“लोकगीतमे संवेदना, अनुभूति आर अभिव्यक्तिक उद्दीप्त तीव्रताक समावेश होइत छैक।”

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— आभा झा       

” मिथिलाक लोकगीतकेँ सहेजैत आ सुरक्षित राखैत स्त्री कंठ-
मिथिला विश्वक महान सांस्कृतिक धरोहर क्षेत्रमें सँ एक प्रमुख क्षेत्र अछि। मिथिलामें असंख्य लोकगीत अनादि काल सँ चलल आबि रहल अछि।एहि परंपराकेँ कायम रखैमें अपन मिथिलाक स्त्रीगण सब पाछू नहिं छथि। अपन मिथिलामें लोकगीतक परंपरा वंशानुगत क्रममें चलल आबि रहल अछि।हमर सभक माय, बहिन,बाबी सब एहि परंपराक निर्वहन करैत आबि रहल छथि। बच्चाक जन्म पर सोहर गाबि कऽ प्रसन्नता प्रकट कैल जाइत छैक। बाबी, नानी बच्चाकेँ लोरी सुना कऽ सुतबैत छथि। विवाहक प्रत्येक विधि-विधानक समय स्त्रीगण सब गीत गाबि कऽ सुखद वातावरण उत्पन्न करैत छथि तथा हास-परिहास करैत छथि।वर्षा ॠतुमें ‘ कजरी ‘ फागुनमें ‘ फाग ‘ एवं चैतमें ‘ चैतावर ‘ गाबि कऽ वातावरणकेँ गुंजायमान करैत छथि।श्रमजन्यकेँ विस्मृत करय हेतु जाँत पिसै काल लगनी, बाट चलैत काल ‘ बटगमनी ‘ गबैत छथि।तिरहुति, मान, झुम्मर, बिरहा आदि मनोरंजन एवं आनंदक उद्देश्य सँ गाओल जाइत छैक। नचारी, महेश वाणी, साँझ, पराती आदि गीत गाओल जाइत छैक। मिथिलामें विशेष तौर पर विद्यापतिक गीत गाबैकेँ परंपरा अछि।एहि गीत केँ नचारी कहल जाइत छैक और एकर स्वरूप अर्द्धशास्त्रीय होइत छैक। नचारीमें भगवान शिवक स्तुति कैल जाइत छैन्ह। लोकगीत ओ वन्य वृक्षक समान होइत अछि, जकर जड़ि अतीतकालमें गहिंर रोपल रहैत छैक एवं ओहिमें नित नव शाखा, पात एवं पुष्प प्रस्फुटित होइत रहैत छैक। अर्थात लोकगीत यदि एक दिस कल्पना अछि तऽ दोसर दिस भावना एवं रसवृत्ति। लोकगीतमें संवेदना, अनुभूति और अभिव्यक्तिक उद्दीप्त तीव्रताक समावेश होइत छैक। दरअसल लोकगीत जीवनक आनंदक दोसर नाम अछि।विंध्यावासिनी देवी, शारदा सिन्हा, मैथिली ठाकुर जेहेन कलाकार सब लोकगीतक लोकप्रियताकेँ संग सभ्य लोकक बीच पराकाष्ठा पर पहुँचेने छथि। एकरा कायम रखनाइ बहुत जरूरी छैक। जे आइ काल्हि यू ट्यूब पर काफी प्रचलित भऽ रहल अछि। लोकगीतमें लोक संस्कृति मुखरित होइत छैक। एहि गीतकेँ सीखैकेँ लेल स्त्रीगण सभकेँ कोनो शिक्षाक जरूरत नहिं पड़लनि। बल्कि, ओ अपन काजकेँ करैत, गाम घरक आयोजनमें शामिल होइत, अपन अग्रज या संगी-सहेलीकेँ गबैत देखि, सुनि-सुनि कऽ सीख लैत छथि और एक पीढ़ी सँ दोसर पीढ़ी तक ई सहज ही हस्तांतरित भऽ जाइत अछि। बहुत लोकक दृष्टिमें लोक संगीतकेँ लोक अशिक्षित संगीत मानैत छथि।हुनकर नजरिमें पढ़ल-लिखल लोक ई लोकगीत नहिं गबैत छथि। विकासक होड़में एहि तरहक सोच हुनका पर हावी छैन्ह, जे बिल्कुल गलत छैक। ताहि दुवारे, सांस्कृतिक जीवनकेँ संस्कार और जीवन सँ जोड़ि कऽ देखयकेँ जरूरत अछि। हमर लोकगीत हमर जीवनक लेल संजीवनी अछि। एहि परंपराकेँ अपन मिथिलाक स्त्री कंठ सहेजने आ सुरक्षित रखने छथि। जाहि पर हमरा गर्व अछि।जय मिथिला जय मैथिली।

आभा झा
गाजियाबाद