“मिथिलाक भार आ भरिया”

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— कीर्ति नारायण झा।           

“भार एलैयए कहार एलैयए, गहना गुड़िया बनबै लए सोनार एलैयए” मिथिलाक इ प्रसिद्ध रचना स्वर्गीय रविन्द्र जी केर जाहि मे मिथिला मे भारक विशिष्टता के दर्शाओल गेल अछि। भार देवाक प्रथा मिथिला में आदि कालहि सँ आबि रहल अछि जकर शुभारंभ विधि केर सामान लऽ कऽ भरिया लोकनि अबैत छलाह जाहि मे विधिक सामान केर संग संग पावनि करय बाली के लेल वस्त्र आ फल फलहरी के सामान अबैत छल। एक सँ दू टा भार पर्याप्त होइत छलैक। लोक भरिया के बहुत सम्मान करैत छलाह कारण भरिया बी बी सी लंदन केर सम्वाददाता सेहो होइत छलाह। नव सम्बन्धी केर सम्पत्ति केर अतिरिक्त खान पान के स्तर के पता भरिया के माध्यम सँ भेटि जाइत छलैक। लोक भरिया के भोजन में तुलसी फूल चाउरक भात, नीक तीमन तरकारी तरूआ बरी सभ खुआबैत छलाह आ ओकर प्रचार ओ लोकनि अपन गाम में चौक चौराहा पर करैत छलाह। भार वास्तव मे पहिलो भारे होइत छलैक कारण पहिले सेहो आदमी के अभाव रहैत छलैक। किछु गामक दवंग लोकनि के छोड़ि कऽ आम ग्रामीण के बाबू भैया कयलाक उपरान्ते भरिया भेटैत छलैक मुदा जे होअय काज में भरिया केर उपस्थिति एकटा अनुपम स्थान रखैत छलैक। गामक लोक भरिया सभ सँ पूछैत छलाह जे अओ भरिया। कओन गाम सँ अयलहुं अछि? एक बेर एहिना एकटा घटना मोन पड़ल। मधुबनी जिला मे एकटा गाम छैक जकर नाम थिकै भरिया। ओहि गाम सँ एकटा भरिया भार लऽ कऽ हमरा गाम अएलाह। कनेक साँझ पड़ि गेल रहैक तऽ हमर छोटका कक्का पूछलथिन्ह जे के थिकहुँ अओ? ओम्हर सँ जबाब भेटैत अछि – भरिया। कओन गाम सँ अयलहुं अछि? उत्तर भेटलन्हि – भरिया। बाद में पता चलल जे वास्तव मे हुनक गामक नाम सेहो भरिया छैन्ह। सभ खूब हँसल। धीरे – धीरे गामक दवंग लोकनि सभ अपन शान देखेबाक लेल साठि – सत्तर टा भरिया के अपन सम्बन्धी ओहिठाम पठवय लगलाह। बीस टा भरिया दही लऽ कऽ, पाँच टा चूड़ा लऽ कऽ तऽ दस टा मिठाई लऽ कऽ, पाँच टा केरा घौर लऽ कऽ इत्यादि पठवय लगलाह। सभ गाम मे हल्ला होमय लागल जे फलाँ बाबू के समैध के ओहिठाम सँ अस्सी टा भार अयलनि अछि। अपना सभक ओहिठाम देखसी बहुत जल्दी समाज में पसरि जाइत छैक। तखन भरियाक भीड़ होमय लागल। गामक साधारण लोक अपना के असहाय पावि कुंठित होमय लगलाह। दहेजक संग संग कुटुमैती में भारक संख्या सेहो चर्चा होमय लागल जे हमर समाज पैघ अछि तें कम सँ कम पचास टा भार हमरा सेहो चाही ताकि हमर समाज सेहो देखि सकय जे केहन ठाम कुटुमैती कयलहुँ अछि। बाद मे ई वीभत्स रूप लऽ लेलकै। गाम सँ मजदूरक पलायन के कारण ई भार देबाक प्रथा धीरे धीरे समाप्त भऽ गेल। आब भारक सामान चारिपहिया सँ पहुँचा देल जाइत छैक। मिथिलावासी भारक भार सँ करीब करीब मुक्त भऽ गेल छैथि। आब ने ओ आदमी रहलाह ने ओहेन भरिया। आब लोक भारक बदला मे पाइये केर लेन देन कऽ लैत छैथि। एहि भार वला प्रथा सँ मुक्ति बर पक्ष आ कनियाँ पक्ष दुनू के लेल नीक भऽ गेल मुदा जे होअय लोक समय केर संग अपना के परिवर्तन कऽ लैत अछि मुदा भरिया कोनो काज में देखबा मे सोहनगर लगैत छलैक इ बात तऽ पूर्णरूपेण सत्य अछि। भरिया आ भार सँ कोनों पावनि अत्यन्त मनोरम लगैत छलैक, पावनि हल्लुक नहिं भरियाक भार सँ ओ भारी भऽ जाइत छलैक।