अष्टावक्र संहिता – अध्याय ७ – उच्चतर ज्ञान

अष्टावक्र संहिता – अध्याय सातम – उच्चतर ज्ञान
 
मैथिली जिन्दाबाद पर अष्टावक्र संहिता केर धारावाहिक स्वाध्याय २०१९ केर संकल्प

पिछला अध्याय छठम् मे गुरु अष्टावक्र ब्रह्मलीन होयबाक – आत्मारूपी परमात्मा संग एकाकार होयबाक चारि तरीका बतेलनि। ताहि पर जनक समान उच्च ज्ञानी शिष्य अपन उद्गार प्रकट करैत अपन मनोभाव केँ गुरु अष्टावक्र केर सोझाँ केना राखि रहल छथि, तेकर विवरण मात्र ४ श्लोक मे देखल जाउ। ई चारि गोट उदाहरण पूर्वक अध्याय मे सेहो वर्णित छल। परञ्च आब एकाकार होयबाक ज्ञान हासिल करबाक गुरुक वर्णित मार्ग केँ शिष्य पुनः गुरुक कहल चारि गोट उदाहरण मे सँ उच्च ज्ञानक रूप मे हृदयंगम चारि गोट बात राखि रहला अछि।

 
एकटा दुविधा – गुगल द्वारा उपलब्ध करायल गेल अध्याय ६ मे ईहो चारि गोट ज्ञान गुरु द्वारा कहबाक बात कहल गेल अछि। जखन कि स्वामी नित्यस्वरूपानन्दजी केर अनुवादित पोथी मे ‘जनक उवाच’ कहल गेल अछि। हुनका द्वारा देल गेल वृहत विवरण मे सेहो जनकहि केर मनःस्थितिक उल्लेख करैत ई चारि श्लोक कहबाक बात कहल गेल अछि। अतः हम एक बेर पोथीक आधार पर जनकहि केर मनःस्थिति केँ आत्मसात करैत बढि रहल छी। बाद मे जँ कोनो आरो सन्दर्भ उपलब्ध होयत तऽ ताहि तरहें सुधार करब। अंग्रेजी अनुवाद मे हम दुनू अनुवाद राखब श्रेयस्कर मानि विगत किछु समय सँ दुनू राखैत आबि रहलहुँ अछि। दु अलग अनुवाद पढला सँ बात आरो नीक जेकाँ फरिछाइत अछि।
 
जनक उवाच।
 
आकाशवदनन्तोऽहं घटवत् प्राकृतं जगत्।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥१॥
 
जनक कहैत छथि – आकाश केर समान हम अनंत छी और ई जगत घड़ा समान महत्त्वहीन अछि, ई ज्ञान थिक। एकर नहिये त्याग करक अछि आर नहिये ग्रहण, बस एकरा संग एकरूप होबक अछि।
 
Janaka says – I am infinite like space, and this world is unimportant like a jar. This is Knowledge. This is neither to be renounced nor to be accepted but to be one with it.
 
(Boundless as space am I, and the phenomenal world is like a jar; this is Knowledge. So it has neither to be renounced nor accepted nor destroyed.)
 
नोटः एतय दू अंग्रेजी अनुवाद २ अलग बात केँ वर्णन कय रहल अछि। एहेन स्थिति मे हमरा समान मुमुक्षु लेल समस्या स्वाभाविके होयत। तैँ, कहल गेल अछि – जखन कोनो शास्त्रीय उपदेश केँ संस्कृत सँ अपन भाषा मे बुझबाक प्रयत्न करी, त एक सक्षम गुरु केर सान्निध्य आवश्यक होइत अछि। खैर… एखन हम अपना केँ एना बुझा रहल छी – दुनू अनुवाद केर केन्द्रीय भाव केँ ग्रहण करब त एक्के ज्ञान प्राप्त होयत। अस्तु… आगू बढी। संस्कृत सँ सीधा मैथिली मे बुझनाय सहज अछि बरु! 🙂 इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः – एकर भाव अनुवाद सीधे अपन मातृभाषा मे करब तऽ कि भेटत – यैह ज्ञान थिक, तैँ एकर नहि तऽ त्याग कयल जा सकैछ, नहिये ग्रहण कयल जा सकैछ – ज्ञान सँ एकाकार यानि ओहि मे ‘लय’ – मिलि गेनाय जरूरी अछि। आर, पिछला अध्याय मे अष्टावक्र ज्ञानहि मे योग – आत्मज्ञान प्राप्त शिष्य जनक केँ निरूपित कएने छलाह। तैँ, गुगल वला अनुवाद बेस उचित बुझाइत अछि। अपने लोकनि पाठक मे जे ज्ञानी-जानकार होइ, ओ एहेन द्वंद्वक स्थिति सँ समाधान कय सकैत छी।
 
महोदधिरिवाहं स प्रपंचो वीचिसऽन्निभः।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥२॥
 
हम महासागर केर समान छी और ई दृश्यमान संसार लहर केर समान। ई ज्ञान थिक, एकर नहिये त्याग करक अछि आर नहिये ग्रहण, बस एकरा संग एकरूप होबक अछि।
 
I am like a vast ocean and the visible world is like its waves. This is Knowledge. This is neither to be renounced nor to be accepted but to be one with it.
(I am like the ocean and the universe is like the wave; this is knowledge. So it has neither to be renounced nor accepted nor destroyed.)
 
अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद् विश्वकल्पना।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥३॥
 
ई विश्व हमरहि मे ओहिना कल्पित अछि जेना कि सीप में चाँदी। ई ज्ञान थिक, एकर नहिये त्याग करक अछि आर नहिये ग्रहण, बस एकरा संग एकरूप होबक अछि।
 
This world is imagined in me like silver in a sea-shell, this is Knowledge. This is neither to be renounced nor to be accepted but to be one with it.
(I am like mother of pearl and the illusion of the universe is like silver; this is Knowledge. So it has neither renounced nor accepted nor destroyed.)
अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥४॥
 
हम समस्त प्राणी मे छी, जेना सब प्राणी हमरा मे अछि। ई ज्ञान थिक, एकर नहिये त्याग करक अछि आर नहिये ग्रहण, बस एकरा संग एकरूप होबक अछि।
 
I exist in everyone like everyone is in me. This is Knowledge. This is neither to be renounced nor to be accepted but to be one with it.
(I am indeed in all beings, and all beings are in me. This is knowledge. So it has neither to be renounced nor accepted nor destroyed.)
 
हरिः हरः!!