“पावनि भाइ-बहिनक पावनि थिक सामा-चकेबा।”

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— अर्चना मिश्र     

मिथिलांचल मे सामा चकेबाक खास महत्व छैक। ई पावनि भाइ बहिनक पावनि थिक। ओनातँ सब पावनिकेँ अपन-अपन महत्व छैक, ई भाइ बहिनक स्नेह आ दुलार दर्शबैत अछि। कार्तिक मासक शुक्ल पक्षक दुतिया तिथिसँ शुरू होइत अछि। सामा चकेबा अराधवा सँ पहिने गोसाओनिक गीत होइत छैक ,तखन श्रीसामा बनाउल जाएत छैक। दाइ, काकी, बेटी, धी मील गीत गबैत छथि।
गाम के अधिकारी तोहे अपन भैया हे
भैया हाथ दस पोखरि खुना देह
चम्पा फूल लगाय देह हे
भैया लोढ़ल भौउजो हार गाँथु हे
आहे सेहो हार
पहिरथु अपन बहिनो सामा चकेवा
खेल करु हे

एकर पाछाँ एकटा पौराणिक कथा अछि। सामा भगवान श्रीकृष्ण एवं जाम्बवतीक कन्या थिकीह। ओ एक भाइ एक बहिन रहैथि भाइक नाम साम्ब छलनि। सामा देखवामे बड सुन्दर रहथि। बच्चामे सब दिन ॠषि मुनिक आश्रम जा खेलाइथ। जखन ओ विवाहक योग्य भेलीह तँ वृन्दावनक चकेवा नामक युवक सँ विवाह भेलनि। विवाह भेलो पर ओ सब दिन ऋषि मुनिक आश्रम मे आबथि ।एक दिन चुड़क नामक दुष्ट हुनका आश्रम जाइत देखलकनि ओ ई बात श्रीकृष्ण सँ कहि देलक कृष्ण खिसिआकेँ सामाकेँ श्राप देलखिन्ह अहाँ अपन घर द्वार छोड़ि आश्रम मे घुमैत छी तँ अहाँ पक्षी भऽ जाउ। पिताक श्राप सँ सामा पक्षी भऽ गेलीह।
सामाक वियोग चकेवा नहि सहि सकला ओ महादेव केँ घोर तपस्या कयलनि आ वरदान स्वरुपक ओ पक्षी भऽ गेला। ई गप जखन सासाक भाइ साम्बकेँ बुझल भेलनि तँ ओ बहुत दुखी भेला। अपन पिता श्रीकृष्णकेँ प्रसन्न करवामे लागि गेला। भजन कीर्तनक’ पिता केँ प्रसन्न कैलनि। आ अपन बहिन बहिनोइ केँ पक्षी योनिसँ मुक्त करबाक याचना कयलनि ।
कार्तिक शुक्ल पक्षक दोसर दिनसँ पूर्णिमा दिन धरि स्त्रीगण लोकनि सामा चकेबाक संग संग चुगिला वृन्दावन एवं विभिन्न तरहक प्रतिमा आ चिड़िया बना चङेरा साँठि पूर्णिमा क सामा केँ सासुर पठाबथि और चुगिला वृन्दावन डाहथि। पृथ्वीपर स्त्रीगण लोकनि द्वारा एहि तरहक कार्य कए जाएत तखन ओ मुक्त हेति। भाइक अथक प्रयास सँ सामा चकेवा मनुष्य शरीर प्राप्त कयलनि।

साँझ कऽ घरक काज सँ निवृत भऽ चारि पाँच महिला एक ठाम बैसैत छथि। खेल प्रारम्भ होएबासँ पहिने सामा चकेबाकेँ दीप लेसि दैत छथि।
वृन्दावन जड़बैत ओकरा मिझैबाक प्रयास करैत छथि।
वृन्दावन मे आगि लागल केओ नहि मिझाबहि हे
हमर भैया अपन भैया दौड़ि दोड़ि मिझाबहि हे।

ओकर बाद चुगिला जराओल जाइत अछि।
चुगिला करै चुगलपन बिलाड़ि करै मिआऊँ
चुगिला रे तोहर एहने वाँनि गाँड़िसँ गेलो निछकका पानि।
स्त्रीगण आ धीयापूता सभ अपनअपन चङेरा लऽ गोलाकार मे बैसि जाइत छथि।
सामा चकेवा अइह हे
जोतला खेतमे बैसिह हे
ढ़ेपा फोरि फोरि खइह हे,खइह हे।
सब अपन सामा एक दोसर सँ बदलैत छथि
जीबो जीबो जीबो कि तोरभैया जीबो की मोर भैया जीबो
कि लाख बरिस जीबो
जैसन समुद्र सेमार तैसन भैयाक टीक
जैसन कड़रिक थमभ तैसन भैयाक जांघ जैसन
धोबियाक पाट तैसन भैयाक पीठ
जीबो जीबो तोर भैया जीबो मोर भैया जीबो।

आब सब स्त्रीगण डाला एक दीस राखि सामा खेलाय लगैत छथि। और मनमे भाइकेँ दीर्घायु सुख समृद्धिक कामना करैत छथि सामा केँ विदा करवाक काल नवका गुड़, चुड़ा,दही पान सुपारी नैवेद्य देल जाइत छनि।
तामल खेत सामाक सासुर बुझल जाइत अछि। गोड़ लागि विदा करैत छियनि सभ भाइ सुख समृद्धि धन धान्य सँ भरल पुरल रहथि।

अर्चना मिश्रा “अर्शी ”
पूर्णिया बिहार
4/11/22