आइ महावीर जयन्ती, हुनकर शिक्षाक उपयोगिता हर मानव लेल आइ बेसी प्रासंगिक ओ उपयोगी

महावीर जयन्ती विशेष
 
आइ एक अवतारी महापुरुष केर जन्म जयन्ती छन्हि। महावीर – वर्द्धमान – जैन धर्मक २४म तीर्थांकर केर जयन्ती दिवस थिक आइ। पृथ्वी पर ईश्वरक अनेकों रूप अबैत रहला अछि, एखनहुँ छथि आर भविष्यहु मे औता। धर्म आ ईश्वर केर ई सिद्धान्त ततेक विलक्षण छैक जे सर्वोच्च सत्तावान द्वारा संचालित प्रकृति आ वायुमण्डल मात्र नहि, सूर्य, चन्द्रमा, तारा आ प्रकृति द्वारा चलि रहल विभिन्न प्राकृतिक चक्र मे जीवनक अस्तित्व आ सभक बीच समन्वय मे सब कियो नव-नव बात आ कि पुरान स्थापित सत्य संग अपन भूमिका अदा करैत रहैत अछि। एहि क्रम मे आबि जाइत छथि किछु विशिष्ट पुरूष! हुनकर नाम अमर भऽ जाइत छन्हि। पीढी दर पीढी लोक हुनकर नाम स्मरण करैत रहैत छन्हि। आर एहि तरहें ओ महापुरुष केर देल सन्देश केँ मोन पाड़ैत छथि, कारण ओ मानव कल्याण लेल किछु विशेष सूत्र दय केँ गेल छथि। आउ, बुझबाक चेष्टा करी जे महावीर वर्द्धमान आखिर कोन नव सूत्र देलनि।
 
वर्तमान बिहार (प्राचीन मिथिला) केर वैशाली क्षेत्र मे एक क्षत्रीय राजाक घर मे राजकुमार केर रूप मे एलाह महावीर। ३० वर्षक उमेर मे सांसारिकता सँ मुक्त भऽ आध्यात्मिक खोज मे संन्यासी बनिकय निकैल पड़लाह। १२ वर्ष धरिक तप-साधना उपरान्त कैवल्य ज्ञान (omniscience) केर ज्ञाता बनि ३० वर्ष धरि अपन सारगर्भित उपदेश दैत मानव कल्याण केर विभिन्न उपाय सुझौलनि, जे आइ धरि जैन संप्रदाय द्वारा पूर्ण महत्वक संग पालन कयल जाइछ। तदोपरान्त महावीर निर्वाण (मोक्ष) केँ प्राप्त कयलनि। हुनक आयु ७२ वर्ष केर मानल जाइछ, महावीर केर निर्वाण प्राप्तिक बाद हुनकर पार्थिव शरीरक दाह संस्कार कयल गेल।
 
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह – आध्यात्मिक तौर पर मुक्त बनबाक लेल ई ५ गोट आवश्यकता पर ओ प्रकाश देने छलाह। कोनो जीव पर अपन विचार, वाणी आ क्रिया सँ चोट नहि पहुँचायब (अहिंसा), सदिखन सत्य केर प्रयोग करब, मिथ्यावादन नहि करब (सत्य), अस्तेय यानी स्वयं श्रम सँ प्राप्तिक अतिरिक्त प्राप्ति लेल चोरी कथमपि नहि करब, ब्रह्मचर्य अर्थात् काम ओ वासनाक शिकार नहि बनब, अपरिग्रहक अर्थ भेल जे अनावश्यक रूप सँ कोनो बंधन मे नहि पड़ब – यैह ५ गोट सुझाव हिनक उपदेशक सार तत्त्व छल। ओ अनेकान्तवाद केर सिद्धान्तक शिक्षा सेहो देलनि जेकर २ भाग मे स्यादवाद ओ न्यायवाद आगाँ पूर्ण विश्लेषण कएने छथि। हिनकर प्रमुख शिष्य भेलखिन इन्द्रभूति गौतम जिनका जैन आगम केर रूप मे जानल जाइत छन्हि। मौखिक रूप सँ देल गेल सन्देश कालान्तर मे ईशा पूर्व पहिल शताब्दी धरि विस्मृतिक अवस्था मे पहुँचि गेलाक बाद पुनः यैह आगम लोकनि द्वारा जैन मुनि लोकनि केँ देल गेलनि जे आइ जैन धर्मशास्त्रक मुख्य आधार मानल जाइछ। महावीरक जाहि स्वरूप केर दर्शन होइत अछि से पुरातात्विक खोज सँ ई.पू. पहिल सदी सँ २ ईश्वी केर बीच मथुरा मे प्राप्त भेल अछि। हिनक जन्म केँ महावीर जयन्ती आ निर्वाण दिवस केँ जैन सम्प्रदायक दिवाली कहिकय मनेबाक परम्परा स्थापित अछि।
 
महावीर लेल पूर्वक जैन ओ बुद्ध साहित्य मे प्रयुक्त नाम न्यायपुत्ता, मुनि, समाना, निग्गान्त, ब्राह्मण एवं भगवान शब्द भेटैत अछि। बौद्ध सुत्त मे ‘अर्हा’ (मूल्यवान्) एवं वेयायी (ज्ञानी) शब्द भेटैत अछि। महावीर वेद केँ शास्त्र केर रूप मे मान्यता नहि देलनि। ओ कल्प सूत्र मे श्रमण यानि प्रेम आ घृणा सँ ऊपर कहल गेला अछि। बादक जैन साहित्य मे महावीर केर बचपनक नाम वर्द्धमान (ओ जे बढैत अछि) कहैत अछि कारण हुनका एला सँ राज्य केर बढत भेल। कल्प सूत्र मे हिनका महावीर (महान नायक) कहल गेलनि कारण ई केहनो खतरा, भय, कठिनाई आ महामारी मे एकनिष्ठ जीवन बितौलनि। ई एक तीर्थांकर केर रूप मे जानल जाइत छथि। (स्रोतः विकिपेडिया)
 
चैत मासक शुक्ल पक्ष केर त्रयोदशीक दिन हिनकर जन्म हेबाक कारण आइये महावीर जयन्ती मनायल जा रहल अछि। ‘जियो और जीने दो’ वला हिन्दीक लोकप्रिय कथनीक सूत्रपात हिनकहि सँ भेल कहल जाइछ। हिनकर जन्म केर समय पशुबलि, हिंसा और जाति-पाति केर भेदभाव वला अंधविश्वास चारूकात व्याप्त छल। हिनक जन्म कुण्डलपुर मे इक्ष्वाकु वंश केर राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला केर ओतय भेलनि। हुनका मे क्षमा करबाक अद्भुत गुण छलन्हि। ओ कहथि जे धर्म मांगय सँ नहि, स्वयं धारण करय सँ भेटैत छैक, जीतय सँ भेटैत छैक। जीतबाक लेल संघर्ष आवश्यक छैक। समर्पण जरूरी छैक। ई कार्तिक अमावस्याक कृष्ण पक्ष मे महानिर्वाण प्राप्त कयलनि।
 
भगवान महावीर केर अनमोल वचन
 
– कोनो आत्माक सबसँ पैघ गलती अपन असल रूप केँ नहि चिन्हब थिक, आर ई मात्र आत्मज्ञान प्राप्त कयला टा सँ ठीक कयल जा सकैत अछि।
 
– शांति और आत्म-नियंत्रण अहिंसा थिक।
 
– प्रत्येक जीव स्वतंत्र अछि। कियो केकरो पर निर्भर नहि करैछ।
 
– भगवानक अलग सँ कोनो अस्तित्व नहि छन्हि, सब कियो सही दिशा मे सर्वोच्च प्रयास कय केँ देवत्त्व प्राप्त कय सकैत अछि।
 
– प्रत्येक आत्मा स्वयं मे सर्वज्ञ और आनंदमय अछि। आनंद बाहर सँ नहि अबैछ।
 
– सब जीवित प्राणीक प्रति सम्मान अहिंसा थिक।
 
– सब मनुष्य अपन स्वयं केर दोषक कारण सँ दुःखी होइत अछि, आर ओ स्वयं अपन गलती सुधारि कय प्रसन्न भऽ सकैत अछि।
 
– अहिंसा सबसँ पैघ धर्म थिक।
 
– स्वयं सँ लड़ू, बाहरी दुश्मन सँ केहेन लड़नाय? ओ जे स्वयं पर विजय पाबि लेत ओकरा आनंदक प्राप्ति हेतैक।
 
– स्वयं पर विजय प्राप्त करब लाखों शत्रु सभ पर विजय पाबय सँ बेहतर अछि।
– अहाँक आत्मा सँ परे कोनो शत्रु नहि अछि। असली शत्रु अहाँक भीतर रहैत अछि, ओ शत्रु थिक क्रोध, घमंड, लालच, आसक्ति आर घृणा।
 
– आत्मा अकेले अबैत अछि आ अकेले चलि जाइत अछि, नहि कियो ओकरा संग दैत छैक आर नहिये कियो ओकर मित्र बनैत छैक।
(स्रोतः न्युज २४)
 
हरिः हरः!!