मिथिलाक माछ, मखान आ पान विलोप होयबाक संग जमीनक नीचांक जलस्तरक कमी खतरनाक

कोसी प्रोजेक्ट द्वारा बाढि नियंत्रण संग सिंचाई आ जल दोहनक विभिन्न योजना रहितो आखिर ई फेल कियैक भऽ रहल अछि?
विचार – प्रवीण नारायण चौधरी
 
मिथिलाक माछ, मखान आ पान धीरे-धीरे विलोप होयबाक एकटा अत्यंत महत्वपूर्ण कारण ईहो छैक जे पहिने जेकाँ विभिन्न नदीक पानि चारूकात पसरैत नहि छैक आब। पहिने जेना छिरियाइत छल आर बड़का-बड़का चर-चाँचर आ जलाशय जेहेन जलमग्न भूभागक प्रचुरता रहैत छल से आब कम अछि। कारण छैक नदी पर करीब ४००० किलोमीटर बाँध निर्माण आ बाँधक भीतरे-भीतरे जल केँ बहाव केँ निर्देशित करैत बड़का नदी केर फीडर बनाकय एहि जलक समुचित लाभ वृहत् कृषि योग्य भूभाग केँ नहि दय सकब। एहि कारणे धरतीक नीचाँ आ ऊपर दुनू जलस्तरक अनुकूलता कृषि योग्य या आब त पेयजल प्राप्ति लेल सेहो धरतीक नीचांक जलस्तर काफी गहींर सँ प्राप्त होइत छैक।
 
कोसी बाँध परियोजना सहित अन्य-अन्य महत्वपूर्ण नदीक बाँध बनेला आ ताहि बाँध सँ नहर व अन्य छोट-छोट जल-बहाव मार्ग (संभवतः सुलिस गेट) मार्फत जल निस्तारण करबाक रख-रखाव पर हालांकि अरबों-अरबों रुपयाक बजट बिहार सरकार केर जल संसाधन विभाग द्वारा प्रत्येक बजट मे निकलैत छैक, लेकिन तैयो ई बाँध परियोजना सफल आ लाभदायक नहि सिद्ध भऽ सकल अछि। आबक बाढि पहिने सँ बेसी खतरनाक होइत छैक। बाँध टुटब आ फेरो अरबों-खरबों खर्च करब, यैह नियति बनि गेल देखाइत छैक। आइ धरि जल संसाधनक कोनो समुचित दोहन सेहो भेलैक तेहेन उल्लेखनीय आँकड़ा नहि भेटैत अछि।
 
विज्ञ लोकनिक आलेख आ शोध-विचार सब पढला सँ पता चलैत अछि जे बाँध निर्माणक काज किसान पहिने अपने करैत रहय, लेकिन से बांध अस्थायी आ छोट-छोट दूरी पर बाढिक पानि सँ नदीक ऊपरी भाग सँ निम्न भाग मे गादि जमा कय खेतीक ऊर्वरता बढेबाक उद्देश्य सँ बनाबय, उद्देश्य पूरा भेलाक बाद पुनः नदीक प्राकृतिक बहाव केँ अपन कोर्स मे बहय देबाक स्थिति साम्य कय दैत छलैक। अंग्रेजी हुकुमत सेहो १९म शताब्दी मे भारत पर हुकुमत करैत समय एहि बात केँ अनुकरण केलक, बंगाल, बिहार आ उड़ीसा मे बहुत रास बाँध निर्माण कराओल गेल। परञ्च बांध बेर-बेर टूटैत देखि अंग्रेज सरकार अपन सब सँ वृहत् बांध जे बंगालक दामोदर नदी मे बनौने छल तेकरा अपने सँ ध्वस्त कय देलक। तदोपरान्त बाढि नियन्त्रण लेल ओ सब अन्य-अन्य तकनीक केर प्रयोग करब आरम्भ केलक। कोसी नदीक वास्ते टेनिस वैली अथोरिटी (युएसए) केर डिजाइन अनुसार वैभेल परियोजना बनाओल गेल छल, एहि परियोजना ऊपर वैभेल प्लान पर सहमति भेलाक बाद १९४५-४७ केर अवधि मे बजट आबंटन सेहो भेल छल। लेकिन १९४७ मे देश स्वतंत्र भेलाक बाद भारतक प्रथम नेहरू सरकार द्वारा दामोदर घाटी परियोजना आ भाखड़ा नांगल परियोजना केँ ओ आबन्टित रकम स्थानान्तरित कय देल गेल, जाहि पर तात्कालीन बिहार मुख्यमंत्री भारतक प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद केँ हस्तक्षेप करैत बिहार केर भविष्य केँ अंधकार नहि करबाक बात तक कहैत नेहरू सरकार केँ मनेबाक लेल अनुरोध कयने रहथि।
 
आइ जे ई क्षेत्र सिर्फ मजदूर सप्लायर क्षेत्र केर रूप मे देखाइत अछि ताहि मे कतहु न कतहु नेहरू सरकारक एहि निर्णय केँ जिम्मेवार मानल जाइत अछि। बाद मे काफी राजनीतिक घेराबन्दी भेला पर ‘कोसी परियोजना’ केर रूप मे बिहार केँ कोसीक बाढि नियन्त्रण लेल अधिकार देल गेल १९५४ मे, तहिना नेपाल आ भारत बीच एहि लेल समझौता भेल, लेकिन बाँध, नहर, पनबिजली, हाई डैम आदिक सपना आइ धरि कोन गति आ स्थिति मे जनता केँ केहेन उपलब्धि दय सकल अछि ई सर्वविदिते अछि। डा. लक्ष्मी नारायण सिन्हा (अर्थशास्त्री) द्वारा कयल गेल शोध केँ हुनकर नाम पर चलि रहल संस्थाक अध्यक्ष हुनकहि पुतोहु डा. ज्योति सिंह द्वारा संग्रहित एहि आलेख मे आर विभिन्न दृष्टि सँ बात फरिछायल भेटैत अछि। ताहि दृष्टि सँ एकरा मैथिली जिन्दाबाद पर एतय http://www.maithilijindabaad.com/?p=12668 राखल अछि, कृपया रुचि हो तऽ जरूर पढी। ई सब मिथिलाक यथार्थ सरोकारक बात थिक, एहि मे आरो गम्भीर अध्ययन करैत उपाय लेल सरकार केँ सुझाव जरूर दी। अक्सर हमरा लोकनि कपोलकल्पित आ वगैर समुचित अध्ययनक बात मे उलैझ जाइत छी, लेकिन ताहि सँ समाधान कम आ आपसी विद्वताक प्रदर्शन मात्र बेसी होइत अछि। हालहि चेतना समितिक अगुवाई मे एहि विषय पर एक परिचर्चा कराओल गेल छल अन्तर्राष्ट्रीय मैथिल संस्था सम्मेलन मे, ओतहु मोटामोटी एहि तरहक माहौल देखायल। लेकिन सही रास्ता कि होयत, ताहि पर सरकार संग चर्चा आ प्रेशर ग्रुप मार्फत सुधार लेल प्रयास करब जरूरी अछि। एहि लेल आइ सिर्फ बिहार सरकारक जल पबन्धन – यानि जल संसाधन मंत्रालय जिम्मेवार अछि। केन्द्र केर सम्पूर्ण सहयोग एहि मंत्रालयक मार्फत अबैत अछि।
 
हरिः हरः!!