“भाइ-बहिनक प्रीतक प्रतीक – सामा।”

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— उग्रनाथ झा     

मिथिलाक लोक व्यवहार में बहुतायत पाबनिक परंपरा रचल बसल छैक । जेकरा संबंध में किएक आ कोना प्रारंभ भेल तेकर प्रमाणिक जबाब ओहि परंपरा के मनोनिहार बहुसंख्य के बुझल नहि रहैत छैक आ नै बुझबाक जिज्ञासा । बस मोटा मोटा जानकारी कथा पिहानी के रूप जनश्रूती आधारित रहैत छन्हि। वर्तमान में आवश्यक छै जे विज्ञजन धर्मशास्त्र/कर्मकांड अध्येता लोकनि एहन एहन विषय पर विस्तृत जानकारी कें प्रसार करैथ।
वर्तमान में कार्तीक शुक्ल षष्ठी सं पूर्णिमा दिन धरि मिथिला के घर आंगन में सभ वर्णक द्वारा सामा चकेबा खेलाएल जाएत छैक । एहि अवधि में मिथिला क्षेत्र सायंकाल में रसगर, झमटगर गीत सं गुंजायमान रहैत अछि। हास्य विनोद प्रस्फुटित होएत रहैत छैक। आखिर ई सामा चकेबा खेलाएबाक पाछाक इतिहासक स्त्रोत तकबाक क्रम में विभिन्न अध्येता लोकनि के आलेख आ अन्य स्त्रोतक अध्ययन के पश्चात जे ज्ञात भेल ओ अछि –
स्कंद पुराण में देल अति

द्वारकायाण्च कृष्णस्य पुत्री सामातिसुंदरी।
साम्बस्य भगिनी सामा माता जाम्बाबती शुभा।
इति कृष्णेन संशप्ता सामाभूत् क्षितिपक्षिणी।
चक्रवाक इति ख्यातः प्रियया सहितो वने।।
एहि पाबनिक स्रोत के पता चलैत छैक।
एहि अनुसार सामा द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण आ जाम्बवती के पुत्री छलीह आ हिनकर भाई के नाम साम्ब छलन्हि ।आ पति के नाम चक्रवाक /चुरूकदत्त छलन्हि । चूड़क नामक व्यक्ति द्वारा सामा के जंगल में पशु पक्षी वन उपवन आ ऋषि सभक संग विचरण करबाक मिथ्या आरोप लगाओल गेल । जे सुनि कृष्ण के क्रोध सं श्रापित भ सामा पक्षी भ गेली । संगहि सप्त ऋषि से हो श्राप प्रभाव सं पक्षी रूप धारण केलाह । सामा के पक्षी रूप देख चक्रवाक प्रेयसीक मिलन के उताप में शिवजीक कठीन तप क पक्षी रुप प्राप्त कैलन्हि । जाहि सं सामा चकेबा के मिलन भेल । ई संपूर्ण कालक्रममे सामा के भाई साम्ब अनुपस्थित छलाह । जहन ओ शिक्षा पूर्ण क गुरूआश्रम सं फिरि अएलाह त सभ वृतांत सुनि बहुत व्यथित भेलाह। फलस्वरूप निर्णय केलन्हि जे बहिन के पूनह सदेह भेंट करब यानि पक्षी रूप सं पुनह मुल रूप में आनब। जे बहिनक प्रति भाईक प्रगाढ़ सिनेह के द्योतक छै ।
साम्ब अपन एकनिष्ठ तपस्याक बलपर श्रीकृष्ण के प्रभावित करबा में सफल भेला तत्पश्चात श्रीकृष्ण द्वारा श्राप मुक्त करैत वरदान भेटल जे सामा प्रत्येक वर्ष कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठीक अपन मूल रूप में आओती आ पुनः पूर्णिमा दिन खग रूप धारण करती । ई सुनि साम्ब अति प्रसन्न भेलाह।
एहि क्रम के मध्य में चुरक जे चूगला नाम सं प्रसिद्ध भेल । ओकर झूठ जहन खुजल त सामाक प्रति बढ़ैत जन संवेदना आ सामा के पति आ ऋषि लोकनिक खग रूप में विचरण सं आहत भ चुरक सामाके जान मारबाक योजना बनाओल आ जाहि जंगल (वृंदावन) में ओ विचरण करैत छलीह ओहि जंगल में आगि लगादेलक जाहि सं सामा समेत समस्त खग रूपि प्रीयजन सुडाह भ जाय मुदा विधि के विधान अनंत प्राण रक्षा के लेल सामा अपन पति समेत जंगल छोड़ि पड़ाए गेली। अपन प्राण रक्षा केलीह ।
उक्त कथा के पाबनिक रूप में मनेबाक पाछु निम्न वचन छैक –
वर्षे वषे तु या नारी न करोति महोत्सवम्।
पुत्रपौत्रविनिर्मुक्ता भर्ता नैव च जीवति।।
भर्त्तुव्रियोगं नाप्रोति सुभगा च भविष्यति।
पुत्रपौत्रयुता नारी भ्रातृणां जीवनप्रदा।।
उक्त के आलोक में नारि लोकनि भाई आ पति के दीर्घायु होएबा एवं सतत प्रेमक डोर बान्हल रहबाक कामना सँ पूरा मनोयोग सँ सप्ताह भरि सामा चकेबा के खेल करैत छैथ ।जेकर झलक छठि पाबनिक संगहि शुरू होएत देखल जाए छैक। महिला लोकनि माटिक सामा , चकेबा(चक्रवाक के अपभ्रंश में उच्चारित) पक्षी रूपी सात आकृति सतभैया , चुगला (जेकर मानव मुखाकृति निर्मित सोओन केश स्वरूप देल आ लकड़ीक आधार पर ठाड़ बनाओल जाईछ) वृंदावन (जे खढ़ के पुल्ली के जड़ी में माटि सं मुखाकृति के आकार बनाओल), शिरी सामा (जे तीन तीन के क्रम में लगभग छः टा) आ बाटो- बहिनी जे एकहि आधार पर खग रूपी आकृति एक दोसरा के विपरीत रहैत छथि। झांझी कुकुर , सामाक विदाई हेतु पेटार आदि के निर्माण करैत छथि । सायंकाल उक्त निर्मित आकृतिक संग महिला लोकनि सामुहिक हेड़ में दालान दरबज्जा बा चौबट्टीया पर जा सामा खेलाई छैथ ।जाहि मे विभिन्न हास्य व्यंग संग न
व्यवहारिक गीत नाद होईत छैक । चुगला के कृत्य के संबोधित करैत ओकरा निक बेजाए सुनाएल जाए छै ।तखन चक्राकार वैस आपस में शिरी सामा के हाथे हाथ फेरल जाई छै जाहि मे –
जीबू जीबू भैया जीबू ,
जेना धोबियाके पाट ओहन हमरा भैया केचाट, जेना केरा थम्ब तहिना हमरा भैया के जांघ।।
इत्यादि प्रचलित पाठक वाचन होई छै। तत्पश्चात चुगलाक कृत्य के याद में वृंदावन के जरायल जाई छै आ गायल जाए छै- वृंदावन वन में आगि लागल कियो ने मिझाबय हे ….
तत्पश्चात चुगला सं प्रतिशोध स्वरूप केश आ मोछ झड़काएल जाए छै आ हास्य व्यंग रूप में उलहन अपदर सुनाएल जाए छै। इ क्रम अनवरत कार्तिक पूर्णिमा दिन तक चलैत छैक आ पुर्णिमा दिन सामा के विदाई होईत छन्हि जाहि काल मिथिला में बेटी विदाई के तुल्य विदाई होईत छन्हि । आंगन में चूड़ादहि भोजन के पश्चात चमाओन होईत छै ,संग , डाला, पेटार , श्रृंगार सामग्री ईत्यादी देल जाईत छै ।
अंत में सामा के फोड़बाक विधि छै जे भाई सभ ठेहुन लगा क फोड़ैत छथि ताहि स पुर्व बहीन सभ भाई के फांढ भरै छथि जाहि मे चूड़ा गूड़ के प्रधानता रहैत छैक मुदा वर्तमान में मधूर फल बगैरह से हो देल जाए लागल छै । तत्पश्चात बहिन लोकनि बटगबनी, समदाऊन ईत्यादी गबैत जोतला खेत में प्रस्थान करैत छथि जतय प्रकाश हेतु मशाल जड़ा के सामा के भसान करैत छथि।त कतहुं केरा के थम्व के बासक करची में गांथि ओहि पर सामा के राखि पोखरि में भसाओल जाईछ ।
भाई बहिन के सिनेहक ई परंपरा अक्षुण्ण रहबाक चाहि।