“अमृत बनि गेल विष”

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मंजूषा झा।                             

सनातन या मतलब बुझु जे जहिया सँ ज्ञान -प्राण भेल तहिया सँ सब माता -पिता क़ बेटी लेल चिंतित देखलौं । बेटी क ब्याह सब काज व यज्ञ – याजन सँ भरिगर या कठिनाह बुझना जाईत छल । गाम घर मे किनको बेटी जन्म लै छलनि तँ सब गाम भरिक लोक चिंतित भ कहय छलखिन — की करबै चिंता जुनि करु बेटी धन सागो तोरि क गुज्जर करतै । आ तहिए सँ ब्याहक तैयारी आ ओरियान सुरु भ जैत छलैक। साड़ी गहना आ सूजनीक’ ओरियान । आ संग मे सिखाओल जाईत छलैक जे कम सँ कम सुविधा मे कोना जियल जाऽ सकैत अछि । विन बजने कोना जिनग़ी काटल जाऽ सकैत अछि ।वस एतबे सिखबै छलनि ।अल्पवयस मे सुविधाक किछू – मिछु वस्तुक संग ब्याहक संस्कारक’ पूरा क कय अपन कर्तव्य सँ मुक्ति पाबि लै छलैथ। कोनो अनजान व्यक्ति ,उम्रक अंतर , अनभिज्ञ गाम ठाम सँ संग जोरबाक’ लेल किछू वर – कनियाक लालच देल जाईत हेतैक। ओहि लेन -देन क प्रथा क ‘दहेज प्रथा ‘ उपाधि देल गेलैक । जे सुरुआत मे स्वेकछा सँ होईत छल , ताही सँ पुत्री नव जगह मे रहितो सुविधाक अहसास सँ मन प्रफुलित रहैत हेतनि आ ओ अमृत समान ओहि वस्तु क़’ बुझई छलखिन ।शनै :-शनैः ओ अतेक विकराल रूप ध लेलक जे लगभग साठि वर्ष सँ लोक दहेज नाम सँ आतंकित भ जैत छथि । तथापि लोक लाज , प्रथा , स्वेकछा , बेटीक अधिकार , देखादेखी , या बेटी क’ ख़ुशीक़ लेल येनकेन प्रकारेन सब वस्तु आ नगद क इंतज़ाम करैत बेटी क विवाह क दैत छथि । पर अहि आपा-धापि मे सदगुन क पहचान करबा मे कतेक लोक चूकी ज़ाई छथि । आ खिलौना किनय जेका अपना क़ ठगल महसूश करय छथि । तखन संघर्ष सँ ओरियाओल आ देल गेल दहेज ज़हर बनि ज़ाईत अछि ।

आबक समय मे बड्ड परिवर्तन भ गेलैक । आबक माता-पिता अपन बच्चा क़ शिक्षा क़ उपहार दई छथिन । बेटी क़ शिक्षा आ समझदारी क दहेज दई छथिन । आ बाक़ी सब दहेज , बेटी अपनहि हँसिते -हँसिते जुटा सकई अछि ततेक सक्षम बना क विवाहक निर्णय लै छथिन । तकर बावजूद जँ दहेजक नाम पर नगदी आ किछूओ सामानक माँग कियो करय छथि तँ बुझु अत्यंत लालची आ गँवार अति ओछ मनसिकताक छथि । दहेजक अनिवार्यता क सब मिली संभवतः दूर करबाक प्रयास ज़रूर करक चाही । सब क लाठी एक बोझ — सब संग प्रयास करब तँ ई कुप्रथा ज़रूर मिथिला सँ दूर भ जैत ।
दहेज जा धरि अमृत छल सब अनुकरण केलौं । परंतु आब ओ भयानक कुप्रथा बनि गेल अछि ।कतेको घर टूटी रहल अछि । कतेको परिवार मे बेटी आ बहिनक ब्याह क प्रसंग मे कलह क स्थायी घर बनि चूकल छै । कतेको बेटी जराओल जाईत अछि ।कतेको बाप- बेटा जेल क परेशानी झेलै छैथ । तँ कियाक नहि अहि ग़लत प्रथा क़ उपेक्षा करैत स्थायी रूप सँ हटेबाक सफल प्रयास करक चाही । ई कथा एक घरक नहि अपितु घर -घर क़ कहानी छी ।