“कर्तव्यबोध”

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— इला झा।           

सुरुचि एक कर्तव्यपरायण, मृदुभाषी स्त्री रहथि। अपन पति आ पाँच सालक बेटा संग बहुत खुशहाल जिनगी बितैत रहैन। ओ पाककला मे सेहो सिद्धहस्त रहथि। अपन स्वादिष्ट भोजन सँ सभक मोन पर राज करथि। पति आ पूरा परिवार हुनका पाबि गर्वित रहनि।
एकाएक हुनक जिनगी मे अप्रत्याशित घटना भेलैन। हुनक पति गंभीर रुपे बिमार पड़लथि। बहुतो अस्पतालक चक्कर के बादो ओ हुनका बचा नहि सकलथि। ओ किंकर्तव्यविमूढ़ रहथि, आँखिक आगु बस अन्हार रहनि। आब हुनक आगू जीवनयापन आ एकमात्र बेटाक शिक्षाक
समस्या रहैन। तखनहि हुनक मन मे कैटरिंग सर्विस चालू करबाक विचार एलनि। ओ अपन बूढ़ दादी के हृदय सँ धन्यवाद देलथि, विवाह सँ पहिने भोजन बनेनाइ जरूर एबाक चाही ताहि पर हुनक बहुत जोर रहैन। शनैः-शनैः ओ पाककला मे निपुण भेल गेलथि।
हुनक कैटरिंग सर्विस चलि पड़लैन। बहुत डिमांड आब’ लगलनि। ओ अपन बेटा के उच्च शिक्षा देलथि। ताहि सँ नीक नौकरी भेलैन आ संगहि विवाह सेहो भ’ गेलैन। बेटा अपन पत्नी संग अपन कार्यस्थल पर चलि गेलथि। किछु दिन बाद सुरुचि बेटा पुतौहु सँ भेंट कर’ दोसर शहर पहुँचलथि। ओ सुस्वादु भोजन बना बेटा पुतौहु के खुआबथि। पुतौहु के रवैया भनसाघरक प्रति उदासीन रहनि। अपन सासु के कोनो मदद नहि करथि। सब्जी कटनाइ वा घरक कोनो काज नहि करथि।सासु सेहो हुनका अहि विषय मे किछु नहि कहथि।
एक दिन बेटा कहलकैन जे हमर विवाहक वर्षगांठ के दिन बाॅस हुनक पत्नी आ किछु आफिस के लोक भोजन पर निमंत्रित छथि। माय तरह तरहके व्यंजन बनब’ मे जुटि गेलीह ।भोरे उठि पूजा-अर्चना के बाद चुपचाप खाना बनबैत रहथि। एकाएक बेटा – पुतौहु के बीच जोर जोर सँ वार्तालाप सुनाई देलकैन। आइ के दिन दुनु मे झगड़ा सँ आहत भेलथि। पुतौहु कहैत रहथि जे साउस नीक खाना बनबैत छथि, परन्तु पढ़ल नहि छथि, मेहमान के सोझा नहि आबथि। मेहमान लग ओ समस्त भोजन स्वयं बनेलीह से कहती ताहि सँ हुनका सभक बीच वर्चस्व बनि जेतैन। परन्तु यदि कियो व्यंजन बनेबाक विधि पूछत त’ हम की कहबै। ओ शर्त रखलथि जे सासु अप्पन कोठरी सँ मेहमान केँ गेलाके बादे बाहर होइथ। सुरुचि सब सुनि लेलथि, मन आहत भेलैन। पूरा भोजन बनेलाके बाद गाजर केँ हलुआ मे ऊपर सँ कटल मेवा छीट’ केँ आदेश देलथि। ओ आराम कर’ लेल अपन कोठली मे चलि गेलथि, हुनका आब नहि बजैल जाइन से कहि आगु बढ़लथि।
हुनका मेहमान सब जे भोजन करैत रहथि,हुनक प्लेटक आवाज सुनाइ दैत रहनि। तखनहि कोठरी खटखटेबाक आवाज एलनि। ओ अपन मोचड़ायल साड़ी ठीक करैत दरवाजा खोललथि। सामने मे एकटा संभ्रांत व्यक्ति के अपन पत्नी संग ठाढ़ पओलथि।देखला सँ ओ बहुत धनवान लगैत रहथि। ओ व्यक्ति अपन पत्नी के चाची के पैर छूब’ कहलखिन। अपनहुँ प्रणाम करैत कहलथि जे हुनकर बनाओल सुस्वादु भोजनक स्वाद ओ कहियो नहि बिसरि सकैत छथि।जखन ओ आठ साल के रहथि तखन हुनक माय बहुत बिमार रहैन, पिताक आदेश सँ चाचीक कैटरिंग सँ खाना लाबथि, संगहि माथ फेरि वात्सल्य स्नेह सेहो भेटैत रहनि। ओ हुनक बेटाक बाॅस रहथि।चाची सँ आग्रह रहैन जे स्वादिष्ट गाजर के हलुआ पैक क’ देथि। ओ सुरूचि के देखि बहुत आनन्दित रहथि, हुनका अपन घर आबि कृतार्थ कर’ लेल कहलथि। बेटा चुपचाप ठाढ़ रहैन आ पुतहु लाज सँ सिमटल रहैन।
परन्तु अतिथिगण के गेलाके बाद पुतहु मे बदलाव एलनि। अपन सासुक प्रतिष्ठा केँ देखि बहुत प्रभावित भेलीह।दोसरे दिन सँ सासु केँ भनसाघर मे मदद कर’ लगलीह।स्वेच्छा सँ भोजन बनेनाइ सेहो सीख’ लगलीह।