रखैत छथि त ई समता केना होयत? आर भजन करय के कि माहात्म्य भेल! अतः भजन करयवला आ नहि करयवला के संग यथायोग्य वर्ताव करनाइये भगवानक समता थिक; आर जँ भगवान् एना नहि करितथि त ई भगवानक विषमता होइतनि। वास्तव मे देखल जाय त भगवान् मे विषमता छन्हिये नहि। भगवान् मे विषमता त भजन करयवला के भाव द्वारा उत्पन्न भेल अछि, अर्थात् जे संसार सँ सम्बन्ध विच्छेद कय केँ मात्र भगवान् टा मे लागि जाइत अछि, ओकर अनन्यभाव के कारण भगवान् मे एहेन विषमता भ’ जाइत छन्हि, भगवान् विषमता करैत नहि छथि।

प्रश्नः भगवद्दर्शन भेलाक बाद मोह नहि रहैछ। अर्जुन भगवानक विराट रूप, चतुर्भुज रूप, द्विभुज रूप – तीनू रूप केर दर्शन कय लेने रहथि, तैयो हुनकर मोह दूर कियैक नहि भेलनि?

उत्तरः दर्शन देलाक बाद भक्त केर मोह दूर करब, तत्त्वज्ञान देबाक जिम्मेदारी भगवानहि पर रहैत अछि। अर्जुनक मोह आगू चलिकय नष्ट भेबे कयल (१८/७३), एहि मे सिद्ध होइत अछि जे भगवद्दर्शन भेलाक बाद मोह नष्ट होइते टा अछि। अर्जुन अपन मोह नष्य होइ मे नहि तँ गीतोपदेश केँ कारण मानलनि आर नहि ओ दर्शन केँ, प्रत्युत भगवत्कृपे केँ कारण मानलनि – ‘त्वत्प्रसादात्’ (१८/७३)।

प्रश्नः तेरहम् अध्याय के बारहम् श्लोक मे परमात्मा केँ ज्ञेय कहल गेल अछि आर अठारहम् अध्याय के अठारहम् श्लोक मे संसार केँ ज्ञेय कहल गेल अछि। एकर कि तात्पर्य अछि?

उत्तरः ई दुनू विषय अलग-अलग भेल। तेरहम् अध्ययायक बारहम् श्लोक मे कहल गेल अछि जे परमात्मा केँ जरूर जनबाक चाही; कियैक तँ परमात्मा केँ यथार्थरूप सँ जानि लेलापर कल्याण भ’ जाइत अछि; अठारहम् अध्यायक अठारहम् श्लोक मे कहल गेल अछि जे जानय मे आबयवला दृश्य मात्र संसार थिक, जाहि सँ व्यवहार केर सिद्धि होइत अछि।

प्रश्नः भगवान् सभक हृदय मे निवास करैत छथि (१३/१७; १५/१५; १८/६१); मुदा आइ-काल्हि डाक्टर सब हृदय केर प्रत्यारोपण कय दैत अछि, तखन फेर भगवान् कतय रहैत छथि? 

उत्तरः भगवान् त सब ठाम मे निवास करैत छथि, मुदा हृदय हुनकर उपलब्धि-स्थान थिक; कियैक तँ हृदय शरीर के प्रधान अंग छी आर सबटा श्रेष्ठभाव हृदय मे मात्र उत्पन्न होइत अछि। जेना गायक सम्पूर्ण शरीर मे दूध व्याप्त भेलोपर ओ ओकर स्तन मात्र सँ प्राप्त होइत अछि, अथवा पृथ्वी मे सब जगह जल उपलब्ध रहलोपर ओ इनार आदि जलस्रोत मात्र सँ प्राप्त होइत अछि, ठीक तहिना भगवान् सब ठाम समान रूप सँ परिपूर्ण रहितो हृदय मे प्राप्त होइत छथि।

डाक्टर सब जाहि हृदय केर प्रत्यारोपण करैत अछि, ओ हथ्पिण्ड कहाइत अछि। ओहि हथ्पिण्ड मे जे हृदय-शक्ति अछि, ताहि शक्ति मे भगवान् निवास करैत छथि। प्रत्यारोपण हथ्पिण्डक होइत अछि, ओहि मे रहयवला शक्तिक नहि। शक्ति त अपन स्थान पर जहिनाक तहिना रहैत अछि। जेना नेत्र (आँखि) त देखाइत अछि, लेकिन ओकर देखबाक शक्ति ‘नेत्रेन्द्रिय’ नहि देखाइत अछि; कियैक त ओ सूक्ष्म शरीर मे रहैत अछि, तहिना हथ्पिण्ड देखाइत अछि, लेकिन ओहि मे रहयवला शक्ति नहि देखाइत अछि।

प्रश्नः अपना केँ शरीर मे स्थित मनला सँ मात्र पुरुष यानि चेतन भोक्ता बनैत अछि; मुदा १३म् अध्याय केर २१म् श्लोक मे भगवान् प्रकृति मे स्थित पुरुष केँ भोक्ता बतेलनि अछि, एना कियैक?

उत्तरः पुरुष यानि चेतन केँ प्रकृति मे स्थित बतेबाक तात्पर्य अछि जे जेना विवाह भेला पर स्त्रीक सम्पूर्ण सम्बन्धीक संग पुरुष केर सम्बन्ध भ’ जाइत छैक, तहिना एक शरीर मे अपन स्थिति मनला सँ अर्थात् एक शरीरक संग अपन सम्बन्ध मनला सँ मात्र प्रकृतिक संग, सम्पूर्ण शरीरक संग सम्बन्ध भ’ जाइत छैक।

प्रश्नः अपना केँ शरीर मे स्थित मनला सँ त पुरुष कर्त्ता आ भोक्ता बनैत अछि, लेकिन १३म् अध्याय केर ३१म् श्लोक मे भगवान् कहलनि अछि जे ई पुरुष शरीर मे स्थित रहितो कर्त्ता एवं भोक्ता नहि थिक; से केना?

उत्तरः एतय भगवान् प्राणीमात्र केर वास्तविक स्वरूप केँ बता रहल छथि जे वास्तव मे अज्ञानियो सँ अज्ञानी मनुष्य तक स्वरूप सँ कहियो कर्त्ता व भोक्ता नहि बनैत अछि, अर्थात् ओकर स्वरूप मे कखनहुँ कर्तृत्व आर भोक्तृत्व नहि अबैत छैक। मुदा अज्ञानक कारण मनुष्य अपना केँ कर्त्ता आ भोक्ता मानि लैत अछि (३/२७; ५/१५) आर ओ कर्तृत्व-भोक्तृत्व भाव मे बन्हा जाइत अछि। यदि ओहि मे कर्तृत्व आ भोक्तृत्व भाव नहि होय तँ ओ सम्पूर्ण प्राणी केँ मारियोकय नहि मारैत अछि आर नहि बन्हाइते अछि (१८/१७)।

प्रश्नः रजोगुणक तात्कालिक वृत्ति बढलापर आर रजोगुणक प्रधानता मे मरयवला प्राणी मनुष्यलोक मे जन्म लैत अछि (१४/१५, १८) – एहि दुनू बात सँ यैह सिद्ध होइत अछि जे एहि मनुष्यलोक मे सब मनुष्य रजोगुणहि वला होइत अछि, सत्त्वगुण आ तमोगुण वला नहि। मुदा गीता मे जगह-जगह तीनू गुण केर बात सेहो आयल अछि (७/१३; १४/६-१८; १८/२०-४० आदि)। एकर कि तात्पर्य अछि? 

उत्तरः ऊर्ध्वगति, मध्यगति आर अधोगति – एहि तीनू मे तीनू गुण रहैत छैक; मुदा ऊर्ध्वगति मे सत्त्वगुण केर, मध्यगति – (मनुष्यलोक मे -) रजोगुण केर आर अधोगति मे तमोगुण केर प्रधानता रहैत अछि। तखनहि त तीनू गति मे प्राणीक सात्त्विक, राजस आ तामस स्वभाव होइत छैक।

प्रश्नः १४म् अध्यायक १७म् श्लोक मे तमोगुण सँ अज्ञान केर उत्पन्न होयब कहल गेल अछि आर ८म् श्लोक मे अज्ञान सँ तमोगुणक उत्पन्न होयब कहल गेल अछि – एकर कि तात्पर्य भेल?

उत्तरः जेना गाछ सँ बिया उत्पन्न होइत अछि आर वैह बिया सँ फेर बहुतो रास गाछ उत्पन्न होइत अछि, तहिना तमोगुण सँ अज्ञान उत्पन्न होइत अछि आर अज्ञान सँ तमोगुण बढैत अछि, पुष्ट होइत अछि।

प्रश्नः अश्वत्थ (पिपर) के गाछ केँ पूजनीय मानल गेल अछि, फेर भगवान् १५म् अध्याय के ३रा श्लोक मे संसाररूप अश्वत्थ वृक्ष केर छेदन करबाक बात कियैक कहलनि अछि? 

उत्तरः पिपरक गाछ सम्पूर्ण गाछ सब मे श्रेष्ठ अछि। भगवान् ओकरा अपन स्वरूप बतौलनि अछि (१०/२६)। औषधक रूप मे सेहो ओकर बड पैघ महिमा छैक। ओकर जटा केँ पीसिकय पी लेला सँ बन्ध्या (बाँझ) केँ सेहो पुत्र भ’ सकैत छैक। पिपर सब केँ आश्रय दैत अछि। पिपरक नीचाँ सब पेड़-पौधा पनपल करैत अछि। पिपर केकरो बाधा नहि दैछ, तेँ पिपर केँ सेहो कियो बाधा नहि दैछ, जाहि सँ ई मकानक दिवाल आर छत पर, इनार आदि मे, सब जगह उगि गेल करैत अछि। पिपर, बट, पाकरि आदि वृक्ष यज्ञीय अछि, अर्थात् एकर लकड़ी यज्ञ मे काज अबैत अछि। अतः भगवान् पिपर केँ संसार केर रूपक बनौलनि अछि; कियैक तँ संसार सेहो स्वयं केकरो बाधा नहि दैछ। संसार भगवत्स्वरूप अछि। वास्तव मे अपन व्यक्तिगत राग-द्वेष, कामना, ममता, आसक्ति आदि टा बाधा दैत अछि। तेँ भगवान् संसाररूप पिपर गाछ केँ छेदन करबाक बात नहि कहलनि अछि, प्रत्युत एहि मे जे कामना, ममता, आसक्ति आदि अछि जाहि सँ मनुष्य जन्म-मरण मे जाइत अछि, ओकरा सभक वैराग्यरूप शस्त्र केर द्वारा छेदन करबाक बात कहलनि अछि।

प्रश्नः १५मा अध्याय के चारिम श्लोक मे भगवान कहैत छथि जे ‘ओहि आदिपुरुष परमात्मे केर हम शरण छी’ – ‘तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये’, त कि भगवान् सेहो केकरो शरण होइत छथि? 

उत्तरः भगवान् केकरहु शरण नहि होइत छथि; कियैक तँ ओ सर्वोपरि छथि। मात्र लोकशिक्षा वास्ते भगवान् साधक केर भाषा मे कहिकय साधक केँ ई बतबैत छथि जे ओ ‘ओहि आदिपुरुष परमात्मे केर हम शरण छी’ – एहेन भावना साधक जरूर करय।

प्रश्नः ई जीव परमात्माक अंश थिक (१५/७), त कि ई जीव परमात्मा सँ पैदा भेल अछि? कि ई जीव परमात्माक एकटा टुकड़ा थिक?

उत्तरः एहेन बात नहि छैक। ई जीव अनादि अछि, सनातन अछि आर परमात्मा पूर्ण अछि; अतः जीव परमात्माक टुकड़ा केना भ’ सकैत अछि? वास्तव मे ई जीव परमात्मेक स्वरूप अछि; मुदा जखन ई प्रकृति केर अंश केँ अर्थात् शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि केँ ‘हम आ हमर’ मानि लैत अछि, तखन ई अंश भ’ जाइत अछि। प्रकृति केर अंश केँ छोड़ला पर ई पूर्ण भ’ जाइत अछि।

प्रश्नः सात्त्विक आहार मे पहिने फल यानि परिणाम केर वर्णन कयकेँ फेर आहार केर पदार्थ सभक वर्णन कयलनि आर राजस आहार मे पहिल आहार केर पदार्थ सभक वर्णन कयकेँ फेर फल केर वर्णन कयलनि; मुदा तामस आहार केर फल केर वर्णन करबे नहि कयलनि (१७/८-१०) – एना कियैक?

उत्तरः सात्त्विक मनुष्य पहिने फल यानि परिणाम तरफ देखैत छथि, फेर ओ आहार आदि मे प्रवृत्त होइत छथि, तेँ पहिने परिणाम केर आर बाद मे खाद्य पदार्थ केर वर्णन कयल गेल अछि। राजस मनुष्य केर दृष्टि पहिने खाद्य पदार्थ केर तरफ, विषयेन्द्रिय-सम्बन्ध दिश जाइत अछि, परिणाम केर तरफ नहि। अगर राजस मनुष्य सभक दृष्टि पहिने परिणाम दिश चलि जाय त ओ राजस आहार आदि मे प्रवृत्त हेब्बे नहि करत। अतः राजस आहार मे पहिने खाद्य पदार्थक आर बाद मे परिणामक वर्णन कयल गेल अछि। तामस मनुष्य मे मूढ़ता यानि बेहोशी छायल रहैत अछि, ताहि लेल ओकरा सब मे आहार और ओकर परिणाम केर विचार हेब्बे नहि करैत छैक। आहार न्याययुक्त अछि वा नहि, ओहि पर हमर अधिकार अछि या नहि, शास्त्र केर आज्ञा अछि वा नहि आर ओकर परिणाम हमरा सब लेल हितकर अछि वा नहि – एहि सब बात पर तामस मनुष्य किछुओ विचार नहि करैछ। ताहि लेल तामस आहार केर परिणामक वर्णन नहि कयल गेल अछि।

हरिः हरः!!