“मिथिलाक विश्वप्रसिद्ध कला”

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–इला झा

मिथिला चित्र मात्र सौन्दर्यबोध वा कलात्मक अभिव्यक्तिक माध्यमटा नहि बल्कि एकर जड़ि अतीतक अपरिमित सीमा तक पसरल अछि। एकर एक-एक अभिव्यंजना कोनो अनबुझ मंत्रक जेना अन्तश्चेतनाक अतल गहराईसँ उठ’वाला उर्जा – ध्वनी जंका प्रकल्पित अछि। अहि प्रकम्पनक निरंतरता अहि जीव-जगतक ऐहिक सुख अछि।
विश्व प्रसिद्ध मिथिला चित्रकला वा मधुबनी चित्रकला बहुत प्राचीन अछि। राजा जनक राज्यकाल मे महिलावर्गकेँ चित्राकारीक शिक्षा देल जाइत छल । चित्र आ चित्रण के प्रथा मिथिलामे चिर कालसँ आबि रहल अछि। ई चित्रकला भित्ति, भूमि आ धरातल पर द्विआयामी रहल अछि। पहिले बांसक अग्र भागक पातर कूँची सँ चित्र, मिथिला चित्रकारी अंकन होइत रहै। जाहि मे देव, वृक्ष, मानव, पशु-पक्षी, लता, तरह-तरह के कोण आ योनि चित्र बनाओल जाइत छल ।। तरह तरहक पात, फूलक रस, गेरू, चाउर के आँटा सँ उज्जर रंग आ सुखैल पात आ पूआर के जराक’ कारी रंग बनैल जाइत छल। यज्ञ एवं संस्कारक आनन्दोत्सव – काल मे मिथिलाक घरमे चित्र-चित्रण परिपाटी छलैक आ एखनहुँ होइत छैक। ई कला स्त्री – पुरुष दुनु समान रूप सँ बनबैत छथि।
१९७० के दशकसँ तरह- तरहके प्रयुक्त सिंथेटिक गाढ़ रंगक प्रयोग होमय लागल।। जाहिमे चहटगर गाढ लाल, हरिअर आ नीला रंगक इस्तेमाल होइत छैक। चित्रमे सुन्दर आभा लेल पीअर, गुलाबी आ नेबो रंगक अद्भुत मेल रहैत छैक। मिथिला चित्र- परम्परामे चिंत्राकनक प्रारम्भ कोर सँ होइत छैक।कोरक मतलब भेल सीमा, जेना खेतक आरि।अहि लोक शैलीमे सभ तरहक चित्र रचना कोर सँ सज्जित क्षेत्रमे कैल जाइत छैक।चाहे भित्ति पर बनेबाक हुए वा भूमि, कागज वा कपड़ापर। अंत मे कहल जा सकैत अछि”कोर मिथिला संस्कृतिक सौरभ अछि।“
मिथिला चित्र शैलीमे प्रयुक्त होव’ वाला प्रतीक लोक-जीवन सँ जुड़ल दैनन्दिन उपयोग प्राकृतिक अव्यय अछि जाहिमे साहित्य, कला, धर्म आ परम्पराक दृष्टिसँ विशेषार्थ होइत छैक ।परम्परानुसार प्रतीककेँ दूटा भेद होइत छैक- श्रेय एवं प्रमेय।
कमल, मांछ, सुग्गा, शंख, पुरइन, हाथी, सूर्य, चन्द्रमा, कलश, नयन, योनि चित्र आदि श्रेय प्रतीक मानल जाइत अछि जखन की साँप, बिच्छू, भौरा, मेढ़क, मगरक चित्र आदिकेँ प्रमेय प्रतीक मानल जाइत अछि। ई सम्पूर्ण प्रतीक शुभ आ मंगलकारी मानल गेल अछि।
सन १९७५ मे मिथिला चित्रकारी लेल पहिल पद्मश्री पुरस्कार जगदम्बा देवीकेँ भेटलैन। सीतादेवी मधुबनी लग जितबार ग्रामकेँ छथि हुनका १९८१,१९८४,२०६ मे पुरस्कार भेटलनि।

सीतादेवीक बनाओल चित्रकारी ‘कदम का पेड़’ इन्दिरागाँधी अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पर ४ लाख ३६ हजार मे बिक्री भेल। २०२० सैफरन आर्ट गैलेरीमे चित्रकार अविनाशक ‘नटराज ‘ बोली लागल जे दू लाख ८४ हजार मे बिकल। २०२० मे गोदावरी देवीके पद्मश्री भेटलनि। साड़ी पर मिथिला चित्रकारी लेल प्रथम पद्मश्री पुरष्कार भाष्कर कुलकर्णीकेँ भेटलनि। जापानके मिथिला म्युजियममे गोदावरी देवीक मिथिला चित्रकला सुशोभित छनि।
हालहिमे मधुबनी जिला सौराठमे सुन्दर मिथिला कला एवं संस्कृति केन्द्रक स्थापना भेल अछि जे निश्चित रुपे कलाक क्षेत्र मे नव अध्याय जोड़त। मधुबनी रेलवे स्टेशन भवनक देवाल पर बनल अद्भुत मिथिला चित्रकला शोभायमान भ’ रहल अछि।भारतीय रेलक अनेको डिब्बा रंगबिरंगा आ मोहक चित्रकला सँ सुशोभित देश भरिमे अहि विधाक मान बढ़ा रहल अछि।
जय मैथिली, जय मिथिला