“वसंतोत्सव”

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— आभा झा।                 

माघ शुक्ल पक्ष कऽ “बसंत पंचमी” उत्सव मनाओल जाइत छैक। अहि दिन विद्याक देवी सरस्वतीक पूजा होइत छनि।माँ सरस्वती विद्या आ बुद्धि प्रदान करयवाली देवी छथि।शास्त्र में बसंत पंचमी के ॠषि पंचमी सं उल्लेखित कयल गेल अछि।अपन मिथिला में बसंत पंचमी बहुत धूमधाम सं मनाओल जाइत छैक। बसंत लोकक सब सं मनचाहा मौसम अछि।जखन खेत में सरिसों के पियर फूल चमकैत अछि,आमक गाछ पर मज्जर आबि जाइत अछि और हर तरफ रंग-बिरंगक तितली मंडराबैत अछि।अहि दिन पियर रंगक महत्व अछि।पियर रंगक वैज्ञानिक मान्यता अछि कि ई रंग डिप्रेशन दूर करय में कारगर अछि।ई आत्मविश्वास में वृद्धि करैत अछि।हम पियर परिधान पहिरैत छी तऽ सूर्यक किरण प्रत्यक्ष रूप सं दिमाग पर असर डालैत अछि।पियर रंग हमरा सबके तारतम्यता,संतुलन,पूर्णता और एकाग्रता प्रदान करैत अछि।सादगी और निर्मलता के दर्शाबैत अछि पियर रंग। बसंत पंचमीक दिन सं शरद ॠतुक विदाई के संग गाछ -बिरीछ और प्राणी में नवजीवनक संचार होबऽ लगैत अछि।सृष्टिक प्रारंभिक काल में भगवान विष्णुक आज्ञा सं ब्रह्मा जी जीव,खासतौर पर मनुष्य योनिक रचना केलनि।अपन सर्जना सं ओ संतुष्ट नहिं छलाह। हुनका लगैत छलनि कि किछ कमी रहि गेल अछि जकर कारण चारू कात मौन छायल रहैत अछि।विष्णु सं अनुमति लऽ कऽ ब्रह्मा अपन कमण्डल सं जल छिड़कलनि,पृथ्वी पर जलकण खसैत ही ओहि में कंपन होबऽ लागल एकर बाद वृक्षक बीच सं एक अद्भुत शक्ति प्रकट भेल। ई एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्रीक छल जिनकर एक हाथ में वीणा तथा दोसर हाथ वर मुद्रा में छलनि।अन्य दुनू हाथ मे पुस्तक एवं माला छलनि।जलधारा में कोलाहल व्याप्त भऽ गेल। पवन चलय सं सरसराहट हुए लागल। तखन ब्रह्मा जी ओहि देवी के वीणा के देवी सरस्वती कहलखिन। बसंत पंचमीक दिन के हुनकर जन्मोत्सव रूप में मनाओल जाइत छैक। एना तऽ ई माघक पूरा मासे उत्साह देबय वाला अछि,मुदा बसंत पंचमीक पर्व भारतीय जनजीवन के अनेक तरहें प्रभावित करैत अछि।अहि दिन माँ शारदे के पूजा करि हुनका सं और बेसी ज्ञानवान होइ के प्रार्थना करैत छी।जे महत्व सैनिकक लेल अपन शस्त्र और विजयादशमीक अछि,जे विद्वानक लेल अपन पुस्तक लेल अछि,जे व्यापारिक लेल अपन तराजू,बाट,बही खाता और दीपावली के अछि,वैह महत्व कलाकारक लेल बसंत पंचमीक अछि।चाहे ओ कवि होइथ या लेखक,गायक या वादक,नाटककार या नृत्यकार सब दिनक प्रारंभ अपन उपकरणक पूजा और सरस्वतीक वंदना सं करैत छथि।बसंत पंचमीक दिन हमरा सबके पृथ्वीराज चौहानक बलिदानक सेहो याद दियबैत अछि।हिन्दी साहित्यिक अमर विभूति और कालजयी सरस्वती वंदना “वर दे वीणावादिनी वर दे! स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव भारत में भर दे!”के रचयिता महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’के जन्मदिवस सेहो बसंत पंचमी कऽ भेल छलनि।जतय एक ओर बसंत ॠतु हमर मन में उल्लास के संचार करैत अछि,ओतहि दोसर दिस ई हमरा सबके वीरक सेहो स्मरण करबैत अछि,जे देश और धर्मक लेल अपन प्राणक बलिदान केलनि।
आभा झा (गाजियाबाद)