“अतिथि देवो भव”

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कृष्ण कांत झा।                                 

#मिथिला में अतिथि सत्कार#

 

वैदिक काल स ही भारतीय संस्कृति में अतिथि सत्कार के बहुत महत्व देल गेल अछि।एक समय में संपूर्ण भारत में अतिथि सत्कार बहुत निष्ठा स होई छल। कालांतर में मिथिला के छोडि क अन्य स्थान सब में अतिथि सत्कार में कमी आयल अछि।किंतु अपन मिथिला में एखनो अतिथि के अत्यंत आदर और सत्कार कैल जाइत अछि।इ बहुत ही प्रसन्नता के विषय अछि।निर्धन स निर्धन व्यक्ति भी अपन सामर्थ्य स अतिथि के यथायोग्य सम्मान सत्कार अवश्य करैत छथि।कारण जे मिथिला अपन संस्कृति और संस्कार के सुरक्षित राखय में विश्वास रखैत अछि।और संस्कृति और परंपरा के मूल्य खूब बुझैत अछि।वेद के अन्तिम भाग उपनिषद् के वचन अछि- अतिथि देवो भव।
एतय अतिथि स तात्पर्य जे कियो भी अपरिचित भी अभ्यागत यदि घर पर अबथि ।बिना कोनो पूर्व सूचना के भी तथापि हमर सब के इ कर्तव्य बनैत अछि।जे अपन शक्ति के अनुसार हुनकर सेवा कैल जाय।
अतिथि के देव तुल्य कहल गेल। अतिथि प्रसन्न त देवता प्रसन्न।जै घर में अतिथि के सेवा होइया।ओ घर में सुख शांति रहैया। मिथिला के अनेक विशेषता में स सबस खास बात हमरा इ लगैत अछि।जे एतय शास्त्र सब मात्र पुस्तक में ही नै सिमटल अछि अपितु व्यवहार में अछि।एकटा सद्गृहस्थ पति पत्नी के दिनचर्या देख लिया जिनका संभवतः शास्त्र के मंत्र आदि भी नै अबैत होइन।किंतु व्यवहार सब शास्त्र सम्मत भेटत। मिथिला में पुरूष वर्ग जहिना विद्वान् कर्मठ और सामाजिक होइया।तहिना महिला वर्ग विदुषी गृहकार्य कुशल और परिश्रमी होइत छथि।ओ अतिथि के लेल तरह तरह के पाक बना क अपन पाक कौशल के परिचय द क अतिथि के सत्कार करै छथ। अतिथि गदगद भ क शुभकामना दैत जाय छथि।कतेक सुंदर इ अपन मिथिला के संस्कृति अछि।ओ अतिथि जखन अपन घर जाइत छथि। त अपन घर में बताबैत छथ जे कतेक प्रेम सम्मान भेटल। प्रेम और सम्मान रिश्ता के बहुत मजबूत करैत अछि।चाहे कियो कतेको दुष्ट व्यक्ति होइथ।यदि हम हमेशा सम्मान स व्यवहार करब त हुनकर व्यवहार में भी निश्चित ही सकारात्मक परिवर्तन आयत।आइ अहां अतिथि सम्मान करबै।त काइल कतौ अहुं के सत्कार होयत। अच्छाई के विस्तार एहिना होई छैक।कल्पना करू की अहां कोनो अभ्यागत के स्वागत सत्कार नै केलियैन।और एक समय अहां हुनका ओतय गेलियै।ओ बहुत सम्मान सत्कार केलथि।त केहन लागत।तैं अपन सब के कर्त्तव्य अछि। अतिथि सेवा सेवा परमो धर्म:।कियो कतबो दिन हीन होइथ।ओतय जेनाय पसंद करैत छथ।जहां लोक प्रसन्नता स्वागत करैत छैन।
तुलसी दास जी के दोहा देखू –

आवत ही हरषें नहीं।नैनन नहीं सनेह।।
तुलसी तहां न जाइये।कंचन बरसे मेह।।