जनकपुर एलाह जानकी सँ नोत लेबय मैथिल भाइ लोकनि – भारत-नेपाल मैथिली सांस्कृतिक एकता

भरजुतिया मे दरभंगा सँ जानकीजी सँ नोत लेबय एलाह भाइ लोकनि, मिथिलावाद केर एक अनुपम कीर्ति

विशेष सम्पादकीय

‘मिथिलायां भव: मैथिल:’ – याज्ञवल्क्य संहिताक एहि प्रसिद्ध पाँति केँ पुनर्स्थापित करबाक लेल जनकलली जानकी केँ बहिन माननिहार मिथिलावादी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता लोकनि भारतीय मिथिलाक दरभंगा सँ नेपालीय मिथिलाक केन्द्रीय भूमि राजा जनकक राजधानी जनकपुर मे आबिकय भरदुतियाक विशेष अवसर पर जानकी सँ नोत लेबाक लेल अयलाह। आइ दुइ देश मे प्रतिष्ठापित मिथिला केर जनता-जनता बीच स्थापित सम्बन्ध केँ एकटा नव आयाम भेटल। ओना जानकी मात्र मिथिला टा नहि, देशहु लेल संयुक्त आ पूज्य ऐतिहासिक सुपरिचित आ ईश्वरक लीला केँ पृथ्वीपर प्रकट कयनिहारि रामायणक नायिका थिकीह। लेकिन दुइ गोट संप्रभुतासंपन्न राष्ट्रक सीमा अनुरूप ‘ओहि पार’ आ ‘एहि पार’ शब्द एतय नेपाल मे काफी प्रचलित हेबाक घड़ी आ हालक भारतीय राजनीति मे हिन्दू राष्ट्रवाद केर पुनर्स्थापनाक असीम संभावनाक बीच हस्तिनापुर-जनकपुर केर पाटलिपुत्र-जनकपुर केर बढैत कूटनैतिक सम्बन्ध आ आपेकता मे दरभंगा सँ जनकपुर आबिकय ‘धार्मिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध’ केँ एकटा नव परिभाषा मे बान्हबाक आ दुइ राष्ट्र बीच मित्रता ओ सौहार्द्रताक एकटा अनुपम सन्देश देबाक लेल ई ‘भरदुतिया डिप्लोमैसी’ सेहो दूरगामी होवय वला अछि।

दरभंगा सँ मिथिला राज्य निर्माण सेनाक महासचिव राजेश झा कहलनि अछि जे मातृस्वरूपिणी बहिन जानकी जी के निमित्त पंचकन्या सँ भरदुतिया के नोत लेल। भाई-बहिन केर नूतन संबंध केँ स्थापना भेल। किशोरी जी केर कृपा सँ जीवनक एकटा रिक्त संबंध केर भरपाई सेहो भेल। किशोरी जी केर सेवक बड़े सरकार आ छोटे सरकार लोकनि सँ आशीर्वाद प्राप्त भेल। मिथिला हित पूर्ति लेल हुनक आशीर्वाद महत्वपूर्ण अछि।

सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्वकर्ता अनिल झा सहित आदित्य मन्ना, रामनरेश ठाकुर, अजित मिश्रा, नुनु झा, सुनील कुमार व तिवारीजी सहभागी नोत लेनिहार भाइ लोकनिक स्वागत-सत्कार लेल जानकी मन्दिरक महन्थद्वय ‘बड़े सरकार – राम तपेश्वर दास’ व ‘छोटे सरकार – राम रौशन दास’ स्वयं आगन्तुक लोकनिक उपस्थित छलाह। आगन्तुक अतिथि लोकनि द्वारा सरकार लोकनिक माथ पर पाग चढा सम्मान प्रकट कयल गेल। विदित हो जे जानकी मन्दिरक महंथ केँ सम्मानपूर्वक ‘सरकार’ कहिकय संबोधन कयल जाइत अछि। एहि भरदुतिया मे जानकीस्वरूपा पाँच बहिन लोकनि जानकी मन्दिर व्यवस्थापन समितिक सदस्य श्री ऋषिकेश झा केर संयोजन मे उपस्थित छलीह। भाइ लोकनिक भव्य स्वागत जानकीरूपा बहिन लोकनि द्वारा मन्दिर परिसर मे कयल गेल आ मिथिलाक पारम्परिक रेबाज मुताबिक नोत लेलाक बाद भाइ द्वारा बहिन सब केँ उपहार सेहो प्रदान कयल गेल। भाइ लोकनि एकमुष्ट स्वर मे जानकीरूपा बहिन प्रति अपन निष्ठा ताउम्र निर्वाह करैत ई भरदुतिया पर आब सब वर्ष जनकपुर मे उपस्थित होयबाक वचन सेहो देलनि।

भारतीय जनता पार्टीक पूर्व जिला पदाधिकारी एवं सक्रिय राजनीति मे अपन अलग प्रखर पहुँच आ जनाधार रखनिहार अनिल झा अपन भावना रखैत कहलनि अछि जे वास्तव मे काल्हिक कार्यक्रम सँ एकटा नव आ अति विशिष्ट परम्पराक शुभारम्भ भेल। अहि के बाद प्राचीन काल मे दुइ भाग मे विभक्त मिथिला जकर एक भाग नेपालक क्षेत्र मे अछि आ दोसर भाग मे हम सब छी, ताहिक बीच, मातृस्वरूपा बहिन जानकी केर कारण विवाह पंचमी महोत्सव जेकाँ जाहि मे त्रेता युग सँ जेना अयोध्यानगरी सँ बारात आबि जनकपुर मे सीता-राम केर विवाहोत्सव मनाओल जाइत अछि, ओहिना आबयवला दिन मे भ्रातृ-द्वितिया महोत्सव मनाओल जायत और अहि तरहें एकटा अतिविशिष्ट परम्पराक शुभारम्भ होयत, और संयोग सँ एहि परम्पराक हिस्सा बनबाक सौभाग्य हमरो सब केँ भेटल।

“भरदुतिया मे जानकीजी सँ नोत लेबय जनकपुर चलू” शीर्षक सँ हम पहिनहि एकटा आह्वान जारी करैत जनकपुर निवासी एवं जानकी मन्दिर व्यवस्थापन सँ एहि आयोजन वास्ते एकटा अनुरोध-पत्र लिखने रही। पराम्बा जानकी मिथिला धरा सँ अवतार लेलनि, हमरो जन्म एहि धराधाम मे भेल, तैँ ‘जानकी’, ‘किशोरी’, ‘जनकलली’ हमर बहिन छथि! मिथिलाक रीत-रेबाज आ लोकरीति-संस्कृति, सब किछु वेद आधारित अछि। याज्ञवल्क्य समान विज्ञ सर्जक, संहिता सँ जीवनमार्ग केर देखौनिहार, कपिल समान सांख्य दर्शन विज्ञ, गौतम समान नैय्यायिक सूत्र देनिहार, जैमिनी समान मीमांसा सिखौनिहार, स्वयं जनक समान विदेह राजाक हम प्रजा, समस्त मैथिलीभाषी ‘मैथिल’ – जानकी केँ बहिन मानि भ्रातृवत् छी। जखन मिथिलाक परिचिति केँ एना बुझैत छी.. “मिथिलेति त्रिवर्णीयं श्रुतितोऽपि गरीयसी। मकारो विश्वकर्त्ता च थकार: स्थितिपालक:॥ लकारो लयकर्त्ता वै त्रिमात्रा शक्तयोऽभवत्। प्रणवेन समंविद्धि सर्वाधौध निवारणम्॥” अर्थात् “मिथिला शब्द मे जे तीनवर्ण अछि, ओहि मे मकारक अर्थ ब्रह्मा, थकार श्रीविष्णु तथा लकार लयकर्त्ता रुद्र मानल गेल छथि। आर, एहि तीन ‘म’ ‘थ’ ‘ल’ संग जे ‘त्रिमात्रा’ ‘इ’ ‘इ’ ‘आ’ लागल य ओ ‘शक्ति’ यानि सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती थिकीह। ई शब्द वेदक ॐ-कार बोधक हेबाक कारण सम्पूर्ण पाप-ताप केर संहारकर्त्ता थिक।” “इमे वै मिथिलाराज आत्मविद्या विशारद:। योगेश्वर प्रसादेन द्वन्द्वर्मुक्ता गृहेष्वपि॥” श्रीमद्भागवत केर ई वाक्यांश केँ शिरोधार्य कय पराम्बा जानकीक ध्यान धरैत, वृहद् विष्णुपुराण केर वचन मुताबिक, आत्मविद्याश्रयी हम मैथिल राजा जनकक प्रजा, काल्हि भरदुतियाक शुभ मुहूर्तक समय, विहान ११ बजे सँ १२ बजेक बीच, जानकीजीक परम-पवित्र मन्दिर मे पाँच कुमारि कन्याक पूजनोपरान्त जानकी केँ बहिन मानि कुमारिकन्या सँ नोत लैत मिथिलाक अस्मिता चौजुगी जियय ताहि लेल वचनबद्ध बनी! “जानकी स्वयं वेदमाता, जानकी त्रिकोणात्मिका। जानकी विन्दुरूपा च सर्वं विद्या समन्विता॥” सब किछु जानकिये टा छथि!! जे जनकपुर नहियो पहुँचि सकब से सब कियो अपन बहिन मे जानकी देखि मिथिलाक रक्षार्थ वचनबद्ध जरूर बनब। ॐ तत्सत्!! ‍- किछु एहि तरहक स्पष्ट भावनीतिक संग निवेदक श्री राजेश झा एवं साथी लोकनि – दरभंगा सँ जनकपुर केर यात्रा पर पहुँचनिहारक तरफ सँ आह्वान राखिकय अपन यथासंभव सहयोग-व्यवस्थापन मिलेबाक कार्य कएने रही। आर से एकटा नव इतिहास बनौलक, तेकर आत्मसंतोषक वर्णन शब्द मे संभव नहि अछि।

सहिये लिखलनि अछि साहित्यकार एवं मैथिली अभियानक प्रखर व्यक्तित्व श्री अजित आजाद – “एहि प्रतीकात्मक पूजा सँ एक नव अध्याय लिखल गेल। एकर दूरगामी प्रभाव देखि रहल छी।” आर हिनकर भावना केँ बल भेटैत अछि सामाजिक संजाल पर भेटि रहल समर्थन आ स्वीकार्यता केँ, एक राम नरेश ठाकुर लिखैत छथि, “जीवनक किछु दिन एतिहासिक भए जाइत अछि, जाहि मे आजुक दिन लिखल जाएत।” परञ्च मैथिली आ नेपाली भाषाक साहित्यकार संगहि क्रान्तिकारी विचारधाराक राजनीतिक नेतृत्वकर्ता श्री रोशन जनकपुरी एहि तरहक आयोजन केँ ‘निरर्थक’ कहिकय आलोचना कयलनि अछि। ओ कहलनि अछि, “अइ स नीक होयत अपने गामक, वा टोलक वा नगरक कोनो निर्बल असहाय आ गरिब बहीन स नेओत ली । ई एकटा धार्मिक भावना पर आधारित ड्रामा केर अतिरिक्त किछु नइँ अइ । निरर्थक ।” हुनका संग तर्क करैत चर्चा केँ आगू बढबैत कहल जे “कि धार्मिकता मनुष्यक लेल संस्कार नहि सरजी? धार्मिकताक सँ संसार भरि मे मनुष्य केँ एकटा अनुशासनात्मक बाट त भेटबे केलैक अछि। किछु ताहि तरहें एकरा स्वीकार करय मे अपनेक सहयोग चाही।” प्रत्युत्तर मे पुन: अपन नैतिकताक आधार पर ओ कहलनि जे “एहे त निरर्थकता अइछ । धार्मिकता धर्मक संस्कार अइछ, तै त विविध धर्मक विविध संस्कार अइछ । मनुख्खक संस्कार मानवियता अइछ, जे हम कहल । ई पृथ्वीपर जत्त जाउ, एक्केरंग भेटत । बसुधैव कुटुम्बकम । ई कठ्मुल्लापन अइछ, कबीर कहने छइथ : ‘का नागे को बाँधै चाम, जो नहि जाने आतम राम ।’ ” भावना अनुरूप हुनकर विचार केँ सेहो काटल नहि जा सकैत अछि लेकिन वर्तमान युग मे धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन सँ लैत मिथिलाक विद्यमान् विभाजित भूगोल आ लोकमानस बीच अधिक सँ अधिक संवेदनाक स्वर प्रस्फूटित करबाक मूल मर्म केँ पर्यन्त एहि कथित मानवीयताक धार मे बहा देनाय कतहु सँ मान्य नहि बुझायल। अस्तु! ई परम्परा आगू आरो जोर-शोर सँ बढय, हमर शुभकामना।

हरि: हर:!!