देखितहि, कहय लागलि नदी
बहुत दिन बाद अयलहुँ अहाँ;
बाट तकैत, बड्ड उदास फिरैत छल सूरज;
चन्द्रमा गूम्मी लदने अबैत छल, गाछीक ओहि पार सँ;
मद्धिम भेल जाइत रंग, संध्याक;
शीघ्र मौलाइत छलैक रौदक आभा;
थाकल-ठेहिआयल हवा बहैत छल, द्रुत-विलम्बित –
बड्ड उदास रहैत छल, सांझ
अपन चित-चोरक उत्कंठा मे!
पूछियौक ओहि पथरायल टीला सँऽ
जाहि पर, आसन जमैत छल, अहाँक!
एतबा दिन बड्ड अन्यमनस्क रहैत छल ओ,
मंदिरक घंटीक ध्वनि आबय धरि
सब देखैत छल, अहींक बाट!
हमर हाल! पूछू जुनि,
हम तऽ छी अभ्यस्त –
जेठ मे अघायल, आ’ भादो मे
उधियौनी
एखनहि विपन्न, एखनहि संपन्न –
कखनहु सुखायल, कखनहु तोड़ैत बांध!
आय देखू ने
कोना इतराइत अछि सांझ –
आयल छी, एतेक दिन बाद –
तखन, करबे करत भाभट
देखेबे करत नखरा!
– अग्निमित्र – १७.०५.२०१५.

2 Comments
श्री मित्रेश्वर अग्निमित्र जी क दू गोट हिंदी कविता संग्रह प्रकाशित अछि एखन धरि, जे अपना मे विशष्ट स्थान राखैत अछि. मैथिलि श्री अग्निमित्र जी क मातृभाषा छि तथापि ओ एखन धरि मैथिलि मे कउनु रचना नय केने छलाह. मुदा हुनकर मैथिलि रचना पढ़ी क कथमपि नय लागत इ जे ओ मैथिलि लेल नव छथि.
मैथिलि भाषा साहित्य क श्री मित्रेश्वर जी सं निरंतर एकर सब विधा मे लिखबाक अपेक्षा.
सर प्रणाम !
अग्निमित्र द्वारा लिखित कविता ‘साँझक भाभट ‘ पढलहुँ । मोन बहुते प्रसन्न भेल । बिम्बे – बिम्ब आ उपमा उपमयसँ भरल ई कविता साच्चे उच्च उच्च कोटिके उत्कृष्ट अछि ।
एहि कवितामे नदीके बिम्ब बनाक’ प्रेमिकाके भावना सम्प्रेषण भेल अछि । प्रीतम बिनु प्रेमिकाके हाल बेहाल छलैक । ओतबे कहाँ ! ओतुका प्राकृती- माने सूरज,चन्द्रमा,हावा,टीला, सुरुजक आभा,साझ -भोर आदि -इत्यादी सब कोना उदास रहैत छलाह ? तकर जीवन्त चित्रण कयल गेल छैक एहि कवितामे । तहिना प्रीतम बिनु प्रेमिकाके जिनगी अन्हार होइत छै सेहो प्रष्ट कयने छथि कविजी नदीके माध्यमसँ ।
दोसर प्रशंगमे अपन सजनाके वियोगमे उजाड आ उस्सठ जिनगी जिबिरहल प्रेमिका लग अचानक प्रीतमके आगमनसँ मन बिहुसि उठैत अछि आ खुशीके बर्षात् भ’ जाइत छैक । तें कहने छैक जे साझ आजु इतरेतै एत । भाभट देखेतै एत । अर्थात् प्रीतम आगमनसँ अपने स्वयं आ चारुदिसक प्रकृति हिलसगर देखारहल अछि । सबठाँ खुशीए खुशी देखारहल अछि ।
आब हमरा हिसाबे एहि कविताके शीर्षक – ‘ प्रीतक इजोरीया ‘ होएबाक चाही । बाँकी अपनेलोकनि हमर अग्रज,मार्गदर्शक आ अनुभवके शास्त्र छी । तें अपनेसभक बिचार वा निर्णय सदैब हमरा लेल मान्य रहत आ रहैत अछि ।