“पूरा विश्वमे मधुबनी चित्रकलाक प्रशंसक छथि”

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–आभा झा     

मिथिलाक_ विश्वप्रसिद्ध _कला
मिथिलाक विश्वप्रसिद्ध कला मधुबनी चित्रकला बिहार राज्यक मिथिला क्षेत्रमें प्रचलित अछि। पूरा विश्वमें मधुबनी चित्रकलाक प्रशंसक छथि। नई दिल्लीमें कला और शिल्प संग्रहालयमें सेक्रेड आर्ट संग्रहालय, जापानमें मिथिला संग्रहालय, नार्वेकेँ संग्रहालयमें और एहेन कतेक महत्वपूर्ण संग्रहालयमें मधुबनी चित्रकलाक बहुत रास संग्रह राखल छैक। आधा सदी पहिने तक, ई अद्भुत लोक चित्र कला परंपरा दुनियाक लेल अज्ञात छल।आपदा ने केवल सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य बदलैत अछि, बल्कि मानवक सोच सेहो बदलि दैत अछि। 1934 में मिथिलामें ठीक यैह भेल छल। उत्तर बिहारक अधिकांश गामकेँ तबाह करय वाला भयंकर भूकंपक बाद, ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी डब्ल्यू जी आर्चरक नेतृत्वमें एक दल गामक सर्वेक्षण केलनि। ओतऽ ढहि गेल देवाल पर आर्चरकेँ किछु चित्र देखेलनि। ओ ओहि चित्रकेँ तस्वीर खींचि क’ कला और संस्कृतिक प्रख्यात पत्रिका, मार्ग, में एक विस्तृत लेख प्रकाशित केलनि।हालाँकि आर्चरक लेख कलाक एहि नब शैलीक प्रति कतेक कला प्रेमीकेँ आकर्षित कयलक।मुदा सरकार केँ , मधुबनी चित्रकलाकेँ भारतक लोकप्रिय कला परंपराक रूपमें सामने आनैमें और तीस वर्ष लागि गेल। भूकम्पक ठीक तीस वर्ष बाद, 1964 में जखन मिथिला क्षेत्र भयंकर सूखाकेँ चपेटमें आबि गेल छल, तखन अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्डक तत्कालीन निदेशक डाॅ पुपुल जयकर मिथिलामें महिला सभकेँ कैनवास, कपड़ा, कागज और बोर्ड जेहेन विभिन्न हल्लुक आधुनिक माध्यमक संग प्रयोग करयमें प्रशिक्षित करयकेँ लेल मुंबई में रहय वाला कलाकार, भास्कर कुलकर्णीकेँ पठेने छलखिन।
मिथिलाक राजा जनक अपन बेटी सीताक विवाहक तैयारी करैत समय अपन राज्यक महिला सभ सँ अपन घरकेँ सुंदर चित्र सँ रंगय लेल कहलखिन। राजा एतेक उदार छलखिन कि ओ चित्रकारीक लेल कोनो विषय चुनयकेँ अनुमति द’ देलखिन। मैथिलीमें कोहबर घरक अर्थ अछि विवाह कक्ष और प्रजनन चित्र सँ एहि विवाह कक्षक सजावट केनाइ, मधुबनी चित्रकलाक एक प्रमुख पहलू अछि। मधुबनी चित्रकला बेसीतर प्राचीन महाकाव्य सँ प्रकृति और दृश्य और देवताक संग पुरूष और हुनकर सहयोगकेँ दर्शाबैत अछि। मधुबनी कलामें पांच विशिष्ट शैली, अर्थात भर्णी, कच्छनी, तांत्रिक, गोदा और कोहबर छैक। 1960 के दशकमें भर्णी, कच्छनी और तांत्रिक शैली मुख्य रूप सँ ब्राह्मण और कायस्थ महिला द्वारा कएल जाइत छल। भारत और नेपालमें ऊँच जातिक महिला छलीह हुनकर विषय मुख्य रूप सँ धार्मिक छलनि और ओ अप्पन चित्रमें देवी- देवताक, वनस्पति और जीवकेँ चित्रित केलनि। निचला जातिक लोकक चित्रकारीमें हुनकर दैनिक जीवन और प्रतीक, राजा सहलेसक कथा हुनकर चित्रमें शामिल छलनि।आइकाल्हि मधुबनी कला वैश्वीकृत कला रूप बनि गेल अछि, ताहि दुवारे जाति व्यवस्थाक आधार पर एहि क्षेत्रक कलाकारक काजमें कोनो अंतर नहिं छैक। आब सब लोक पांचो शैलीमें काज क’ रहल छथि।आब मिथिलाक लोक कलाकार कोनो परिचयक मोहताज नहिं छथि। आर्थिक सफलताक संग मिथिलाक लोक कलाकार आब यात्रा करय लगलाह और विदेशमें सेहो अपन चित्रकारीक लाइव शो करय लगलाह। रेडियो, टीवी संग मोबाइल फोन पर प्रचार हुनकर एहि कलाकेँ विश्वमें फैला रहल अछि। एहि वजह सँ मधुबनी कलाकेँ विश्वव्यापी ध्यान भेटल अछि। कतेको कलाकारकेँ एहि लेल पुरस्कार सँ सम्मानित कयल गेल जेना- सीता देवीकेँ 1975 में राष्ट्रीय पुरस्कार भेटलनि। 1981 में सीता देवीकेँ पद्मश्री भेटल छलनि। 1984 में बिहार रत्न और 2006 में शिल्प गुरू द्वारा सम्मानित कयल गेलनि। जगदंबा देवीकेँ मधुबनी चित्रकलामें अविश्वसनीय योगदानक लेल पद्मश्री पुरस्कार सँ सम्मानित कयल गेलनि। 1984 में गंगा देवीकेँ पद्मश्री भेटल छलनि। एकर अलावा बौआ देवी, यमुना देवी, शांति देवी, चानो देवी, चंद्रकला देवी, शशिकला देवी, गोदावरी दत्ता, अंबिका देवी, भारती दयाल, मनीषा झाकेँ सेहो राष्ट्रीय पुरस्कार भेटल छलनि। मधुबनीकेँ विभा कुमारी लालकेँ वर्ष 2022 लेल मिथिला पेंटिंग लेल राष्ट्रपति पुरस्कार सँ सम्मानित कयल जायत। मधुबनी चित्रकला प्राचीन कला रूपक असाधारण जीवन शक्तिक झलक प्रदान करैत अछि। हमसब मिथिलावासी एहि लेल गौरवान्वित छी।जय मिथिला जय मैथिली।