“मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतक सूचिमे उपलब्ध पाबनि तिहार वैज्ञानिक आ अध्यात्मिक कसौटीपर कसल छैक।”

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— उग्रनाथ झा।       

कोनो भी व्यक्ति , स्थान आ समाजक पहिचान ओकर सांस्कृतिक आ धार्मिक परंपराक आधार पर होए छैक । जे अपन सांस्कृतिक आ धार्मिक धरोहर के जतेक संजोगि क’ रखने छथि ,हुनकर पहिचान चमत्कृत छन्हि । ओ अपन पहिचानक मुहतक्कीक भंवर सं बाहर छथि । जे अपन सांस्कृतिक धरोहर स’ छिटक’ला त निश्चित ओ अपनों केँ माँझ में रही विलुप्ते रहै छथि।उदाहरण स्वरूप डांडिया गरबा भांगरा ओडिसी , इत्यादिक झलक मात्र सं क्षेत्रीयता॑क पहिचान भऽ जाएत । तऽ कहबाक तात्पर्य जे जाधरि हमरा लोकनिक सांस्कृतिक विरासत बांचल अछि ताधरि हमरा सभहक धरा पर चिन्ह पहचिन्ह अछि।
मूल निवासी यानी जे अपन माटी पानी पर स्थीर छथि हुनका धतपत अपन सांस्कृतिक विरासत जुड़ल रहबाक सोहनगर मौका भेटै छैन्ह चाहे ओ मनक उमंग सं होए वा लोक लाजक कारणे , परंतु जे व्यक्ति अपन मुल माटि सं कटि गेल छथि चाहे ओ अल्पकालिक प्रवास पर हो वा सर्वकालिक प्रवास पर होथि हुनका लेल अपन सांस्कृतिक विरासत सम्हारब बेसी उकठाह भ जाएत छैक। जेकर भिन्न भिन्न कारण छैक जाहि मे मुख्य कारण छैक अपन विरासत पर आत्मगौरवक बोधक कमी ,सामाजिक माहौलमे सामंजस्यक कमी , अथवा उपयुक्त संसाधनक अनुपलब्धता वा समान संस्कृतिक लोग के अभाव ।जाहि कारणे प्रारंभिक चरण में असमर्थता के रूप में सांस्कृतिक अलगाव जन्म लैत छैक जे धीरे धीरे विलुप्त होएत चली जाए छैक ।जेकर भयावहता एतेक तक पसरि जाएत छैक जे हमरा लोकनि के एतबो भान नहि रहैत अछि जे कोन अवसर पर की सांस्कृतिक परंपरा छैक । जे हमरा सभक गरिमापूर्ण विरासत पर प्रश्न चेन्ह लगाबैत छैक।
जे वर्तमान आधुनिकता वाद कें विर्रो में उधियायत ऋण पैचक परंपरा के गरदनि लगायब शुरु कऽ दैत छैक।फलत: हमरा लोकनि एक माटि पानि के रहलाउपरान्तो समाजिक सांस्कृतिक रूपे विलग रहै छि। ताहि हेतु सतत सं जागृत रहै वाला मैथिल चेतना पर वर्तमान में विकृतिक धूरा-गर्दा सं ओझल होएत पहिचान के रक्षार्थ हमरा लोकनि सर्वप्रथम भाषायी जागृति के अक्षूण्ण राखि । किएक त मातृभाषा में ओ शक्ति जे हमरा सभ के एक माटी पानि पारिवारिक सदस्य होएबाक बोध कराएत जे समान सांस्कृतिकवाद’क स्वर बुलंद करत । तखनहि हमरा लोकनि सांस्कृतिक विशिष्टता के आदान प्रदान करबाक लेल सक्षम भ सकैत छि।
जेना की ज्ञात होएत जे आजिविका लेल पलायन में मिथिला एहन क्षेत्र अछि जाहिठाम देश के कोनो भी क्षेत्र सं पलायन अनुपात बेसी छैक ।एहन परिस्थिती में हमरा लोकनि भिन्न क्षेत्रक लोक संग निवास करै छि । जाहिठम सांस्कृतिक विभिन्नता पाओल जाए छैक। एहन परिस्थिती में एक दोसरा के सांस्कृतिक विरासत मिझरेबाक प्रबल संभावना रहै छैक वा ई कहि मैथिल संस्कृति में आयातित संस्कार के आगमन होएबाक मुख्य कारण छैक।
उक्त परिस्थिती में सुच्चा मैथिल के परम कर्तव्य जे अपन सांस्कृतिक चेतना जगाबैथ । जेना यदि किनको संग करबाचौठ मनाबैति छि त ओहि ठम अपन बरसाईत तुशारी के महत्व के से हो बुझाबैथि। यदि किनको संग डांडिया , गरबा करैत छथि त जरूर करैथि, मुदा अपन झिझिया, जट-जटीन के से हो मनाबैथि। जौ तिलासंक्राति में चूड़ा दही के पाबनि मनाबै छि त मनाऊं तै अपन खिच्चड़ि के जुनि बिसरि जाउ। विवाह दान में शेरवानी ,साफा आ लहंगा में विडियो फोटो शूट करबै छि त कराउ मुदा बेदी लग धोती , घूनेश आ साड़ी में अपन परंपरापरा निभाउ। दूर्वाक्षत के जूनि बिसराउ । अहां कोनो सांस्कृतिक बहुलता वाला क्षेत्र में निवास करैत होई त ओकर आदर करू लेकिन ओकर देखा देखी अपना के जूनि बिसरी । लेकिन अपन सांस्कृतिक चेतना अक्षूण्ण रखबाक लेल आवश्यक जे पहिने अपन मातृभाषा के याद राखि अपना बीच मैथिली में बात करि । जाहि सं अपरिचीत मैथिल के मैथिल सं परिचय हो तखनहि ने पता चलत जे कोनो भी सांस्कृतिक उत्सव में सहभागिता लेल हम कते छि । किएक एसगर में एकल परंपरा त संरक्षित क सकै छि मुदा सामुहिक संस्कार लेल जनबल से हो चाहि । किछु भौतिकवादी सोच आ अपना के श्रेष्ठ साबित करबा लेल मैथिल आधुनिकता में रंगाएल अपन संस्कार के तुच्छ बुझै छथि । परिणाम स्वरूप हुनकर मूल पहिचान विलुप्त भ जाए छन्हि।
हमरा लोकनि कतौ रहि मुदा आसपास के एक सांस्कृतिक लोक में आपसी परिचय बनाबी। एकल सांस्कृतिक कार्यक्रम अपना परिवारक बीच अवश्य मनाबी जाहि अपन आबय वाला पिढ़ी अपन विरासत सं अवगत रहय । गामक घर में काज करतेपता में विध व्यवहार के जानकारी एक दोसरा सं पूछिए क लेल जाएत छै तहिना प्रवासी लोकनि एक दोसरा पूछि के संपादित करी । जे नव उमंग आ उल्लास देत ठिक ओहिना जेना यू ट्युब पर इडली डोसा बनेनाए सिख क बनबै लेल आतुर रहै छि। जखन पलखति भेंटए त एहि पर धार्मिक आध्यात्मिक आ वैज्ञानिक दृष्टि पर विमर्श करी जाहि सं हमरा अहां संग संग बालबच्चा के अपन विरासत पर आत्मगौरव जन्म लेत आ मनौबाक उमंग प्रस्फुटित होएत रहत । जे सामुहिक कार्यक्रम छैक ओहि लेल आसपरोस के मैथिल संग विमर्श क मनाओल जेबाक चाहि । जाहि सं जेना डांडिया , गरबा , भांगरा, आई मिथिला में आयातित भ रहल छैक तहिना झिझिया , जटजटीन इत्यादी मिथिला सं बाहर अन्य क्षेत्र में प्रसारित होएत त हमर अहांक पहिचान दोसरो क्षेत्र बनल रहत ।जेकर भार हम अहां नहि उठेबै त दोसर और के करत।मुदा हम प्रवासी स्वयं बिसरल छि । तै अपने मिथिला संस्कृतिक ध्वजवाहक भ सकैत छि जिनकर कान्ह चढ़ि हमर संस्कृति, संस्कार सगर जग पसरतै।
मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतक सूचि में उपलब्ध पाबनि तिहार वैज्ञानिक आ अध्यात्मिक कसौटी पर कसल छैक ताहि हेतु मैथिल लोकनि के एकरा संरक्षित करैत जतय कतौ प्रवास में छि ओतय खुली कय मनाबी निश्चित एक दिन ई परंपरा संपुर्ण धरा पर राज करत। लेकिन जौ मैथिल एकर हाथ छोड़ि देब तखन मिथिला , मैथिल ,आ मैथिली तीनू अपन पहिचानक मुहतक्की में बनल रहब । निश्चित आबय बला संतान उठल्लू बनि लोकक मुहतक्की में जीएत जेकर कोनो नीज स्थान मान सम्मान नहि होएत।बस प्रवासी! प्रवासी! प्रवासी!
जय मिथिला जय मैथिली।।