“जीवन के सार्थकता एहिमे अछि कि सबहक प्रति श्रेष्ठ भावना राखी”

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— अरुण कुमार मिश्र।               

 

प्रत्येक समाजक अपन विशिष्ट संस्कृति होइत अछि। संस्कृति शब्दक प्रयोग एहि रूप मे काएल गेेल अछि जकरा समाज सँ पृथक करब कठिन होइत अछि। विस्तृत अर्थमे संस्कृति शब्दक प्रयोग सामाजिक समूहक सम्पूर्ण जीवन शैली, पद्धति वा समूहक सामाजिक विरासत के रूप मे काएल जाइत अछि। एहि अर्थें संस्कृति शब्द समाज के अपना मे समाहित करैैत अछि। परञ्च समाज आ संस्कृति दु टा भिन्न अवधारणा अछि जे वस्तुतः सामाजिक जीवनक दु गोट आयाम अछि तँ एहि मे विभेद करब कठिन अछि।

मनुखक एक गोट समाजिक प्राणी अछि तँ समाजक उत्थानमे आपसी सहयोग आ समानताक बड महत्व छैैक। अद्दोकाल सँ समाजक निर्माण अही सिद्धांत पर होइत रहलैक अछि।समाजमे प्रत्येक मनुखक काज ओकर योग्यता वा क्षमताक आधार पर बाँटल गेल छलैक जे कलांतर मे जाति अनुगत काज रूपें जानल गेलैक। प्राचीन काल सँ स्थापित एहि परंपरा के जीवंत राखब हमर सभक जिम्मेवारी थिक।

पुरातन भारतीय संस्कृति आ वेद ग्रंथ मे कतयो कुनु भेदभावक वर्णन नहि अछि। वेदमे कर्म आधारित वर्ण व्यवस्थाक वर्णन भेटैत अछि। कलांतरमे निज स्वार्थवश विदेशी आक्रमणकर्ता द्वारा वेेदक मूल के नष्ट क’ वा मिथय व्याख्या क’ समाजमे विकृति उत्पन्न काएल गेलैक जाहि सँ जातिवाद, भेदभाव आ छुआछूत आदिक प्रवृत्ति बढ़ै गेलैक। तकर बाद धनिक आ गरीब भेदभाव अतेक बढ़ै गेलैक जे धनिक, उच्च आ सामंती वर्ग गरीब के हीनभाव सँ देखय लगलखिन्ह। अतवे नहि अपितु हिनक सभक छूल पानि ग्रहण करब, धर्म भ्रष्ट होयब मानय लगलखिन। एहि तरह के मोनमे कुंठाक भाव रखनिहार मनुुख अपन सोच के संकीर्ण क’ लैत अछि आ ओ समाजक लेल किछु नहि क’ पबैत अछि।

ज्यों समाजक सभ वर्ग शांतिपूर्वक एकजुट भ’ चलैक त’ स्वत: समाजक जड़ि मजबूत होइत जेतैक। प्राचीन कालिह सँ ऋषि-मुनि, संंत, समाज सुधारक आ समाजसेवी संस्था सभ देश के एकता आ समरसताक ताग सँ गुंथल माला पिरोवाक काज क’ रहला अछि। जेेना महात्मा गांधी अफ्रीकामे कारी आ गोर के भेद खत्म करवाक लेल आन्दोलन केने रहैथ। डा. भीमराव अंबेडकर देेश के संवैधानिक रूप देलन्हि, जाहि सँ समाज मे समानता अनवाक मे सफलता भेेटलैैक। समरसताक अर्थ समाज के एकजुट करब आ पारस्परिक भेदभाव के समाप्त करब थिक। ई काज सामूहिक रूपें संभव छैै। लोक के जागरूक होयब आवश्यक छैक, तखने समाज मे एकता आ समरसताक भाव उत्पन्न हेतैक। एहि लेल सभक शिक्षित होवाक संग जागरूक होमय पड़तैक। कहवाक तात्पर्य ई जे शिक्षा आ जागरूकता सँ सामाजिक एकताक लक्ष्य पाओल जा सकैत अछि।

भारतीय समाज मूल्य प्रधान समाज अछि। भारतीय संस्कृति मे मूल्य मनुख के सामाजिक, राजनैतिक आ धार्मिक जीवनमे विशेष स्थान रखैत अछि। मूल्य वास्तव मे संस्कृति अछि। वर्तमान समय मे विज्ञान मनुख के भौतिक सुविधा उपलब्ध करवाक लेल अविष्कारक ढेर लगा देने अछि, मुदा
जीवनमे ओ असगरे जीब लेवाक प्रवृति सेहो उत्त्पन्न क’ देलैक अछि। एहना सन स्थिति मे मनुख समाज, देश आ अपन स्वयंक जीवन मे ओ मानव मूल्य के तिलांजली दे देेने अछि।

मनुखक जीवन के सार्थकता तखने अछि जखन सभक प्रति श्रेष्ठ भावना राखल जाय। हम सब एक लोकतान्त्रिक समाजक अंग थिकों। संविधान मे देल गेेल अधिकार के प्राप्ति सँ पहिने व्यक्ति के जीवन आ समाज के अवलोकन करब आवश्यक अछि तखने हम श्रेष्ठ मूल्यक समाज स्थापित क’ सकब। अत: एहि आलेखक मादे हमर मुख्य उद्देश्य नैतिक मूल्य, सहयोग आ समानता के मनुखक जीवन आ वर्तमान भारतीय समाज मे उपयोगिताक अध्ययन करब मात्र अछि। अस्तु….

………अरुण कुमार मिश्र