“अतिथि देवो भव:”

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— सरिता झा।                   

उपनिषद के एकटा वाक्यांश “अतिथि देवो भवः ” पर आधारित अतिथि सत्कारक परंपरा भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग अछि आ मिथिला मे त अतिथि सत्कारक महिमा अपार …घर में पर्याप्त चीज नहियो होय त अतिथि क सत्कार मे कोनो कमी नहिं रखता मिथिलावासी सब।
पहिलका समय में या ग्रामीण परिवेश बला मिथिला मे अतिथि/पाहुन के सत्कार मे परेशानी नहिं होइन्ह घरबैया के कारण दुनु तरफ के लोकक जीवन सादा-सरल आ अपनापन स भरपूर रहै छलै, कोनो तरहक दिखावा नै छलैक । सबगोटे अपन खेती-बाड़ीमें या कार्य मे व्यस्त रहैत छलैथ तें पहुनाइ के मौका कमे अबैत छलैन ,जँ पहुनाइ करऽक अवसर अबैत छलैन त खुब स्वागत सत्कार घरबैया करैत छलखिन जै जुरैत छलैन ताहि ल क….सामाजिक अपनापन के त हाल नै पुछु …क्यो दालि, क्यो तरकारी, पापड़, अचार…इत्यादि ल क हाजिर भ जाथिन ताकि पाहुन के सत्कार मे कोनो कमी नहिं रहि जानि और रहऽ-सुतऽ के लेल दरबज्जा जिन्दाबाद ।अपन नै त और किनको …बुझु जे व्यक्तिगत पाहुन स सामुहिक पाहुन मे रुपान्तरण भ जाथिन….कोनो विशेष प्रकारक जोड़जाम नै करऽ पड़ैत छलैन तै घरबैया सेहो बिना कोनो हिचकिचाहट के खुब मोन स पाहुन के सत्कार करैत छलखिन। साथ मे दुनु दिस स मर्यादा पालन सेहो होईत छलैक,कम दिनक पहुनाइ स पाहुन आ घरबैया किनको कोनों तरहक अशोकार्ज नै होईत छलैन …हँ बियाहक बाद पहिल बेर जमाय जमिकऽ एक /दु महिना तक पहुनाइ करथिन्ह जाइ मे घरबैया सबके कोनो आपत्ति नै होईत छलनि बशर्ते दोहरावथि, तेहराबथि नैै।
आब तुलनात्मक अध्ययन करी एखनका शहरिया परिवेश मे पाहुन आ पहुनाइ के अवस्था ….शहरीकरण स उत्पन्न विभिन्न प्रकारक परिस्थितिवश गाँव छोरि शहरी परिवेश में प्रवेश करयबला लोक सबहक जिन्दगी में आमूल परिवर्तन अयलै। जगह के कमी, रहन-सहन में बदलाव, अर्थ उपार्जन आ बचत के महत्वक ज्ञान ,समयाभाव, सोच मे परिवर्तन, एकल परिवार, अपनापन मे कमी, फायदा-नुकसान मे विशेष ध्यान इत्यादि के कारण घरबैया सब पाहुनक सत्कार के लेल उत्सुक या उत्साहित नै रहैत छथि ।
तहिना बहुत तरहक सुबिधा-व्यवस्था जेना होटल,रेस्ट्रां, गेस्ट हाउस उपलब्धता के कारण लोक किनको ओईठाम पहुनाइ करय के लेल सेहो उत्सुक या उत्साहित नै रहैत छथि बल्कि स्वतंत्र रूप स कतौ रहिकऽ कार्य करनाई पसंद करैत छथि।

उपरोक्त व्यवस्था मे कोनो समस्या नै….
समस्या त तखन उतपन्न होईत छैक जखन बिन नौतल, बिन चाहल,बड़बोला पाहुन सब अचानक आबि धमकैत छैथ आ वापस जाय के नाम नै लेता…और संगहि घरबैया सबहक रहन-सहन,खान-पान, साथ-साथ पाहुन सत्कार मे सेहो मीन मेख निकालऽ लगता….तखन त ओ पाहुन और असह्य लागत आ हुनके सब पर “अतिथि तुम कब जाओगे “सटीक बैसैत अछि। कतेको पाहुन त बेइज्जत भेलाक बाद प्रस्थान करता।
अतः पाहुन सबके पहुनाइ बला मर्यादा पालन करक चाही …बिन बजेने नै जाइ ,कम दिन रही,परेशान नै करी,मीन मेख नै निकाली, बड़प्पन नै झाड़ी इत्यादि …तहिना घरबैया के सेहो सब पाहुन के एकै तराजू में नै तौलक चाही, भरसक प्रयास करी जे हुनकर सबहक उचित सत्कार होइन्ह, दिखावा नै करी, हम एना स्वागत करै छी-आहाँ सक्षम नै छी ,आहाँ सत्कारक लायक नै छी …आदि कहि अपमानित नै करी ….