“साबिक के आंगन”

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दीपिका झा।                                 

“सम्मिलात परिवार के सुंदरता”

गरम खेनाई ताहू में जों सोहारी रहै, त ओकर आनंदे किछु और छै।
रातिक भोजन के बेर छल, मेघ साफ, आकाश में तारा छिटकल, ठाहाठही इजोरिया, आंगन में ठहक्का बजरै छल। भरल अंगना लोक, बूढ़ा-बूढ़ी, बेटा-पुतौह, बेटी सं घर अंगना भरल लगै छल। आंगन में एक पांति सं पीढ़ी खसैल छल, पुरुष लोकनि भोजन लेल बैसल रहथि। दुआरि पर दुचुल्हिया पजारल, लाबनि पर डिबिया जरैति आ तबा सं बिना चुट्टा के पुतौह गरमा गरम सोहारी उतारि रहल छलैथि। धधकति आगि में सं तप्पत सोहारी निकालति-निकालति पुतौह के चुटकी जरि गेल रहनि। आगि पर सं सोहारी उतरै आ एक गोटे ओकरा आंगन में पुरुषक थारी में पहुंचबथि।

ओहू दिन सैह भ रहल छल। पुतौह सोहारी उतारै छलखिन आ बेटी आगू में पहुंचबै छलखिन। बूढ़ा के एकटा सोहारी के अंतिम टुकड़ी हाथ रहनि तहन दोसर एबाक चाही अहि तरहक आदेश आ विधान ओई परिवार में छल। ओहि दिन हाथक टुकड़ी मुंह में पहुंच गेल छलनि, चारू कात तकथि दोसर सोहारी में विलंब भ गेल रहनि। कारण….?

कारण ई छल कि एखने ओ बेटी के जोड़ सं डपटने छलथि कि
आगू में एक टा टुकड़ी छलैहे त कियै देलैं गे….?
आब अई बेर बेटी कुरमुरैल छलैनि। हाथ में सोहारी लेने नुका क ठाढ़, एमहर बूढ़ा चारूकात बाट तकति। जहन बेटी थारी खाली देखलकनि तहन आगू ऐली।

गे कत्तऽ छलैं ऐत्ति देर…..? सोहारी कियै ने अनने रहैं गे…..देख आगू के सठि गेल।
बेटी कहलखिन
बाबू अहांक मुंहक सठै के बाट तकै छलौं, मुंह में छलैहे ने, तैं नहिं देलौं।
अंगना में सबके हंसी लागि गेलै आ बूढ़ा के अपन गलती के एहसास भ गेलनि।
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