छद्म मिथिलावाद आ मिथिलावादीक स्वरूप – मिथिलाक नेताक परनिर्भरता पर खुला विचार

विचार
– प्रवीण नारायण चौधरी
 
आइ-काल्हि राजनीतिक उपलब्धि लेल बहुतो तरहक विचारधारा आ दृष्टिकोण संग कइएक व्यक्ति वा समूह वा संगठन कार्यरत अछि। सोशल मीडिया सभक नीति आ सिद्धान्त केर प्रसार लेल एकटा सहज प्लेटफार्म उपलब्ध करबैत अछि। परञ्च बेसी रास ‘अवसरवादी’ या ‘समझौतावादी’ नीति-नियन्ता आ अपन संकल्प पर अडिग नहि रहि शीघ्र विचलन केर शिकार होइत सेहो देखल जाइछ। एहि तरहें कोनो विशेष क्षेत्र लेल मात्र काज कयनिहार व्यक्ति अथवा समूह (संस्था) अपन अस्तित्व त निर्माण नहिये कय पबैत अछि, बल्कि जेहो पहिने सँ बनल-बनायल भेटैत छैक तेकरो स्वाहा कय दैछ। विश्वक एक प्राचीन सभ्यता जेकर भाषा, संस्कृति, समाज, समृद्धि आदिक अपन विशिष्ट स्थान एहि संसार मे अलग नाम रखैत अछि से मिथिला लेल मिथिलावाद आ मिथिलावादीक वर्तमान केहेन अछि त? एहि सवाल पर मंथन करबाक लेल किछु दृष्टान्त संग चर्चा करी।
 

मिथिलावादी नीति-निर्धारक

 
मिथिला केँ संविधान सँ सम्मान दियेबाक संघर्ष बहुत प्राचीन अछि। भारत जहिना अंग्रेज सँ स्वतंत्र होयबाक लेल संघर्ष करैत रहल, तहिना भारतीय संघ मे अलग-अलग विशिष्ट पहिचान केर संरक्षण लेल सेहो नीति निर्माण होइत रहबाक कथा-गाथा भेटैत अछि। मिथिला आ मैथिली लेल सेहो कय प्रकारक नीति-निर्माणक कथा-गाथा लगभग १०० वर्ष केर इतिहास समेटने पढय-सुनय लेल भेटैछ। भाषा-साहित्य, संचारकर्म, सामाजिक-सांस्कृतिक अभियान तथा राजनीतिक अस्मिता लेल मिथिला राज्य निर्माणक मांग सेहो बहुत पूर्वहि सँ कयल जेबाक चर्चा सुनैत-पढैत छी। भाषा-साहित्य, समाज, संस्कृति व अन्य अभियान कतेको आरोप-प्रत्यारोपक बीच अपन अस्तित्व निर्माण कएने अवस्था मे देखाइत अछि लेकिन राजनीतिक अस्मिता लेल सिर्फ फेल्यर (असफलता) केर नियति देखैत छी। एकर कारण की?
 
राजनीतिक उपलब्धिक दिशा मे कोनो व्यक्तिक प्रयास वा संगठनक काज माटि नहि पकड़बाक मूल कारण अछि जमीन सँ नहि जुड़ि सिर्फ कल्पनाक संसार मे बड़का-बड़का सिद्धान्त केँ अपनेनाय वा अपनेबाक ढोंग केनाय। नकल करय मे माहिर, काजक बेर मे काफिर! एकरा छद्म मिथिलावाद केर संज्ञा देला सँ होयत। बड़का-बड़का शोधपत्र मे एक्के गोट कमजोरी पर आंगुर उठायल गेल आर ओ ई थिक जे आम जनमानस मे मिथिलाक मुद्दा – राज्यक आवश्यकता व महत्व, एकरा स्थापित नहि कयल जा सकल आइ धरि। एकर कारण की? सिर्फ ख्याली पुकाव पकेबाक जे हिन्दी कहाबत छैक ओ एतय चरितार्थ होइत अछि। आइ धरि कियो मिथिलावादी जमीन सँ जुड़ल सरोकार पर जमीन पर रहनिहारक संग संघर्ष केँ नहिये आरम्भ कय सकल, तखन ओकरा मन्जिल तक पहुँचेबाक बात केनाय बेकारे बात भेल।
 
मिथिलावादी नीति-निर्धारक वा संघटक कमजोरी केँ दूर करबाक लेल कमजोर विन्दु पर ध्यान देबाक चाही। निष्क्रियता सँ सक्रियता दिश उन्मुख हेबाक लेल युक्ति निकालबाक चाही। आलोचक केँ दुश्मन नहि सही मार्गदर्शक बुझबाक चाही। एहेन बहुत रास बात छैक एखन कथित मिथिलावादी राजनीतिकर्मी लेल – ओ सब आत्मनिरीक्षण नहि करता लेकिन सवाल पुछनिहार पर व्यक्तिगत हमला कय केँ अपना केँ वीर जरूर बुझता। विगत ६ वर्ष मे आइ धरि मिथिला राज्य आन्दोलन कतेक डेग बढियोकय आखिर पाछू कियैक पड़ि गेल – तेकर एकटा प्रमुख कारण ईहो छैक, ई हमर व्यक्तिगत अनुभव अछि। मिथिलावाद सिर्फ स्वार्थसिद्धि लेल सीढी बनल देखाइत अछि, किछु पाय-कौड़ी सँ भरल-पुरल लोक किछु समय लेल एकरा अपनबैत अछि आर तुरन्त कोनो राष्ट्रीय राजनीतिक दल द्वारा लोका जाइत अछि।
 

मिथिलावाद केर साहित्य अस्पष्ट – साहित्यकार लोकनि सम्मान आ प्रमाणपत्र लय मे व्यस्त

 
आइ धरि मैथिलीक स्थापित साहित्यकार केर कलम सँ ‘मिथिलावाद’ पर कतहु कोनो लेख अथवा विचार शायदे देखने होइ कियो गोटे….! नारी विमर्श आ साहित्यक विधा ओ विविधता मे मैथिलीक अस्तित्वक अलावे सामन्ती मालिकक साहुगिरी आ रैय्यत आमजनक आसामी बीचक शासन आ शोषण सँ ऊपर मिथिलाक साहित्य आन विन्दु पर चिन्तन-मनन-लेखन करैत हमरा नहि देखायल। हमर अध्ययन कमजोर अछि, अहाँ सब केँ जँ देखायल हो तऽ जरूर मोन पाड़ी। आर्थिक पिछड़ापन, पर्यटन विकास, ऐतिहासिक आ पुरातात्विक महत्ता – एहि सब महत्वपूर्ण विन्दु पर लिखित इतिहास अत्यल्प कियो-कियो आ कतहु-कतहु देखि पबैत छी। संचारधर्म सेहो एहि ठामक एहने अछि जे कोनो काज होयत त हिन्दी मे विज्ञप्ति बँटा जायत, आधा बात झूठे रहैत छैक। एतहु कल्पनाक संसार मे नारी विमर्श ओ साहित्यकार लोकनिक आत्ममुग्धताक अवस्था बेसी देखाइत अछि। मिथिलावाद केँ स्थापित केकरा लेल आ के करत, ई स्पष्ट नहि अछि।
 
तखन सोशल मीडिया कारगर भूमिका निर्वाह करैत देखि ओहि साहित्यकार लोकनिक ३०० प्रति छपायल-प्रकाशित किताब तक कीनिकय पढनिहार पाठक नहि देखि सोशल मीडिया मे लेखन बढि गेल अछि। एतय सेहो सरोकारक बात पर कम आ आत्ममुग्धताक कतेको आयाम पर लेखन बेसी होइत अछि। तखन ‘मिथिलावाद’ पर सेहो किछु त साहित्यकार समाज करत, ताहि लेल मैसेन्जर सँ मिथिलावादी उम्मीदवार अपन चुनावी पर्चाक जेपेग फोटो फाइल पठबैत छथि आर यैह फोटो फेसबुक पर शेयर करैत आम मतदाता सँ अपील जारी कयल जाइत अछि जे ‘मैथिली-मिथिला’ लेल अपन मत केँ फल्लाँ मिथिलावादी उम्मीदवार लेल दान करू। चुनाव सँ गोटेक दिन पहिने मिथिलावादी उम्मीदवार लेल कय गोट अपील फेसबुक सँ जारी जरूर भेल, लेकिन कोनो दिन कतहु जनसभा कयल गेल हो आ साहित्यकारक कलम सँ क्रान्तिक धार भोत्थर रहितो मुंहों सँ जनता केँ अपन सरोकार पर बुझायल जइतय से नहि देखायल। ओ साहित्यकार लोकनि मैथिलीक साहित्यक्षेत्र मे नव-नव कलम भाँजनिहार लेल तरह-तरह केर ‘प्रमाणपत्र’ बाँटैत देखाइत छथि, लेकिन जनसरोकार पर हुनकर साहित्य मौन धारण केने अछि ताहि पर ओ लोकनि सेहो कहियो नहि ध्यान देलनि।

निष्कर्षः

 
एहि तरहें जनक-जानकी-याज्ञवल्क्य-गौतमक भूमि मिथिला – समूचा विश्व केँ न्याय, सांख्य, मीमांसा, आदि दर्शन दैत राजनीति केर सूत्र देनिहारक भूमि मिथिलाक अपन राजनीतिक वाद अर्थात् ‘मिथिलावाद’ केर अवस्था उत्कर्ष पर कोना पहुँचत? एहि सवाल केर जबाब ताकल जाय। अनाथ बच्चा केँ कियो बाबू बनि आंगुर धय लियए, ओ लालू हो, नीतीश हो, मोदी हो – जे कियो हो, एहि ठामक राजनीतिक नेता लेल सेहो बाबूक भूमिका यैह कारण बहरिये नेता करैत अछि। वाद केर सवाल मे सेहो राष्ट्र प्रथम केर नीति पर राष्ट्रवाद आ जातीय धुन मे मस्त एहि ठामक विभाजित जनता वास्तव मे जातिवाद लेकिन नाम केर सामाजिक न्याय दिश झुकाव रखैत अछि। मिथिलावाद केँ अस्तित्व मे आनबाक लेल बिना कोनो समुचित गृहकार्य कएने छात्र सभक एक समूह बरु आर सँ बेसी सशक्त काज करैत देखाइत अछि, देखबाक बाकी अछि जे आगामी विधानसभा चुनाव २०२० धरि ई मिथिलावाद कोन करवट लैत अछि।
 
हरिः हरः!!