“जाड़क मासमे मिथिलामे घर आँगन आ खेतक सुंदरता।”

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— कीर्ति नारायण झा       

जाड़क मास में मिथिला में घर आंगन आ खेतक सुंदरता जाड़ बड़ जाड़ गोसाई बड्ड पापी, तपते खिचड़ी खुआ दे गै काकी” “सुनि सुनि लगैत अछि दांती। कुकूर बन्है अछि गाँती।।” अपना सभक ओहिठाम ई पांती जाड़क मास में खूब सूनल जाइत छलैक । हमरा गाम में एकटा मास्टर साहेब रहथिन्ह घूरन बाबू, ओ भरि जाड़ चम्मच लऽ कऽ खाना खाइत छलखिन्ह आ खाना खा कऽ हाथ गमछा सँ पोइछ लैत छलखिन्ह आ लोक सभ के कहथिन जे हाथ पानि सँ कियए धोयब? जखन कि हाथ आंइठ नहिं भेल अछि। हुनका बड्ड जाड़ लागैन आ भरि दिन भरि राति सीरक आ कम्बल के भीतर घोंसियएल रहैत छलखिन्ह। हमर छोटका कक्का सेहो भरि दिन भरि राति घूर के सेवने रहैत छलखिन्ह। ओहीठाम जलखई, भोजन सभ किछु करैत छलखिन्ह आ दिन तका कऽ नहाइत छलखिन्ह। हमरो सभके पोखरि मे नहाय बला कार्यक्रम बन्द भऽ जाइत छल। हम सभ बच्चा रही आ तें जाड़ कम लगैत छल तऽ घूर लग बैसवाक मोन तऽ नहिं करय मुदा आलू पकेवाक लोभ के कारणे घूर लग बैसैत छलहुँ। दरबज्जा पर आगू में खूब जगह छलैक आ ओहि में आलू रोपल छलैक आ खूब बड़का बड़का आलू रहैत छलैक आ हम सभ साँझ मे आलू उखाड़ि कऽ ओकरा घूर में पकबैत छलहुँ आ कचकुहो आलू एतेक सोन्हगर लगैत छल जे आब ओहि स्वाद के स्मरण सँ जीह सँ पानि खसय लगैत अछि। घूरक तर में रंग बिरंग केर गप्प आ गांती में मुरही बान्हल संगहि हमर कक्का के गूड़ बला चाह एकदम मीठ आ हमहुँ सभ एक एक गिलास कऽ पीबैत छलहुँ सर्वत बुझि कऽ। जाड़क मास खयवा पीवाक लेल अत्यन्त अनुकूल मास होइत छैक। कतबो दबा कऽ खा लियअ सभटा पचि जाइत छलैक। पोखरिक माछक स्वाद सेहो नीक भऽ जाइत छलैक। नरही पोखरि केर कबैइ आ गरैइ केर स्वाद पूछू जूनि। हमरा गामक टिटहा हजाम पोखरि सँ लीर्ह बांसक करची के सिक्कैठ बना कऽ बीच पोखरि सँ कात मे आस्ते आस्ते अनैत छलैक आ जाड़ होयवाक कारणे माछ सभ ओहि लीर्ह में नुकाएल रहैत छलैक आ कात मे आनि कऽ टिटहा ओकरा पकड़ि लैत छलैक। बहुत सुंदर दृश्य होइत छलैक ओ। गहूँमक छोट छोट गाछ आ ओकर बीच मे देहाती बथुआ साग हमर बहिन सभ तोड़ि तोड़ि कऽ अनैत छलीह आ बाड़ीक भांटा अथवा मचान परहक सजमैन केर संग ओकर झोर अत्यन्त स्वादिष्ट होइत छलैक। घरक आगू में आलूक खेत मे सरशो के गाछ सेहो रहैत छलैक आ ओकर सागक स्वाद अत्यन्त स्वादिष्ट होइत छलैक। भाँटा, मूर, डेढबा सीम, सजमैन, खीरा सभटा बारी में फरैत छलैक। दलान पर गुलाब के फूल आ बड़का बड़का गेना के फूल संगहि खेरी गेना दरवज्जा पर भरल रहैत छलैक। जाड़क मास में फूल हमरा ओहिठाम खूब फूलाइत छलैक। जाड़क मास में रौद बड्ड नीक लगैत रहैत छैक मुदा जल्दी रौद निकलबे नहिं करैत रहैत छैक।ठंड हवा केर सिहरन सँ बुझाइत रहैत छैक जेना सूर्य भगवान सेहो कँपैत रहैत छैथि मुदा हम सभ ओकरो जोगार करैत छलहुँ। दरबज्जापर खरिहान में पुआरक टाल लग शतरंजी बिछा कऽ दुपहरिया मे सूतैत छलहुं। पुआरक गर्मी सँ शरीर गर्म रहैत छलैक। भोर चारिये बजे सँ आंगन में धानक उसिनियाँ आरम्भ भऽ जाइत छलैक। हमर माय आ काकी लेवान के लेल नवका चूड़ा उख्खैर मे कूटैत छलीह। धम धम के आबाज सँ वातावरण गुंजायमान होइत छल। हमरा सभ लेल हमर माय गामें पर माटिक खापरि में मुरही भुजैत छलीह आ चाउर के भुजलाक बाद जखन गर्म बालू ओहि मे दैत छलखिन्ह तऽ मुरही चारू कात फरफरा कऽ पसरि जाइत छलैक। नवका धान बेसी धनकुट्टी मशीन पर कुटाइत छलैक मुदा आंगन में ढेकी में सेहो धान कुटाइत छलैक प्रायः पावनि तिहार के लेल। जाड़क मास में हाथ पेएर कम जरूर चलैत छलैक मुदा आंगन में चहल पहल बढि जाइत छलैक। आंगन में धान सुखाइत रहैत छलैक जकरा समेटवाक लेल एकटा बांसक डंटा मे लकड़ी के छोट तख्ता जकाँ लागल रहैत छलैक जकरा फर्हुआ कहैत छलियै आ जाहि सँ धान समटल जाइत छलैक आ तीन चारि दिन सुखेलाक बाद बखारी में राखल जाइत छलैक। दरबज्जापर धानक दौन होइत रहैत छलैक आ बरद के मुंह में जाबी लगा देल जाइत छलैक ताकि ओ धान नहिं खा सकय नहिं तऽ धान खयला सँ बरद के खराबी करितै। हमरा लोकनि गामक जाड़क वातावरण में प्रसन्न आ मगन रहैत छलहुँ। आब तऽ मात्र स्मृति शेष अछि जे आँखिक समक्ष नचैत रहैत अछि… जय मिथिला आ जय मिथिलाक जाड़क अनुभूति…….