“सरकारक कानून के संग आम जनमानस मे चेतनाक जागृत होयब आवश्यक”

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— कृति नारायण झा।         

बाल्यावस्था में हमरा मोन अछि जे अपन पिताक संग नवगछली में जाइ तऽ आमक नव गाछ सभ में जाहि में पहिल बेर आम में मज्जर होइत छलै तऽ हमर पिता ओकर मज्जर तोङि दैत छलखिन्ह, हम सभ बाल बोध, आश्चर्यचकित रहैत छलहुँ जे गाछ जीवन में पहिल बेर मजरायल अछि, कोन आमक गाछ छियैइ सेहो नहिं बुझलियै आ ओकर मज्जर बाबूजी तोङि देलखिन्ह। एक दिन रहल नहिं गेल तऽ पूछलियैन तऽ उत्तर बहुत घुमा कऽ भेटल। पिताजी कहला जे अहाँक बिवाह एखन कियए नहि हम करवैत छी? हमर स्वभाविक उत्तर छल जे हम तऽ एखन बच्चा छी, हमर एखन कोना बिवाह होयत? बाबूजी हँसि कऽ जबाब देलनि जे तहिना इ आमक गाछ एखन बच्चा छैक, एखन इ अपन फल केर भार नहिं सकि सकैत अछि तेँ यावत धरि गाछ पैघ नहिं होयत ता धरि एकर मज्जर के हम सभ तोङि दैत छियैइ। बाबूजी तर्क के समक्ष अपन मुँह बन्द रखवाक अतिरिक्त आओर कोनो विकल्प बचल नहि छल। “बाल श्रम” अर्थात कुम्हार केर ओ नव माटि जाहि सँ मूर्ति बनाओल जायत, बाल्यावस्था में जखन ओकर समस्त शरीर विकासशील रहैत छैक ओही अवस्था में ओकरा सँ मजदूरी करा कऽ ओकर समग्र विकास के रोकि देल जाइत छैक। छोट छोट धिया पूता के मासिक श्रम करवाक लेल मजबूर करवाक अमानवीय प्रथा के बाल श्रम के श्रेणी में राखल जाइत छैक। इ श्रम कयला सँ ओकर शिक्षाक संग संग शारिरिक, मानसिक विकास पर दुष्प्रभाव पङैत छैक जे ओकरा परिपक्व आ विद्वान व्यक्ति के रूप में विकसित होयवा में वाधा पङैत छैक। भगवानक एहि छोट उपहार बालक, श्रम के दुष्चक्र में पङि कऽ होटल, वासा, कारखाना मे काज करैत देखल जा सकैत अछि। सङक पर पेन, फूल, अखवार बेचैत बाल मजदूर के देखि सकैत छी। सरकार द्वारा सख्त नियम बनाओलक उपरान्तो पेटक ज्वाला के शान्ति करवाक लेल कम अवस्था में नौकरी करवाक लेल आओर दुनिया के कठोर वास्तविकता के स्वीकारवाक लेल ओकरा मजबूर होमय पङैत छैक। कारण अनेक अछि जेना शैक्षिक अवसर केर कमी, असमानता, निर्धनता, जनसंख्या वृद्धि इत्यादि। भारत सरकार १४ साल सँ कम अवस्था बला बच्चा के कोनो कारखाना अथवा खदान में रोजगार सँ कानून द्वारा प्रतिवंध लगाओने अछि, मुदा एकर बाबजूद ५ सँ १४ साल केर बच्चा अपन पेट भरवाक लेल, अपन बीमार माता पिता के दवाइ वास्ते मजदूरी करैत अछि कारण सरकारी अस्पतालमे गरीब आ लाचार के प्रवेश अत्यन्त कष्टदायी होइत छैक। सरकार के नियम बना देला सँ वाल श्रम प्रथा के समापन संभव नहिं छैक ओकरा लेल भोजन, वस्त्र आ आवास केर व्यवस्था अनिवार्य छैक। कोनो धिया पुता सख सँ मजदूरी नहिं करैत अछि, किछु एहने परिस्थिति पङैत छैक तखने ओ एहि प्रकारक डेग उठवैत अछि । एकर विरोधमे मात्र सरकार नियम बनाओने छैक,किछु नागरिक एहि प्रथा सँ खूब लाभ उठवैत अछि यथा बाल श्रम सस्ता में उपलब्ध भऽ जाइत छैक। ओकरा पर सहजता सँ दबाब डालल जा सकैत अछि। यावत धरि देशक समस्त नागरिक एहि कुप्रथा के विरोध में एक स्वर सँ विरोध नहि करताह ता धरि सरकारी नियम बनैत रहत आ टूटैत रहत। इ प्रथा गामक अपेक्षा शहर मे बेसी भयानक रूप में पसरल अछि जे अत्यन्त चिंता के विषय अछि। जनगणना में बाल मजदूर केर संख्या में वृद्धि सरकार आ समाज के आइना देखा रहल अछि जकर अंत आवश्यक अछि…