“कला, प्रेम आ संस्कृतिसँ भरल पाबनि सामा-चकेबा”

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— इला झा   

सामा-चकेबा पाबनि भाइ-बहिनक अपार स्नेहक द्यौतक अछि।ई पवित्र स्नेहक पाबनि कार्तिक महिनाक पंचमी सँ पूर्णिमा तक आठ दिन तक चलैत अछि। भ्रातिद्वितिया वा छठि के प्रात सँ अहि पर्वक शुभारंभ होइत छैक। अहि पर्वक विस्तार सम्पूर्ण बिहार, झारखंड, बंगालक पश्चिम दिनाजपुर आ नेपाल तक फैलल अछि। हरेक वर्ण, जातिक लोक अहि पर्व के मिथिला मे पूर्ण विधि-विधान सँ मनबैत
छथि। अहि समय मिथिलांचलक हरेक गली मुहल्ला मे सामाक गीत सुन’ लेल भेटत। ई भाइ-बहिनक पर्व थिक जाहिमे माय – बहिन सभ मिलि गीत गाबि
भाइ के दीर्घ जीवन आ सम्पन्नताक कामना करैत छथि।
सामा-चकेबा पाबनिक शुभारंभ महिला लोकनि काँच चिकनी माँटि सँ मानव आ पशु – पक्षी हाथ सँ गढ़ि सुन्दर आ भव्य आकार दैत करैत छथि। जाहि मे माँटिक बनल सामा-चकेबा(पति-पत्नी), साम्ब(भाइ), एक पंति मे बैसल सत भैंया, खड़ सँ बनाओल वृंदावन, सोन पटुआ सँ बनाओल चुगला, टिहुली, झांझी कुकुर, कचबचिया, बाटो बहिन, मुँह टेढ़ी चिड़िया
, कछुआ सवारी, पौती बनबैत छथि ।आइ काल्हि साँचा सँ बनाओल ई सुन्दर कलाकृति बाजार मे सेहो भेटैत छैक। सुन्दर मुर्ती बना पहिले सुखायल जाइत छैक तकर बाद ओकरा ढ़ौरल जाइत छैक। सुन्दर आकृति के खूब चटक रंग जेना लाल- पिअर, हरिअर, गुलाबी, बैगनी, आसमानी, संतरी आ कारी रंग सँ रगल जाइत अछि।लाल बाँसक डाला मे सामा-चकेबा आ अन्य मुर्ती के स्त्रीगण लोकनि सजबैत छथि। आसपास परोसक महिला लोकनि एकत्रित भ’ राति मे नवधानक शीश आ सुन्दर मुर्ती आ दिया सँ सुशोभित अप्पन
सजाओल चंगेरा माथ पर राखि गीत नाद करैत जोतल खेत मे अप्पन डाला सरकाबैत सामा खेलाइत छथि।

हे सामा चौरी ले हमर भैया के ओरदा दे…

साम – चक साम- चक अबिह’ हे
कूर खेत मे बैसिह’ हे
सब रंग पटिया ओछबिह’ हे
आसीस भाइ के दिह’ हे….

अंतिम दिन बाटो बहिन के चौवटिया पर राखल जाइत छैक। अंत मे पूर्णिमाक राति नवका हरिअर चूड़ा-दही आ गुड़क भोग लगा प्रसाद बाँटल जाइत छैक। सामाक अदला-बदली मैथिली मे मंत्र पढ़ि कैल जाइत छैक।ई पर्व महिला लोकनि करैत छथि। समापन दिन गीत गबैत वृंदावन आ चुगलखोर चुगलाक मुँह मे कारिख पोति जराओल जाइत छैक। गीत –

चुगला करे चुगलपन बिलाड़ि करे म्याऊँ
आरे चुगला तोहे फाँसी द्याउँ

सामा भाइ सँ ठेहुन द’ फोड़ेलाक बाद , भाइके मिष्ठान खाय लेल दैत खेत वा पोखरि मे बहिन सभ लोक गीत गबैत, हुनका पुनः अगला साल अयबाक निमंत्रण दैत भसबैत छथि।

अहि पर्वक सम्बन्ध मे लोक संस्कृति सँ जुड़ल कथा अछि।
द्वापर युग मे भगवान श्रीकृष्ण बेटीक नाम सामा आ बेटा नाम साम्ब छलैन। दुनू भाइ-बहिन मे बहुत प्रेम छलन्हि ।ऋषि पुत्र चारुदत्तक विवाह सामा सँ भेलैन।सामा ऋषि-मुनि जनक सेवा हुनक आश्रम मे जाय करथि। ई बात श्री कृष्णक मंत्री चुरक के बहुत खराब लागनि। ओ लगातार श्री कृष्ण के हुनक पुत्री के खिलाफ कान भर’ लगलथि, हुनक चरित्र पर लांछन रहनि। लगातार यदि कान भरल जाय त’ ओहि बात पर ध्यान देल जाइत अछि। भगवान श्रीकृष्ण सेहो बहुत क्रोधित भ’ अप्पन बेटी सामा के चिड़ै बनि जेबाक श्राप देलथि। अपन पत्नी के चिड़ै बनल देखि चारुदत्त आहत भ’ शंकर भगवान के अपनो चिड़ै बनाबय लेल गोहार लगोलथि।भगवान हुनको चकेबा पक्षी बना देलथि। दुनु युगल जोड़ी पक्षी वृंदावन मे स्वच्छंद रहैत रहथि। मंत्री चुरकके ई नीक नहि लागै।ओ वृंदावन मे आगि लगा देलक। जान बचबैत सामा-चकेबा भागि क’ मिथिला चलि गेलथि। जखन तपस्या के बाद भाइ साम्ब वापस एलथि त’ बहिन-बहनोई के बारे मे जानि व्याकुल भ’ गेलथि। अपन पिता श्रीकृष्ण केँ तप सँ प्रसन्न क’ वरदान मँगलथि।ओ हुनका प्रसन्न क’ पुनः अप्पन बहिन – बहिनोई के मानव रुप मे देख’ चाहलथि। जाहि मे शर्त छल जखन मिथिलाक महिला गीत गाबि सामा-चकेबाक केँ पुजती तखने दुनु पुनःमानव शरीर धारण करताह। साम्ब मिथिला जत’ हुनक बहिन-बहिनोई नुकायल रहथि पहुँचलथि।. मिथिलाक महिला सभसँ सामा-चकेबाक पाबनि हुनक मुर्ती बना लोक आस्थाक गीत गाबि मनब’ लेल कहलखिन।ताहि दिन सँ सामा-चकेवा पाबनि धरि मानव रूप मे रहैत छथि। दुनु गोटेके पूजा विधिवत होइत छन्हि । वृदांवन आ चुरूक चुगला के जराओल जाइत छैक। भाइ-बहिनक अगाध प्रेमक ई आस्था सँ भरल कथा अछि।

सामा(white rumpled Sama) हिमालयी पक्षी अछि आ चकेवा ( Shell duck) साइबेरियन पक्षी अछि। चुगला ओ बहेलिया अछि जे अहि सुन्दर पक्षी सभक शिकार करैत अछि। करीब डेढ़ सौ प्रवासी पक्षी अहि मौसम मे मिथिला मे अबैत अछि आ ओहिमे कयोको पक्षी शिकार होइत अछि । अहि पर्वक निहित भावना के देखैत ई आभासित होइत अछि जे मिथिला मे अहि मौसम मे आब’ वाला पक्षी सभक सुरक्षा हेतु जनमानस केँ जगाब’ लेल कयेको शताब्दी सँ निष्ठा पूर्वक मैथिल समुदाय, खास क’ महिला वर्ग, अति प्राचीन काल सँ समाज के जागृत करैत रहल अछि।

मूल भावना सँ दूर होइत अहि पर्व मे निहित जाहिमे दुनु
पक्षी सामा – चकेबा सेहो अछि। सामा- चकेबा वा अन्य चिड़ै के शिकार होबा सँ बचाओल जाय। अहि मूल भावना के लोक सभ लग अवश्य पहुँचाओल जाय से हमर आग्रह अछि।
भाइ- बहिनक अटूट प्रेम सदा बनल रहै।

जय मिथिला
जय मैथिली

इला झा
४. ११.२०२२