दादीक परिस्थिति

मैथिली लघुकथा

– डा. लीना चौधरी

ओहो केहेन दिन छल जखन घरक कर्ता-धर्ताक सारा पड़हक छाउरो ठंढा नहि भेल छलन्हि आ दोसर दिश घरक लोक सब सम्पत्तिक बँटवारा लेल पंचायत बैसा लेने रहय। दादाजीक जिबैत धरि संयुक्त परिवार रहल, लेकिन आब हुनका चलि गेला सँ हुनकर सहोदर भाइ व हुनका लोकनिक परिवार केँ ई डर छलन्हि जे कहीं भाइक परिवारक भार हुनके सबहक माथा पर नहि आबि जाइन्ह। एम्हर बड़का बेटा जे अपन पिताक श्राद्ध-कर्मक कर्ता छलाह ई सब देखि ओ हतप्रभ आ किंकर्तव्यविमूढ़ भ एकदम चुप्प छलाह। सोचि रहल छलाह जे अपन पढ़ाई छोड़ि घरक जुआ मे जोता जाइ। अपन पुत्रक भविष्य संग अन्याय होइत देखि दादी अपन दुःख बिसरिकय मजबूती सँ ठाढ भऽ गेलीह। अपन सवा महीना के पुत्र बड़की पुतोहु केर कोरा मे दय ओ कहलखिन्ह जे आइ सँ ईहो अहाँल संतान अछि। अहाँ घरक जिम्मेदारी सम्हारू कनियाँ, हम खेती-बारी सम्हारब। हम गहना सब बेचिकय पढ़ाई पूरा करायब लेकिन बड़का बौआ केर भविष्य खराब नहि होबय देबनि। ताहि दिन सँ बड़का बेटा केँ नौकरी लागय धरि दादी घरक मर्द बनिकय सबटा भार सम्हारि लेलीह। बेचारी पतिक जेबाक शोको तक ठीक सँ नहि मना सकलीह।