“जूड़िशीतल”

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— कृति नारायण झा।                       

मिथिला आ पावनि तिहार एक दोसर केर सहोदर कही तऽ अतिशयोक्ति नहि होयत। चैत मासक अंतिम दिन आ बैसाखक पहिल दिन में इ पावनि जूङि शीतल समस्त मिथिला में अत्यंत श्रद्धाक संग मनाओल जाइत अछि। एहि विषय में कहल जाइत अछि जे चैत मास में बनाओल गेल बरी मैथिल बैसाख मास में बसिया के रूप में खाइत छैथि। कतेको स्थान पर सतुआ सतुआइन के नाम सँ प्रसिद्ध इ पावनि मिथिला में जूङि शीतल के नाम सँ जानल जाइत अछि। जूङि केर तात्पर्य जूङनाइ आ शीतल अर्थात ठंढा। बैसाख मासक गर्मी सँ शीतल पयवाक लेल संगहि जूङयवाक क्रम में एहि पावनि केर आनन्द अद्भुत होइत छैक। भोरे भोर माता जी एकटा लोटा में ठंढा पानि आनि कऽ आंजुर में पानि लऽ कऽ माथा पर छीटैत जुङू बौआ कहि कऽ एहि पावनि केर शुभारम्भ कयलनि ओमहर आई भोरहि सँ लीलाधर काका ओहिठाम नेना भुटका के जमघट लागल छैक। छोटका काका पतरकी बाँस के टुकङा टुकङा काटि क फुचुक्का बना रहल छैथि। हमहुँ लाइन में ठाढ भ गेल छी ।एकटा फुचुक्का हमरो हाथ में आयल। ई पावि हमर प्रसन्नता केर कोनो ठेकाना नहिं लागि रहल छल जेना स्वर्ग केर सिंहासन भेटि गेल हो।। बाल्टी में पानि भरि क आमक मज्जर सभ पर फुचुक्का सँ पटा रहल छी। रस्ता में बाट बटोही के देह पर सुखायल कपङा देखि फुचुक्का सँ भीजा रहल छी तावत ओमहर सँ देखैत छी जे गामक मलहटोली के धिया पूता एक हेंज में थाल आर कादो सँ बोरल आबि रहल अछि आ सभ मिलि क हमरो अपन रंग में रंगि दैत अछि। समय कोना एतेक जल्दी कटि गेल से पतो नहिं चलल। बन बाली बाबी के आँगन में बरी छना रहल छैक आ काल्हि भोर में बसिया बरी आ बसिया भात खायल जेतैक। बरी सभक हाथक बनाओल नहिं फूलैत छैक आ एहि क्रम में बन बाली बाबी गाम भरि में बरी बनयबा मे नामी छैथि। हिनका सभक ओहिठाम लोक प्रेम सँ बजा कऽ लऽ जाइत छैन्ह आ ओहि ठाम बाबी बरी बनबैत छैथि। बसिया बरी भात खयवा में अत्यंत स्वादिष्ट लगैत छैक एहि पाबनिमे। इ पावनि अत्यन्त रमणगर होइत छैक ।भोर सँ लऽ कऽ दुपहरिया धरि हमरा लोकनि थाल माटि आ पानिक संग खेलाइत छलहुँ तऽ दुपहरिया के बाद नहा धो कऽ हाथ में लाठी लऽ कऽ गामक बाध में शिकार खेलेवाक लेल जाइत छलहुँ। गामक सभ धिया पूता गीदर के खिहारैत रहैत छल। एहि बाँसबोनी में तऽ एहि खरही के बोन में गीदर नुकाएल अछि कहि कऽ खूब आनन्द केर अनुभूति होइत छल। गीदर नहिंयों देखेला पर उघो उघो सभ करैत छल। समस्त वातावरण में प्रसन्नता केर माहौल रहैत छलैक। शिकार खेलेबाक पश्चात् कुम्मरि पोखरि के मैदान में गामक खलीफा लोकनि कुश्ती लङैत छलाह जिनका गामक मुखिया के दिस सँ जीतै बला खलीफा के इनाम देल जाइत छलैक। हम सभ ओहि ठाम सँ अन्हार भेलाक बादे अपना ओहिठाम अबैत छलहुँ ।धन्य मिथिला धन्य मिथिला केर माटि आ धन्य मिथिला केर पावैन-तिहार .🙏🌹💐