“मिथिलाक गृह उद्योग- मैथिलीक उपेक्षा के शिकार”

40

— उग्रनाथ झा।         

मिथिला आदि काल स विद्या वैभव कला संस्कृति के क्षेत्र में अग्रणी रहल अछी। आई हमरा लोकनी बात करब मिथिला के कला जे की गृह उद्योगक रूप में जीविका के निसन खंभ भए सकैत अछी । जे आदि काल स मैथिलानी के प्रथिमिक शिक्षा रहल अछी । जहन कोनो भी मैथिल नारी के परिचय होई छल त भानस भात आ लुरी व्यवहार(व्यावहारिक शिक्षा)के जरूर चर्चा होई छल । मैथिल नारी पाक कला, चित्र कला आ लोक गायन में पटु होई छली । जेकरा वर्तमान में स्थानीय उपेक्षा के चोट स धार कुंद भेल छल मुदा निकट भविष्य में जनजागृति आशक नव किरीन प्रदान केलक अछी। कहबा में कोनो असोकर्ज नही जे मिथिला के कोहबर, मरवा अरिपन लेखन हो वा सिक्की, मौनी ,पथिया निर्माण हो वा अचार, चटनी , पापड़ , अदौरी , तिसियौरी, दनौरी, तिलौरी निर्माण प्राचीन काल स प्रचलित अछी। मैथिल नारी मैकाले शिक्षा में निपुण होथी वा नही होथी लेकिन एह सामाजिक शिक्षा में जरूर निपुण रहई छली। घर घर में एही तरहक कला पूर्ण सिद्ध हस्त स्थापित छल मुदा ज अभाव छल त एकरा व्यवसायिक स्वरूप देवक दृढ़ इच्छाके । एही तरह उत्पादनके लोक निज घर तक अथवा सर सनेश तक समेटने रहल । सामाजिक लोक लाज के सीमा में ओझरायल ई लोक कला बनी रही गेल । जीविका के साधन नही बनी सकल। जीविका के साधन के अपार संभावना एखन तक अधर में लटकल अछी। एकर मुख्य कारण स्थानिय लोकनी के स्वउत्पाद के प्रति रुचि के कमी । घर घर में एह के उपलब्धता के कारण स्थानीय स्तर पर खरीददारक अभाव रहैत छल । ज खरीददार भेटल त संकोच वश बेचब कोना । मुदा आब ई सब समस्या समाज में नही रहल । ई धारणा बहुत हद टूटी चुकल अछी । आई मिथिला के भीत पर लिखाए वाला कोहबर (मिथिला पेंटिंग)राष्ट्रिय अंतर्राष्ट्रीय बाजार पहुचल। कलाकार सब गरिमामय पुरस्कार स सम्मानित भेला । सोचनीय प्रश्न छै जिनकर दृष्टि ऐही आलौकिक उपलब्धि लेल स्वप्न देखने होयत हुंकर सपना साकार करबा लेल कतेक संघर्ष भेल होएत । जे आई कलाकारे के नही बल्कि ऐ स लागल हर कर्मी के मजबूत आर्थिक सबलता प्रदान क रहल छै।
वर्तमान मिथिला विकाशवादी दौर के धावक बनल अछी । शहरी चलन में चलैत पुनः लौट रहल अछी सबिकाहा रास्ता पर। रसायनिक उत्पाद , फास्ट फूड , सिथेटिक उत्पाद स मुंह मोरी पुनः जैविक उत्पाद , होम मेड फूड , जैव आधारित क्रियाकलाप पर जोर द रहल अछी। ऐ परिस्थिति के देखैत ई कहबा में अतिश्योक्ति नहीं जे मिथिला के पुरातन गृह निर्मित उत्पाद के बाजारी कारण के अपार संभावना छै । अब मिथिला में पहिले वाला स्थित नही जे घर घर में पाग, जनेऊ, मिथिला पेंटिंग , अदौरी,दानौरी, कुमरौरी, तिसीयौरी, तिलौरी, अचार, इत्यादि बनैत होय। जाहि स क्रेता के कमी हो। अगर ऐ क्षेत्र में उचित निवेश क उत्पादन के बढ़ावा देल जाए त अपेक्षित सफलता भेटत। जे सिर्फ निवेशक संग संग बहुत के चूल्हा में चमक लाबी सकै छै। बहुत मिथिलाबासी ऐ दिस आकृष्ट भ प्रयासरत छैथ , मुदा अपेक्षित सफलता नहीं भेटाई छै किएक त व्यापार के प्राथमिक क्षेत्र मिथिला में ओहि उत्पाद के प्रयोग करबा स ओकर गुणवत्ता के जांच कारायबाला मठाधीस सब के कमी नही छै। किए त मिथिला के कहावत छै “बारीक पटुआ तीत ” जे एखनो स्वउद्यमी के मनोबल नीचा कराई छै।
ओना विगत चारी पांच साल में मिथिला में लघु उद्यम के प्रति मैथीलक लगाव बढ़ल अछी ।जे उज्ज्वल भविष्य के तरफ इशारा करैत अछी , क्रेता वर्ग स से आग्रह जे निज क्षेत्रीय उत्पाद के बढ़ावा दिया , गुणवत्ता विकास हेतु फीडबैक दिया । अनर्गल टिप्पणी सौ हतोशाह नही करी। त निश्चित रूप स मिथिला के गृह निर्मित सामग्री वैश्विक स्तर पर अपन पहचान बनाओत।
जय जगैत मिथिला ।🙏🏼