“बाढ़िमे दहाइत मिथिला”

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— उग्रनाथ झा।             

मिथिला भारत के एकटा एहन क्षेत्र जे सतत आपदा / विपदा सं दू चारि होएत रहल अछि आ मैथिल सभ तरहे मोन मसोसि झेलवा लेल अपना के तैयार कऽ लेने छथि । आपदा दु प्रकार के होई’छ – प्राकृतिक आपदा आ मानव जनित आपदा । दूनू भी स्थिती महादुखदायी होईत छैक । मिथिला के लेल प्राकृतिक आपदा में दहाड़क स्वरुप बहुत विभत्स रहल अछि । सभ साल ई मिथिला के समाजिक आर्थिक स्वरुप के डगमगाबैत रहल अछि । जेकर मुख्य कारण छैक उत्तर दिशा में स्थित हिमालय सं निखसैत अविरल जल धारा के स्त्रोत जेखरा हमरा लोखनि कोशी , कमला , बागमति, गंडक , धेमूरा , जीबछ , भूतही बलान , इत्यादि नाम सं जनैत छि । ई जल स्रोत सालों भरि कमोबेश जल प्रवाह क्षेत्र बनल रहैत छैक मुदा जहन पानि बुन्नि के समय आबैत छैक त मानसुन प्रकोप स आतिबृष्टि के सानिध्य पाबि विकराल काल रुप धारण कय लैत अछि । फलस्वरूप ई प्राणदायिणी / पुणयदायिनी जलधारा आपन अठखेली करैत आपन जलप्रवाह क्षेत्र सं बाहर उन्मादित भऽ गाम घर खेत खरिहान होईत विदा होईत छथि त ई विनाशी स्वरूप बाढ़ि/ दहाड़ नाम सं जानल जाईत छैक । जल प्रवाह क्षेत्रक एहन विस्तार क्षणिक होईछ मुदा एकर विभत्सता एतेक जे गाम के गाम विरान क दैत छैक , लहलहाईन खेत खरिहान सुन्न मशान भ जाएत छैक । मनुष्य ,पशु घर द्वारि सभ भसि जाईत छैक । पिता के सोझा पुत्र भसिया जाई छै पत्नी सोझा पति , कतेक के त सूतली राति पता ने चलै छै जे कि भेल आ जीवन लिला समाप्त । ज़िन्दगी भरि पेट काटि जमा धन सं बनल मकान धारा साहि पर मैथिल मौन ।ततेक दिन सँ एहि त्रास के झेलला जे आब अभ्यस्त भ गेल छैथ ।ताहि कारण मैथिल लोकनि मुँहतक्की में रहि जाएत छैथ किएक त ई त आपदा छैक एहि पर ककर जोड़ चलतै । किछु लोकनि जलधारा संग आयल गाईद में उत्तम खेतीक लक्षण देखाएत छन्हि , त किछु लोकनि के मछहर के अवसर । सभ अपन अपन विचार धारा में विभक्त भ जाए छथि ।
ई निर्विवाद छै जे ई प्राकृतिक आपदा पर जोर ककरो नहि मुदा सचेत मानसिकता एहि विकासवादी दौर में आधुनिक तकनिकी के सफल उपयोग करैत एकरा कम क सकै छै । मुदा करत केँ । हमरा लोकनि त आपदा में अवसर ताकिए लेने छि , ओहि पर सं सरकार खराति के बांटि मोन मोहिए लैत छैक । फेर जरूरतें की ? आपदा में उत्सव मना फेर सभ शांत । कनि सोचल जाए जे छल प्रवाह क्षेत्र पहाड़ सँ सतत चलैत रहत ओकरा संग मलबा से हो होएत जे सतत नदि के तलहट्टी के के भरि छिछला बना दैत छै , फलस्वरूप जलधारण क्षेत्र में कमी आबैत छैक , ताहि लेल तलहटी के गादि के निराकरण होएबाक चाहि । नदि पर उचित मापदण्ड में बाँध के निर्माण/ मरोम्मति होएबाक चाहि मुदा एतय खानापूर्ति होएत छैक , अगर सभ नदि के एक दोसरा सँ जोड़ी नहरि के रूप में विकसित कयल जाए त नदि के जलधारण क्षेत्र के विकास होएत संगहि कृषि क्षेत्र पटौनी के वैकल्पिक सशक्त साधन बनत । यदि विशाल प्रवाह क्षेत्र पर डैम के निर्माण क जलशक्ति के निर्माण कयल जाए त उर्जा उत्पादन के प्रबल संसाधन भेटि सकैत छै । संगहि दहाड़ के प्रभाव के न्यूनतम कैल जा सकै छै । जे मिथिला गरिबी , बेरोजगारी सं मुरझायल जा रहल छैक ओकरो देह पर रोहानि आओत । मुदा करत केँ? हम मैथिल त विभक्ति में विश्वास रखै छि । एक भाग दहायल त दोसर भाग झिलहरि खेलाएत । नदि सभ पर पूल पूलीया के निर्माण हेतु ओहि स्थल पर नदि प्रवाह क्षेत्र के संकुचित कैल जाएं छैक फलस्वरूप जज ल प्रवाह के दबाव छहर पर पड़ैत छैक । जे टुटबाख कारण बनैत छैक ।आई तक समग्र रूपे एहि विभिषिका सँ निजात लेल सरकारक समक्ष संपूर्ण मैथिल के एकजूटता देखबा में नहि आयल अछि । पता नहि मैथिल कहिया जगता । बाढ़ नियंत्रण के स्थान समवर्ती सूची में छैक ।जेकर संवैधानिक प्रावधान छै राज्य सरकार अपन संसाधन के तहत प्राथमिकता के आधार पर योजना बनाबथि । मुदा योजना त एहन ने बनै जे जेबी भरै । बाढ़ि के योजना त जेबी पर डाका देतै ।केन्द्र सरकार मात्र तकनिकी सलाह संवर्धन कै सुविधा द सकै छै ।उक्त परिस्थिती में दहाड़ के स्थायी निदान क राज्य सरकार अपन पैर पर कुरहैर कतौ मारैं । जौ सुखाड़ छै त बांध मरम्मति नाम पर भरि मोन लुट जौ दहाड़ आबि गेल त एहन अवसर और कोन भेटतै जे मन माना उगाहि हो राहत नाम पर लूट , बचाव नाम पर लूट , पुनर्वास नाम पर लुट । एहन दूधारु गाय ताहि पर अंकुश लगा मुंह में जाबि लगायत भला एहनो कतौ भेलै अछि ।हो ने हो लेकिन कतौ ने कतौ हमहुँ सभ एहि लेल दोषी छि ।एहि बात सँ विलग नहि भ सकै छि जे बस्ती के सटल जौ बान्ह छै त सभ काज ओतय करब मवेशी बांन्हव , नार- प्वार के टाल लगाएब,निधेश जमा करब फलस्वरूप मुश के उपद्रव बढ़ैत अछि जिर्ण शिर्ण बांध में बिहरि क दैत छैक जाहि कारण बांध में पानि के प्रवाह के बांध तोड़बा के सामर्थ्य बढ़ि जाएं छैक ।कैक बेर बांध नियंत्रण टीम के द्वारा एहुं तरहक आपत्ति देल गेलैक अछि । ताहि हेतु हमरा सभकेँ से हो अपन दायित्व के बुझबाक चाहि । मुदा जौ एहि आपदा सँ बचाव चाहैत छि त एकर स्थायी निदान हेतु सत्ता के जगाब पड़त। कुंभकर्णी निंद्रा के डिगडिगिया बजा क जगाबय पड़त ‌। एहि लेल आवश्यक जे मैथिल एकजूट होथि ।