आजुक युग मे मिथिला केँ विश्व परिवेश मे ‘मिथिला चित्रकला’ सँ चिन्हल जाइत अछिः एक आस्ट्रेलियन शोध

अन्तर्राष्ट्रीय परिधि मे मैथिली मिथिला
सन्दर्भ मिथिला पेन्टिंग पर आस्ट्रेलिया
अमेरिकाक न्युयोर्क स्थित आर्ट गैलरी मे मिथिला चित्रकला प्रदर्शनी मे प्रस्तोता अजित शाह चित्रक बारे वर्णन करैत

आजुक विश्व मे मिथिला केँ पहिचान दियाबय लेल ‘मिथिला पेन्टिंग’ अकेले दम पर सर्वोच्च स्थान हासिल कएने अछि। ओना त विद्वानक नजरि मे भारतीय हिन्दू दर्शनक कुल ६ विभाग (षट्दर्शन) मे सँ मीमांसा लेल महिर्ष जैमिनी, सांख्य लेल महर्षि कपिल, वैशेषिक लेल महर्षि कणाद एवं न्याय लेल महर्षि गौतम केर नाम मिथिला सँ लेल जाइछ, जखन कि वेदान्त लेल महर्षि बाद्रायण एवं योग लेल महर्षि पतञ्जलिक नाम अन्य भूभाग सँ रहितो मिथिला सँ जुड़ाव होयबाक बात विभिन्न बौद्धिक चर्चा मे अबैत अबैत अछि। लेकिन आध्यात्मिक संसार सँ इतर भौतिक संसार मे सेहो यैह आध्यात्मिकता केँ व्यवहारिकता सँ जोड़िकय चित्रकला मार्फत कैनवास पर उतारब आइ संसार भरि मे मिथिला केँ एकटा अलग परिचिति प्रदान कय रहल अछि। एखन धरि देश-विदेश मे सैकड़ों स्थान पर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी लगाओल जा चुकल अछि। मिथिला दुइ देश बीच साझा संस्कृति आ सभ्यता रहबाक कारणे दुनू नेपाल व भारत सरकार द्वारा एहि विषय पर गम्भीरता सँ कार्य करैत रहबाक कय गोट उदाहरण देखल जाइछ। हालहि नेपाल भ्रमण वर्ष २०२० केर सफलता लेल अमेरिका मे ‘मिथिला महोत्सव’ मे ५ दिन धरि न्युयोर्क केर आर्ट गैलरी मे मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी संग-संग मिथिला लोककला आ संस्कृति केँ दरसाबयवला अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम सभक आयोजन कयल गेल छल जाहि मे कतेको देशक राजनयिक आ संयुक्त राष्ट्रसंघ केर स्थायी नियोग केर सहभागिता सह-आयोजकक रूप मे भेल छल। लेकिन एहि महोत्सव मे सेहो केन्द्र मे छल अजित शाह (जनकपुर केर प्रतिष्ठित मिथिला चित्रकार, प्रशिक्षक एवं अभियानी) केर १३ गोट मिथिला पेन्टिंग तथा ग्रामीण महिला चित्रकार लोकनिक समूह द्वारा बनायल गेल १७ गोट मिथिला पेन्टिंग।

एखन सन्दर्भ लय रहल छी आस्ट्रेलियाक केटी इलियट नामक पत्रकार द्वारा देल गेल एक रिपोर्ट, जाहि मे मिथिला पेन्टिंग केर समग्रता आ मानव जीवन केर गम्भीर आध्यात्म आ जीवनशैली बीच एक बेहतरीन सम्बन्ध पर प्रकाश देल गेल अछि से एतय राखि रहल छी। हाल, अपन एक शोध अध्ययन केर क्रम मे ई आलेख सब भेटब बहुत दृष्टिकोण सँ महत्वपूर्ण अछि। एतय नेपाल केर नव संविधान बनलाक बाद किछु लोक मैथिली भाषा आ मिथिला संस्कृति पर जातिवादिताक उन्माद मे पूर्वाग्रह सँ ग्रसित भऽ तरह-तरह केर आरोप-प्रत्यारोप आ कुतर्क सँ सोशल मीडिया मे भ्रम पसारि रहला अछि। ई सब आलेख हुनका लोकनिक दृष्टिपटल पर लागल मकड़झोल हँटेबा मे शायद सफल होयत, प्रयास सेहो अछि। आउ, देखी ई ११ वर्ष पूर्व केर प्रकाशित एक सुन्दर समीक्षात्मक लेख जे मिथिला चित्रकला सँ एहि ठामक सभ्यताक ३००० वर्षक इतिहास कोन तरहें राखि रहल अछि। आलेख अंग्रेजी मे अछि, जरूरत मे एकर अनुवाद सेहो राखल जायत।
Mighty Maithili women
The indigenous art of the Maithili people of Southern Tarai is said to date back about 3,000 years when the Aryans started settling in the region and decorating the walls of their homes with scenes from everyday life, rituals, festivals and scenes of legends of Hindu gods and goddesses.
The ancient kingdom of Mithila which comprised what is now north Bihar in India as well as the southeast part of Nepal is richly steeped in history. Its capital Janakpur was a seat of learning, a centre of spiritual and intellectual discourse and the first to make contact with oriental cultures. It is mentioned in Vedotar literature, epics and Puranas including the Satpath Brahman, Valmiki Ramayan, Mahabharat and later Upanishads.
Today it has a rich culture of its own as the centre of Mithila paintings, a naive art form beginning to gain recognition internationally.
The 13 paintings on display at the Mithila Yain Art Gallery in Thamel explode with colour, life and rich patterns. The collection represents all aspects of the art form painted by women who have had this skill passed down through the generations.
The richly patterned Aripan paintings represent the illustrations done in the earth at the front of houses to purify a space for ritual and domestic ceremonies such as puberty, conception and the sacred thread ceremony. Then there is the Kohbar (lotus) motif symbolizing female beauty and fertility intended to bring good fortune on the honeymoon night. Another shows the different incarnations of Krishna (pictured), providing a fascinating insight into Hindu culture. Then, there are the ‘busy’ paintings showing the daily life and work of the Maithili people.
The latter are full of detail of the comings and goings of life from planting seeds to harvesting, selling produce, beating rice, grinding grains, ploughing, cooking, collecting water, fishing and eating. They are not spiritually uplifting or particularly thought-provoking as there is no depth to them and the faces are completely devoid of any expression or emotion, simply drawn in a formulaic way. Aesthetically, the joy of these naive paintings lies in their strong use of pattern, unrefined colour and simplicity rather than subtlety.
But that is to miss the point. The fact that the figures have no mouths and the same large expressionless eyes gives the impression of a cohesive hardworking, duty-bound society rather than a collection of egocentric beings. The paintings are a fair representation of hardworking women carrying burdensome loads and often waiting on their menfolk.
Beyond that the paintings are a testament to these extraordinary women whose hands are always busy. Traditionally, women are highly suppressed in Mithila society, unable to do anything other than domestic work and not allowed to make decisions. Through their art they are finding independence.
Katy Elliott
माइटी मैथिली विमेन – शक्तिशाली मैथिली महिला शीर्षक अन्तर्गत ई आलेख नेपाली टाइम्स केर आर्काइव सँ लेल गेल अछिः FROM ISSUE #429 (12 DEC 2008 – 18 DEC 2008)।
हरिः हरः!!