“मिथिलाक पाहुन”

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— पीताम्बरी देवी।                   

पाहुन के दरवजा पर देख के मोन खुशि से भरि उठैत अछि ।कारण पाहुन अधिक तर काका नाना भाई बहिनोई मामा मौसा ,समधि,जमाय, एहि तरहक सम्बन्धिक सब रहै छथि।आर जखनि ओ सब अबै छथि ते मोन आनंद भय जाईत अछि ।पाहुन दू तरहक अबै छथि ऐकटा बिना बूझल आर दोसर बूझल ।जेना पहिनेहि से समाद पठा देने छथि जे फल्ला दिन हम आएब ।यदि बूझल पाहुन अबै छथि ते हुकार लेल पहिनहि से तरकारी मधूर दहि सब के ओरिआओन कय के राखि देल जाईत अछि ।ई अखनि बेसि सुबिधा फोन के माध्यम से अखनि भय गेले ।पहिने चिठ्ठी बा केकरो दिया समाद देला से होईत छल।ओना पहिने कमे पाहुन अबै छला बूझल दिन में बेसि अचानके अबै छला ।मुदा सत्तकार में पाहुन के कमि नै हुअ देल जाईत छल ।समाज बहुत सहायता करै छल ।बनल, काच जे जेकरा घर में तरकारी रहै छलै जिनका घर में दहि रहै छलनि जिनका घर में दूध रहै छलनि सब आनि के घरबैया के दैत छलखिन आर पाहुन के सत्तकार भय जाईत छल।असल पाहुन अतिथि भेला जिनका एबाक तीथ नै बूझल अछि आर ओ अचानक पहुच गेला।आब सब किछु सुविधा रहितो पहुन के ओतेक सत्तकार नै होई छनि जतेक पहिने सत्तकार ओ आग्रह होईत छल ।पहिने पाहुन के खाईत काल दू गोटे आग्रह करै लेल बैसैत छलखिन आर लाख पाहुन नै नै करैत रहै छला मुदा घरबैया आगु में सामान दैत रहै छलखिन । आग्रह एना होईत छल हे जा सबटा आम छोरिये देलियै कने ई खईयौ एहि बेर नवगछुलि फरले ।जा जा मधुर ते खेबेने केलियै सबटा ओहिना अछि।कने एकटा खा लियौ काका कहै छथि नै खेबै ते बर दुख हेतनि काका के।जा जा दही कने आर लियौ अपन महिस के छियै खा के कने कहु ते केहेन छै ।पाहुन जखनि खा के उठैत छला ते हुनका हाथ धोआबय लेल एक गोटे पाईन गमछा नेने ठाढ़ रहै छला ।जखनि जाय लगै छला ते हुनका घरबैया कहै छलखिन नै नै आईये कोना चल जेबै आई अपनेके दुआरे पोखरि में जाल खसबौलियाईये आर ई चल जेथिन ।आर पाहुन के चप्पल कुर्ता नूका देल जाई छल आर पाहुन के घेर घेर के राखल जाईत छल ।कखनो के ते पाहुक के आबस्यक कार्य रहै छलनि जेनाई जरूरी रहै छलनि ते ओ घरबैया लग घिघयैत रहै छला मुदा घरबैया टस से मस नहीं होई छला। बहुत कहला पर जाय दै छलखिन ते कहैत छलखिन एकर मोजर नै भेलनि फेर आबय परतनि आर पाहुन ह ह करैत जाई छला। घरबैया दूर तक अरियातै लेल जाईत छलखिन ।पाहुन बार बार कहैत रहला घुरल जाव अपने घुरल जाव अपने तखनि घरबैया घुरै छला।पाहुन के कम से कम सात तरहक तिमन तरकारी झोर तरूआ बर बरी भेनाई आबस्यक रहै छल बेसि के अंन्त नै अति जतेक तक बनि जाय मिथिला के माछ ते रहबे टा करै छल ।किछु पाहुन असोजनिया होईत छला ।हुनका पूरी वा चूड़ा दही भोजन करौल जाई छलनि।हुनका लेल जे तरकारी बनै छल से घी में अनोन तरकारी बनै छल ।पहिने कियो पाहुन से अकक्ष नै होई छला ।पाहुन के भगवान के रूप मानल जाईत छल।आब ते पाहुन अबिते बहुत कम छथि फूरसते ने केकरो छै आर एबो केला ते बेसि घरबैया के पसिन नै परै छनि आने आब ओतेक सत्तकार होईये।कमे ठाम पहिनहि जेका अखनौ पाहुन के सत्तकार कएल जाईत अछि ।पाहुन ओ भेला जे यदा कदा अचानक अहा ओतय पहुंच गेला ।
पीताम्वरी देवी