“सिंहप्रसेन मवधीत सिंहोजाम्बवताहतः सुकुमारक मारोदीपस्तेह्षव स्यमन्तकः।”

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— आभा झा     

लेखनीकेँ धार- चौरचनक पाबैनकेँ चौठ चंद्र पाबैन सेहो कहल जाइत छैक। मिथिलाक संस्कृतिमें सदियों स’ प्रकृति संरक्षण और ओकर मान-सम्मानकेँ बढ़ावा देल जाइत छैक। मिथिलाक अधिकांश पाबैन-तिहार मुख्य रूप सँ प्रकृति सँ जुड़ल रहैत छैक,चाहे ओ छैठमें सूर्यक उपासना हो या चौरचनमें चन्द्रमाक पूजाक विधान। मिथिलाक संस्कृतिमें प्रकृति पूजा उपासनाकेँ विशेष महत्व छैक और एकर अपन वैज्ञानिक आधार सेहो छैक।
मिथिलामें गणेश चतुर्थीकेँ दिन चौरचन पाबैन मनाओल जाइत छैक। एहि दिन मिथिलाक लोक काफी उत्साहित रहैत छथि।लोक विधि-विधानक संग चन्द्रमाक पूजा करैत छथि।घरक महिला पूरा दिन व्रत करैत छथि और सांझक समय सूर्यास्त भेला और चंद्रमा केँ प्रकट भेला पर घरक आँगनमें सब सँ पहिने अरिपन बनाओल जाइत छैक। ओहि पर पूजा-पाठक सब सामग्री राखि क’ गणेश तथा चन्द्रमाक पूजा करैकेँ परंपरा छैक। एहि पूजामें कतेको तरहक पकवान जेना- खीर-पूड़ी, पिरूकिया,तथा मिठाई में खाजा-लड्डू तथा फलक तौर पर केरा,खीरा,
सेब,संतोला आदि चढ़ाओल जाइत छैक। घरक बुज़ुर्ग स्त्री या व्रती महिला आँगनमें बाँसक बनल डालीमें सब सामग्री राखि क’ चन्द्रमाकेँ अर्पित करैत छथिन,यानी हाथ उठबैत छथि।एहि दौरान अन्य महिला सब गीत गबैत छथि ‘ पूजाकेँ करबै ओरियान गै बहिना’, ‘ चौरचनकेँ चँदा सोहाओन ‘। ई दृश्य अत्यंत मनोरम होइत छैक। मिथिला
में चौरचन मनाबैकेँ पाछू एक खास तरहक मनोवृति छिपल अछि।मानल जाइत अछि कि एहि दिन चन्द्रमाकेँ शाप देल गेल छलनि।यैह कारण अछि कि एहि दिन चन्द्रमाकेँ देखला सँ कलंक लागैकेँ भय होइत छैक। परंपरा सँ ई कथा प्रचलित अछि कि चन्द्रमाकेँ अपन सुंदरता पर बहुत घमंड छलनि। एक बेर गणेश जी कतौ स’ भोजन करि क’ आबि रहल छलाह। रस्तामें हुनकर सोझा चन्द्रमा आबि गेलखिन। गणेश जीकेँ पैघ उदर और सूंडकेँ देखि क’ चन्द्रमा अपन सौंदर्यक अभिमानमें हँसै लगलाह। चन्द्रमाक एहि व्यवहार सँ गणेश जीकेँ क्रोध आबि गेलनि।क्रोधित भ’ गणेश जी चन्द्रमा सँ कहलखिन कि अहाँकेँ अपन रूपक अहंकार भ’ गेल अछि ताहि दुवारे हम अहाँकेँ शाप दैत छी। अहाँकेँ जे देखत ओकरा समाजमें झूठक कलंक लगतै। तखन शाप सँ मुक्ति पाबैकेँ लेल चन्द्रमा भादब मासक चतुर्थी तिथि क’ गणेश भगवानक पूजा केलनि।तखन जा क’ गणेश जी कहलखिन, “जे आजुक तिथिमें चन्द्रमाक पूजाक संग हमर पूजा करत, ओकरा कलंक नहिं लगतै”।ई प्रथा तखने सँ प्रचलित अछि।चौरचनक पूजा लोक सदियों स’ एहि अर्थमें मनबैत आबि रहल छथि।चौठचंन्द्रक पूजाक दौरान मइटक बासन, जकरा अथरा कहैत छियै ,ओहिमें दही जमाओल जाइत छैक। चौरचनक पूजाक दौरान दहीकेँ बड्ड महत्व छैक। चंद्रमाक इजोत सँ शीतलता भेटैत अछि। एहि इजोतकेँ इजोरिया कहैत छैक।भादब मास अमावश्याकेँ बाद चतुर्थी तिथि क’ लोक चन्द्रमाक पूजा करैत छथि, जाहि सँ दोष निवारण होइत छैक। चौठचंन्द्रक पूजामें एक विशेष श्लोक पढ़ल जाइत छैक-
सिंहप्रसेन मवधीत सिंहोजाम्बवताहतः
सुकुमारक मारोदीपस्तेह्षव स्यमन्तकः।।