“दलानक शोभा”

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  • “साहित्य”

– दीपिका झा।                                 

“गामक दलान”
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“अपना सब में कहबी छै स्त्रीगनक आंगन आ पुरुषक दलान”
दलान शब्द सुनिते लगैयै गाम पहुंच गेलौं।अपना सभक घर आंगन के ई महत्वपूर्ण हिस्सा रहै। आंगन-घर छोट होई अथवा पैघ दलान रहनाई आवश्यक रहैत छलैक। पहिने तऽ टोल भरिके लोक के मिला कऽ एकटा पैघ दलान आ खरिहान रहै जहि ठाम सब प्रतिष्ठित, आदरणीय श्रेष्ठ लोकनि के बैसार होईन। सामाजिक छोट-छीन बात विवाद पर चर्चा और समाधान होई।बर-बरियाती ठहरऽ के व्यवस्था होई,भोज भात होई। जार मास में बड़का घूर के व्यवस्था होई जहि ठाम पुरुष सब के बात विचार आ हंसी ठहाका होईन। मुदा, आब त घरे-घर दलान बना लेलकै लोक आ बैसनहार एको गोटे नै…….। जे वृद्ध लोकनि आब छैथो ओ बौक भेल अपना दलान धेने असगर बैसल रहै छैथ।कियैकि,बेटा दलान तऽ बना देलकैन लेकिन ओतै बैसै लै सेहो असगरे छोईर देलकनि।आबक नब लोक जे गाम पर रहै छी अथवा बाहर सं जाई छी हुनका सबके हम ई कहऽ चाहब जे किछु समय दलान पर जा कऽ बैसू ,जे ज्ञान और गौरव के अनुभव ओतऽ हैत ओ चिनबार पर स्त्रीगणक बीच बैसने नै हैत।
किछु गलत कहलौं त क्षमाप्रार्थी छी ।🙏🙏