“मिथिलाक विशिष्ट पाबनि”

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— अखिलेश कुमार मिश्र।     

मिथिला आ सिर्फ मिथला के पावनि चौरचन, खूब पूरी पकवान खाई बाला पावनि चौरचन। असल में शब्द अछि चौठचन्द्र, अर्थात चारिम तिथि के चन्द्रमा मुदा इजोरिया पक्ष के। अहि शब्द कें कतौ कतौ चौठीचान सेहो कहल जाइत अछि। तs चौठचन्द्र बोलचाल के भाषा में चौरचन बनि गेल। ई पाबनि भादव महीनाक शुक्लपक्षक चतुर्थी तिथि के साँझ में चंद्रमा कें देखि कs मनाओल जाइत अछि। पूरा भारतवर्ष में केवल ई मिथिलांचल क्षेत्र में मनाओल जाइत अछि। वास्तव में अहि पावनि के मनेनाई कहिया सँ शुरू भेल तक्कर कुनो ठोस प्रमाणिकता तs नै अछि, मुदा कहल जाइत अछि जे मिथिलांचल के एक राजा जे महाविद्वान संगहि ज्योतिषाचार्य सेहो रहैथि, नाम हेमांगद ठाकुर जी ही अहि पावनि कें शुरुआत करेलाह। वास्तव में पावनि मनेबाक पाछाँ जे किस्सा प्रचलित अछि से अहि तरहें अछि:
भेल ई जे भादवक शुक्लपक्षक चौठ गणेशजीक जन्मोत्सव में एक बेर सभ देव सभ उपस्थित भेलाह। तs चन्द्रमा अपना के खूब सुन्दर बुझैत आ गणेशजीक हाथी बाला छवि देखि खूब हँसलाह आ गणेशजीक मजाक उड़ेलाह। गणेशजी हुनका पर अति कुपित भs गेलाह। गणेशजी के कुपित देखि हुनकर डरे चन्द्रमा सरोवर, जाहि में खूब मलकोंका (भैंट) के फूल रहै ताहि में नुका गेलाह। तहन गणेशजी चन्द्रमा के श्राप दs देलाह जे अहाँ कें जाहि छवि पर अतेक गुमान अछि अगर एक्कर केकरो दर्शन भs जैत तs ओकरा झूठे बदनामी के दोष लागत आ सभ ओक्कर मजाक उड़ैत जेना अहाँ हमर मजाक उड़ेलौं अछि। ई सुनि चन्द्रमा ओहि सरोवर में आर गुबदी मारि सुति रहला। एम्हर राति कs चन्द्रमा कें नै देखि रातिक सुन्दरता खत्म भs गेल। सभ अहि सँ व्याकुल होबs लागल। लोकक दुःख देखि ब्रम्हाजी चन्द्रमा कें सरोवर सँ निकलs कहला मुदा ओ शापित रहैथि तs मना कs देलैथि आ कहलैथि जे हमरा शापमुक्त करू। तहन ब्रम्हाजी गणेशजी कें आग्रह केलाह जे अहाँ चन्द्रमा कें शापमुक्त करू। गणेशजी चन्द्रमा कें शापमुक्त केलाह मुदा एक दिन भादवक चौठ कें ई दोष रहबे कड़त, से कहला। हाँ मुदा अगर ओहि दिन साँझ में लोक सभ अगर फल खास कs केरा या नारियल हाथ में लs कs चन्द्रमा कें दर्शन कड़त तs ई दोष नै लागत।
अस्तु किस्सा आगाँ बढ़बै छी। भेलै ई जे भादवक चौठीचानक दर्शन श्रीकृष्ण भगवान कें औचक भs गेलैन्ह। मुदा ओ अहि पर ध्यान नै देलाह। द्वारका में सत्राजित नामक एक ब्राम्हण छलाह। सत्राजित बड्ड पैघ सूर्यभक्त छलाह। हुनकर भक्ति कें देखि कs सूर्य भगवान हुनका एक मणि प्रदान केलाह जेक्कर नाम स्यमंतक छल। अहि मणि के विशेषता ई जे जेकरा लग ई मणि रहत ओ एकदम निडर भs जैत संगहि मणि के सौंदर्य अद्भुत रहै। श्रीकृष्ण जीक नाना मथुरा नरेश उग्रसेन वृद्ध छलाह आ जरासंध के आक्रमण सँ पीड़ित भी, तैं श्रीकृष्ण सोचलाह जे ई मणि हम अप्पन नाना कें दी जाहि सँ ओ निडर रहता। मुदा अहि बातक भान जेखनहि सत्राजित के भेलै, ओ अहि मणि कें अप्पन भाय प्रसेन के द देलाइथि जे ई सोचि, मणि श्रीकृष्ण नै लs लैथि। प्रसेन ई मणि लs अति प्रसन्न भेलाह आ मणि के परीक्षा लै लेल जंगल मे शेर सँ लड़ि लेलाह। शेर प्रसेन के मारि कs खा गेल संगहि मणि सेहो। ओहि जंगल में ही रीछराज जामवंत सेहो रहैत रहैथि। हुनकर नजरि मणि युक्त शेर पर पड़ल जे राति में सेहो प्रकाशित रहै। जामवंत आ शेर में लड़ाई भेल। जामवन्त शेर के मारि मणि अप्पन बेटी जामवंती लेल ल गेलाह। एम्हर प्रसेन जंगल सँ वापस नै एलाह तs सत्राजित हल्ला उड़ा देलक जे हमर भाय प्रसेनक हत्या कs कs श्रीकृष्ण मणि लs लेलाह। झूठ सँ चोरी आ हत्या के अहि आरोप सँ श्रीकृष्ण बड्ड दुखी भेलाह। ओ मणि आ प्रसेन के हेरय लेल जंगल गेलाह। ओतय प्रसेनक मृत शरीर भेटल संगहि शेरक सेहो। ओतय जामवन्तक पदचिन्ह सेहो बनल छल। ओहि के देखि ओ आगाँ बढला तs जामवन्त के बेटी लग मणि देखलाह। ई मणि माँगलाह मुदा जामवन्त मणि नै देलैथि। श्रीकृष्ण आ जामवन्त कें बीच मणि लेल भयंकर युद्ध भेल। मुदा कियो केकरो सँ कम नै। अंत में जामवन्त सोचलाह जे ई के भs सकै छैथि जे हमरा सँ पराजित नै भs रहलाह अछि। ओ हाथ जोड़ि ई बात पुछलाह। तs भगवान श्रीकृष्ण हुनका सामने श्रीराम बनि दर्शन देलैथि आ कहलैथ जे अहाँ के द्वापर में दर्शन दै के कहने रही से आई पूरा भेल। जामवन्त सहर्ष ओ मणि दs कs आ अप्पन पुत्री जमवन्तिक विवाह श्रीकृष्ण जी सँ करबा देलैथि। मणि जनताक बीच में आनि आ वर्षोपरांत चौठचंद्रक पूजा कs श्रीकृष्ण भगवान प्रसेनक हत्या आ मणि के चोरी के आरोप सँ दोषमुक्त भेलाह।
मिथिला में तs अहि पावनि में उत्साहक तs वर्णने नै हो। एक ऐह पावनि अछि जाहि में अतेक रंगक नीक नीक मीठ आ नमकीन भोज्य सभ तैयार होइत अछि। अहि पावनि में काज कम आ खेनाइ ज्यादा। खाई-पिबs मामला में तs बुझु छैठ के उल्टा। छैठ में ओतेक रंगक ओरियान होइत अछि, मुदा खाई लेल कम, मुदा चौरचन में कम ओरियान आ भोजन बेसी।😃
तहन बचपन के स्मरण के अनुसार पूजा विधि सभ बता रहल छी। पुरैन पात सँग अष्टदल के अरिपन पर कलश ऊपर दीप राखि पश्चिम दिश मुँह कs पूजा होइत अछि। बड़का भालरि पर सभ तरहक नैवेद्य राखल जाइत अछि। थारी में खीर (तस्मै) आ नव मटुकुरी में दही। पूजा सफेद फूल जाहि में भैंट के फूल प्रमुख अछि, सँ पूजा कैल जाइत अछि। चन्द्रमा कें तरफ चेहरा कs अहि मन्त्रक
” सिंह प्रसेन मवधीतः सिंहो जाम्वबताहताः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्योष स्यमन्तकः।।”
मंत्रोच्चार कड़ैत चन्द्रमा कें दर्शन कैल जाइत अछि जाहि सँ अहि चन्द्र के दर्शन सँ कुनो दोष नै लागै।
अंत में
“दधि शंख तुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम्।
नामामि शशिनं सोमं शंभेर्मकुट भूषणम्।।”
के पढ़ैत चांदी के सिक्का सँ नुका कs थारी बाला तस्मै के काटै छी। अहि में चन्द्रमाक पूजा हेतु मुख्यतया स्त्रीगण ही व्रत राखै छैथि। साँझ में पूजा आ अर्घ्य के बाद व्रत तोड़ै छैथि। चौरचन पूजाक बाद भोज्य पकवान में नमकीन रूप में सभ तरहक तरकारी, तरुआ खास कs दालि पूरी आ ओलक चटनी मुख्य रहैत अछि। मीठा में पिरकिया (दुनू तरहक खोआ बाला आ सुज्जी बाला), टिकरी (खजूर), अनरसा आदि रहैत अछि संगहि दही आ खीर सेहो।
मिथिलांचल में किछु आदमी अहि दिन चन्द्रमा कें देखि हुनका दिस ढेपा सेहो फ़ेंकइत अछि। भारत के अन्य हिस्सा में अहि दिन चन्द्रदर्शन निषेध रहैत अछि। हाँ गणेश चतुर्थी कें रुप में गणेश पूजा आ उत्सव सेहो मनाओल जाइत अछि।
लेख लम्बा भs गेल, आ अतेक तरहक भोजन के वर्णन कड़ैत भूख सेहो लागि गेल। जाइ छी भोजन में।
धन्यवाद