वास्तव मे होली मनेबाक आध्यात्मिकता कि छैक – अत्यन्त महत्वपूर्ण रहस्यक खोज

होली पर लेख – रोचक जनतब सहित
 
होली: शास्त्रमत आ परंपरा
 
हिन्दू शास्त्रमतानुसार हिरण्यकशिपु नामक एक अतिमहात्त्वाकांक्षी राजा छलाह जिनक इच्छा सभ सँ महान लोक बनबाक छलन्हि। एहि इच्छाक पूर्तिलेल ओ घोर तपस्या कयलन्हि आ ब्रह्माजी सँ वर प्राप्त कयलन्हि। ब्रह्माजी हुनक भक्तिपूर्ण कठोर तपस्यासँ प्रसन्न भेलापर हुनक एहेन इच्छा पूर्ति करबाक वर देलन्हि –
 
“तथास्तु हिरण्यकशिपु! अहाँक मांगल वर अनुसार अहाँ केँ नहि कोनो मानव नहि कोनो जानवर मारि सकत, नहि घर में नहिये बाहर में मारि सकत, नहि दिन में नहिये राइत में मारि सकत, नहि तऽ अस्त्र सऽ नहि शस्त्र सऽ मारि सकत, नहि भूतल पर – नहिये पाताल में आ नहिये आकाश में मारि सकत।”
 
ब्रह्माजी सँ ई वर प्राप्त भेला उपरान्त हिरण्यकशिपु केँ कोनो विधिसँ मरब असंभव भऽ गेलैक आर एहि कारणे ओ अति अभिमानी बनि गेल। आब ओ अपन प्रजा सँ स्वयं केँ सर्वोच्च सत्ताधारी भगवान्‌ समान पूजा करय लेल आदेश जारी कय देलक। सभ केओ ओकर एहि आदेश केर पालन करय लागल। मुदा ओकर अपनहि पुत्र जेकर नाम प्रह्लाद छलैक – ओ विष्णु भगवान्‌ केर परम भक्त छल आर वैह टा अपन पिताक घोषणाक विरुद्ध उल्टा पिता सँ एहि तरहक गलत भ्रम आ अभिमान केँ त्यागि एकमात्र ईश्वरक परमसत्ता केँ मानय लेल विनती करैत रहल।
 
 
राजा हिरण्यकशिपु एहि बात सँ बहुत क्रोधित भेलाह। ओ भिन्न-भिन्न उपाय सँ अपन पुत्र केँ बुझेलनि – लोभ-लालच देलनि। लेकिन प्रह्लाद हुनक एहि बात सभ सँ टस्स सऽ मस्स नहि भेल। ओ अपन अखण्ड भक्ति भगवान्‌ विष्णु में बनेने रहल। उल्टा अपन पिता केँ कतेको उदाहरण दैत झूठ अभिमान केर त्याग करबाक लेल आ समस्त ब्रह्माण्डक एकमात्र स्वामी परमेश्वर केर शरणक महत्त्व बुझबैत ईश्वरक भक्ति लेल कारुण्य अनुरोध करैत रहल। परन्तु हिरण्यकशिपु अपन तेज वरदान केर अभिमान में चूर सत्य केँ स्वीकार करब तऽ दूर, क्रोधवश अपनहि भक्तिमान्‌ पुत्र प्रह्लाद केँ मृत्युदंड लेल फरमान दऽ देलक। यैह कारण हिरण्यकशिपु अपन बहिन होलिका जिनका सेहो एक विशिष्ट वर भेटल छलन्हि जे केहनो आगिक असर हुनका पर नहि पड़त तिनका सँ एहि वरदानक प्रयोग करैत प्रह्लाद केँ अपन कोरा में राखिकय अग्निकुँड में प्रवेश करय लेल आदेश देलक। मुदा ईश्वरक लीला देखू, होलिका संग अग्निकुँड मे प्रवेश कयला उत्तर प्रह्लाद सहज भाव संग अपन ईष्ट भगवान्‌ विष्णुकेर नाम-सुमिरन करैत रहलाह तथा परिणाम एहेन भेलैक जे होलिकाक वरदान हारि गेल, ओ स्वयं जैर के खाक भऽ गेलीह। आर, प्रह्लाद ताहि कुँड सँ हँसैत बाहर निकैल अयलाह।
 
होलिका दहन केर इतिहास
 
हिन्दू धर्मप्रथा में होली मनायब होलिकाक मृत्यु उपरान्त करबाक परंपरा रहलैक अछि। होलीक पूर्व-सन्ध्यापर काठ, कपड़ा-लत्ता व अन्य जरय योग्य सामग्री सभक ढेरी मे आगि लगाकय होलिका दहन कयल जेबाक परंपरा छैक। होली पाबनि मे मात्र उमंग-उत्साह आ आनन्दक उजमाड़ि टा नहि, बहुत रास गंभीर शिक्षा प्राप्तिक सन्देश सेहो छैक। होलिका दहन केर मननीय आध्यात्मिक अर्थ ई छैक जे जँ कियो दोसर लेल खधा खोदैत अछि तऽ ओहि खधारि मे ओ स्वयं खसैत अछि – एहि भावनाक संग होलिका दहन केर पवित्र संवाद यैह छैक जे कथमपि दोसर लेल अहित नहि सोची, किऐक तऽ दोसराक अहित हेतै आ कि नहि हेतै हमर अहित जरुर भऽ जायत। तहिना भक्त-जन केँ अपन ईष्ट में विश्वास प्रह्लादक समान अटूट रखबाक विशेष प्रेरणा सेहो एहि होलिका दहन सँ भेटैत अछि। प्रह्लाद कनिकबो विचलित नहि भेलाह, विपत्ति मे सेहो अपन ईष्ट पर ओतबे अटूट विश्वास रखैत हँसैते आगि मे प्रवेश कय गेल छलाह। एतेक महत्वपूर्ण सन्देशक संग होलिका दहन केर परंपरा रहल छैक, खासकय मिथिला मे।
 
होलिका दहन सँ जुड़ल किछु आर महत्वपूर्ण तथ्य
 
एहि महत्वपूर्ण परम्परा सँ जुड़ल कतेको रास किंवदन्ति कहल-सुनल जाइत अछि, जेनाः
 
*विष्णु स्वयं ओहि अग्निकुंड में आबि अपन शरणागत भक्त प्रह्लाद केर रक्षा कयलन्हि।
 
*ब्रह्माजी द्वारा होलिका केँ अपन रक्षाक लेल अग्नि सँ कोनो हानि नहि होयबाक वरदान देल गेल छल, कथमपि एहि लेल नहि जे ओ एहि वरदान सँ दोसर केकरहु हानि पहुँचाबथि। तेँ, वरदान विशेष परिस्थिति में निष्प्रभावी बनि गेल आर प्रह्लाद सुरक्षित रहि गेलाह। जखन कि गलत भावना आ वरदानक दुरुपयोग केनिहाइर होलिका जरिकय खाक भऽ गेलीह।
 
*यदाकदा ईहो मान्यता छैक जे होलिका केँ अपन भाइ राजा हिरण्यकशिपुक अभिमान नीक नहि लगलन्हि। फलस्वरूप ओ अपन वरदानक संग प्राप्त एक विशेष ओढनीरूपी परिधान जे ओढिकय आगि मे प्रवेश कयला उत्तर नहि जरबाक आशीर्वाद छलन्हि, तेकरा दयावश ओ भातीज प्रह्लादकेँ पहिरा देलीह। आर अपन जान दैत ओ प्रह्लाद समान सच्चा भक्तकेर रक्षा करैत ईश्वर में समा गेलीह। हुनक ओढनी जे विशिष्ट छलैक ताहि केर उपयोगिता ओ भक्त प्रह्लाद लेल समर्पित करैत ईश्वर में समा गेलीह।
 
होली केर इतिहास
 
होलिका केर भस्म भेला उपरान्त आरो विभिन्न विधि सँ प्रह्लाद केँ मारबाक चेष्टा कयनिहार क्रूर व अभिमानी पिता हिरण्यकशिपु हारि-थाकिकय स्वयं द्वारा अपन भक्त-पुत्र द्वारा अपन सर्वोच्चता केँ स्वीकार करयवला फरमान केर अवहेलना लेल प्रह्लाद केँ मृत्युदंड देबाक लेल उद्यत भेल। प्रह्लाद केँ भरल सभा मे एक गोट खम्भा में बान्हि देलक आर तेकर बाद अट्टहास करैत अभिमानक चरम प्रदर्शन करैत ईश्वरक सत्ता केँ चुनौती देबय लागल। ओ बाजय लागल,
 
“हमहुँ देखी जे आब प्रह्लाद केर कोन भगवान्‌ एकरा हमर हाथे मरय सँ बचबैत छथि। हमरा भेटल वरदान केर चलते कियो हमर किछु बिगाड़िये नहि सकैत अछि।”
 
एहि तरहें अट्टहास-चिग्घार करैत ओ प्रह्लाद केँ कहैत रहलाह आर प्रह्लाद विहुँसैत-हँसैत अपन पिता सँ बेर-बेर प्रार्थनापूर्वक सद्‌बुद्धि प्राप्त करय लेल निवेदन करैत रहल। प्रह्लाद अपन प्रिय भगवान्‌ केर नाम भजन करैत रहल।
 
“श्रीमन्नारायण-नारायण हरि-हरि!
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृ्ष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥”
 
हिरण्यकशिपु केर क्रोधक सीमा आरो बढैत गेलैक आर अन्ततः ओ अपन पुत्रक विश्वास पर शंका करैत पूछय लगलाह,
 
“बता तोहर भगवान्‌ कहाँ छथुन आ कोना बचेथुन!”
 
प्रह्लादक ऊपर खड्ग तानि संहार लेल उद्यत् हिरण्यकशिपु केँ जबाब भेटैत छैक –
 
“हे पिता! ईश्वर सर्वत्र छथि। अहाँ में, हमरा में, एहि खंभा में…!”
 
हिरण्यकशिपु खम्भा पर प्रहार करैत अपना तरहें भगवानहुँ केँ ललकारा दैत देरी भगवान् वैह खम्भा फाड़िकय प्रकट भऽ जाइत छथि। हुनकर स्वरूप विचित्र अछि। ओ नहिये नर छथि, नहिये जानवर। ओ आधा नर आ आधा जानवर – नरसिंह केर रूप में अयलाह आर भयंकर गर्जना करैत हिरण्यकशिपु केँ पकड़ि हाथ सँ तरुवारि छीनि ओकरा दूर फेंकि बिना कोनो अस्त्र वा कोनो शस्त्र बल्कि अपन नहे सँ – नहिये दिन मे आ नहिये राति मे बल्कि दिन-रातिक संधिक समय संध्याकाल मे – नहिये घर में नहिये बाहर में बल्कि घर-बाहरक संधिस्थल चौखैट (मोख) पर – नहि जल वा नभ आर नहिये थल मे बल्कि अपन जँघापर – ब्रह्माजीक देल वरदानक पूर्ण सम्मान करैत भगवान् नरसिंह द्वारा भक्तक रक्षा लेल अभिमानी हिरण्यकशिपु केँ चीड़-फाड़िकय ओकर खून सँ उन्माद आ मादकता केँ प्राप्त करैत उन्मत्त अवस्था मे मारि देलन्हि। हिरण्यकशिपुक असुरता केर अन्त कय ओहि आसुरिक खून सँ अपने इच्छे होली खेलाइत अपन सनातन सिद्धान्त जेर धर्म केर रक्षार्थ हम एहि पृथ्वीपर प्रकट होइत रहब से वचन पूरा कयलन्हि। एहि तरहें अभिमान केँ चूर करैत भक्तक रक्षा करनिहार भगवान्‌ केर जयकारा सँ चारूकात अनघोल भऽ गेल। त्रसित जनता घोर अभिमानी राजा सँ मुक्ति पयलन्हि आ भक्तिमान राजा प्रह्लाद गद्दीपर आरोहण कयलाह।
 
एहि तरहें परंपरागतरूप में हिन्दू केर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पावैन केर रूप में होली मनाओल जाइछ। हरेक होली में लोक यैह सीख आ प्रेरणा पबैछ जे अभिमानक विरुद्ध – असत्य आ मिथ्याचारक विरुद्ध एक नव संकल्प लेल जीवन में नव शक्तिक संचरण हेतु होली मनाबी। समस्त भक्तमान मानवीय प्रजा लेल होलीक अनुपम शुभकामना।
 
हरिः हरः!!