“पाहुनक मान आ घरबैयाक ध्यान राखलासँ ई संबंध बनल रहैत छै”

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— कृति नारायण झा।               

“मंगलमय दिन आजु हे पाहुन छथि आयल। धन्य धन्य जागल भाग हे मन कमल फूलाओल” मिथिलाक ई लोकप्रिय गीत एहि बात केर संदेश दैत अछि जे मिथिला मे पाहुन केर स्थान की होइत छैन्ह? पाहुन के विषय में कहल जाइत अछि जे वास्तव मे पाहुन ओ होइत छैथि जे कहियो काल दर्शन देथि आ जँ कोनो आदमी बेसी काल किनको ओहिठाम जाइत छैथि तऽ ओ पाहुन नहिं घरवैया के श्रेणी में स्वतः आबि जाइत छैथि कारण मिथिला में एकटा प्रचलित कहावत छैक जे “मान घटे जहाँ नितः जाइ”।. मिथिला में पाहुन के भगवानक श्रेणी में राखल जाइत छैक तेँ “अतिथि देवो भवऽ” सभ सँ बेसी मिथिला में साकार होइत छैक। जेना देवताक आगमन कहियो काल होइत छैन्ह तहिना पाहुन के आगमन सेहो कहियो काल होयवाक चाही आ तखने पाहुन आ घरवैया के बीच मधुर सम्बन्ध रहैत छैक अन्यथा ओ विकट पाहुन केर श्रेणी मे आवय लगैत छैथि आ घरवैया सेहो एहन विकट पाहुन सँ परेशान रहैत छैथि।
विष्णुरूपी जमाय आ देवता रूपी समधि मुख्यतया पाहुन के श्रेणी में मिथिला में अबैत छैथि। ओना आइ काल्हि लोक सार, ससूर आ साढू के पाहुन में सभ सँ विशिष्ट स्थान दैत छैथि जे पारम्परिक मिथिलाक पाहुन में परिभाषित नहिं अछि । नाना प्रकारक ब्यंजन जाहि में मिथिलाक प्रसिद्ध तिलकोरक पात के तरुआ विशिष्ट ब्यंजन में अपन स्थान रखैत अछि। पहिने के जमाना मे पाहुन अयला पर पूरा टोलक लोक पाहुनक सत्कार करवा में लागि जाइत छलाह। सभक आँगन सँ विभिन्न प्रकार केर तरकारी पाहुन के भोजन के लेल आबि जाइत छलैक आ पाहुन लग ११ सँ १६ प्रकारक तरकारी पूरि जाइत छलैक। पहिले के जमाना में लोकक बीच सामंजस्य बेसी रहैत छलैक। एक आदमी दोसर आदमी के इज्जत के अपन इज्जत बुझैत छलाह । पाहुन मात्र घरवैया के नहि समस्त टोल के लोकक लेल होइत छलखिन्ह मुदा आब एहि भावना में दिनानुदिन कमी आबि रहल छैक आ घरवैया आब पहिले जकाँ टोलक लोक केर सहयोग नहिं पाबि रहल छैथि आ अपना कें असगर होयवाक अनुभव करैत छैथि आ ओहो में किछु कठपाहुन जे अकाल समय मे दर्शन दैत छैथि जेना दुपहरिया मे डेढ बजे के बाद जखन स्त्रीगण सभ भोजन भात कऽ कऽ कनेक डांढ सोझ करवाक लेल जाइत छैथि तखने सूचना भेटैत छैन्ह जे पाहुन अयलाह अछि। ओ बेचारी पुनः भोजन के ओरियान मे जूटि जाइत छैथि। एहन थेथर पाहुन केर संख्या अपना सभक ओहिठाम बहुत बेसी पाओल जाइत अछि मुदा एहन पाहुन लेल लोक तिलकोरक पातक इन्तजाम नहिं करैत अछि ओ भात दालि आ आलू सन्ना सँ काज चला लैत छैथि। पहिले के जमाना में घरवैया सभकेँ पूर्व सूचना रहैत छलैक जे अमुक तारीख कऽ पाहुन आबि रहल छैथि आ ताहि हिसाब सँ हुनक सत्कार के लेल इन्तजाम कयल जाइत छल। ओना अपना सभक ओहिठाम सँ द्विरागमनक प्रथा करीब – करीब समाप्त भेलाक कारणे पाहुनक संख्या मे कमी आबि रहल छैक विशेष कऽ जमाय वर्ग में आ संगहि शहर मे पाहुनक सत्कारक स्तर के आँकल नहिं जा सकैत अछि कारण ओहिठाम केर अलग समाज होइत छैक। हमर भाइजी के बिवाह भागलपुर मे भेल छैन्ह ओ जखन अपन सासुर पहुंचैत छलाह तऽ राति में विलम्ब भेला पर होटल मे खा कऽ होटल के रसीदक संग सासुर पहुंचैत छलाह आ अपन सासु के होटलक रसीद देखवैत छलखिन्ह तखन ओहिठामक लोक बुझैत छलैन्ह जे ओझाजी भोजन कऽ कऽ आयल छैथि। इ गुण हमरा सभ भाई में आबि गेल अछि ते हमरा लोकनि कोनो सम्बन्धी ओतय कुटाइम मे बिना भोजन कयने नहिं पहुंचैत छी आ तकर प्रभाव इ पङैत छैक जे घरवैया अन्दर सँ बहुत प्रसन्न रहैत छैथि। पाहुन आ घरवैया एक दोसर केर पूरक होइत छैथि कारण वएह एक दिन पाहुन होइत छैथि आ वएह एक दिन घरवैया होइत छैथि तें हमरा सभकें एक दोसर के होमय बला परेशानी के नीक जकाँ बुझैत छी मुदा पाहुन बनय काल मे विसरि जाइत छी जे सर्वथा अनुचित। हमरा लोकनि के पाहुन बनि घरवैयाक मर्यादा के विषय में सतत् संवेदनशील रहवाक चाही। यएह मिथिलाक विशेषता छैक। जय मिथिला आ जय मिथिलाक पाहुनक स्वागत सत्काार।