दूरक ढोल सोहाओन – मिथिलाक बेटा द्वारा मिथिलाक परम्परा दूसबाक प्रवृत्ति कतेक उचित?

विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

आ थोपड़ीक आवाज सँ सभागार गरगरा गेल…..
 
बात कि छल…. कने गौर करू!!
 
ओ हमर गामक नीक लोकक संतान, अपनो बहुत तेज आ होशियार। बाल्यकालहि सँ हुनकर प्रतिभाक खूब चर्चा हुअय। कक्षा मे आर-आर बच्चा सँ हुनकर नाम काफी आगू रहन्हि। होनहार वीरवान् के होत चिकने पात वाली बात हुनका पर सटीक बैसैत छल। जखन ओ रोजी-रोटी लेल प्रवासक जीवन मे प्रवेश कयलनि तखनहुँ अपन नीक बात-विचार सँ ओ नव शहर मे जल्दिये एक सुपरिचित लोक बनि गेलाह। हुनकर प्रतिष्ठा मे चारि चान लागि गेल जखन अपन मिथिलाक लोक सँ बेसी गैर-मैथिल लोक सेहो हुनका मान-सम्मान देलकनि। एक-दु बेर नहि, कइएक बेर हुनका मंच पर बजाकय अन्य-अन्य समाज सेहो सम्मान देलकनि। अचानक हुनकर स्वभाव मे एकटा खास परिवर्तन देखल जाय लागल। ओ आब अपन मिथिलाक लोक द्वारा कोनो विशेष समारोह मे बजायल गेलापर किछु बेसिये भाव खाय लगलाह। एक तऽ मिथिलाक समारोह मे भाग लय सँ परहेज, दोसर जँ जेबो करब तऽ अपन मिथिलाक लोक आ अनेकों बात-व्यवहार केँ तुच्छ दृष्टि सँ वर्णन करय लागब आ लोक-समाज केँ आईना देखेबाक काज बेसी करबाक आदति देखय लागल हुनका मे मिथिलाक लोक-समाज। शुरू-शुरू मे हुनकर प्रतिष्ठा आ लोकप्रियताक कारण लोक हुनकर बात सुनि काफी मनन करय आ अपन विचार-व्यवहार पर देखाओल गेल विभिन्न दोष सँ अपना मे हीनताबोध अबैत जेबाक भाव सेहो देखय लागल।
 
एक दिन मिथिलाक एक विशेष सभा मे फेरो ओ गणमान्य सुप्रतिष्ठित आ लोकप्रिय सज्जन पुनः कतेक मनौती कयलाक बाद एला आ अबैत देरी पुनः शुरू भऽ गेला…. “आइ अपन मिथिला समाज मे लोक ओदौद मे डूबल अछि। लोकक श्राद्ध तक मे आब बड़का-बड़का भोज होबय लागल अछि। देखाबा आ आडंबर खुलेआम समाज केँ खोखला बनेने जा रहल अछि। देखू फल्लाँ समाज केँ…. आइ कतेक विकसित आ बेहतरीन समाज अछि। हम सब अपन मूल स्थान सँ उखड़ि गेलाक बाद आइ एकरा लोकनिक समाज मे रहि रहल छी। एहि समाज मे हमरा सभक कतेक आदर भऽ रहल अछि। अपन गाम-समाज मे लोक केकरो पुछितो तक नहि अछि, राय-सलाह आ मशवरा सब उठि गेल। लेकिन, एकरा लोकनिक समाज मे हमरा सन-सन लोक केर कतेक इज्जत आ प्रतिष्ठा भेटैछ तेकर उदाहरण अपने लोकनि देखिये रहल छी। आइ अहाँ सभक नजरि मे हमर कतेक मूल्य अछि से नहि जानि, मुदा ओकरा सभक बीच ओ सब अपन माथक पाग हमरा पहिराकय कोरा मे उठा आसमान छुआ दैत अछि।….”
 
एक वृद्ध लोक गाम सँ आयल छलाह, ओ हिनकर बाजबाक सुर आ ताल केँ पकड़ि लेलनि। हुनका कि फुरेलनि नहि फुरेलनि, ओ तमतमा कय उठैत दर्शक दीर्घा सँ बाजि उठलाह –
 
“हौ फल्लाँ! ऐँ हौ, तोहर बाप-बाबा-पुरुखा सब सम्माननीय छलाह। तोरो जन्म भगवान ओहि परिवार मे देलखुन आर ई तोरा याद रखबाक चाही जे एतुका लोक तोरा जे सम्मान दैत छथुन से तोहर संस्कार तेहेन छह ताहि कारण सँ। तूँ जे आइ एहि समारोह मे मिथिलाक लोक पर एहि तरहें अर्र-दर्र बजने जा रहल छह, तोहर बजबाक शैली मे जे अपन मौलिक पहिचान प्रति पचास गो शिकायत आ कि हारल लोक सनक मानसिकता अभैर रहल छह से तूँ बिसैर गेलह जे तोरो मे वैह मौलिक संस्कार – वैह मिथिलाक लोकक रीत-रेबाज आ परम्परा-मान्यताक प्रभाव छह जे आइ प्रवासक एहि स्थान पर आनो-आनो समाज मे तोहर नामक दीप जरैत अछि। तेकर माने तूँ आब बड बेसी होशियार भऽ गेलह आ तोहर मूल संस्कार मे ब्याधि लागि गेल से बात नहि छैक। देखह, दुनिया सब दिन एहिना दोसर केँ देखि अपना केँ दूसैत रहल अछि। लेकिन दोसराक अस्तित्व हमरा-तोरा सँ बेसी मजगूत आइ धरि नहि भऽ सकल से सोचलहक कहियो? आइयो ओ सब तोरा जेहेन व्यक्तिक गुण केँ मान-सम्मान दैत छह। ओकरा तोहर जरूरत छैक। तैँ, अपन लोकक सोझाँ एतेक नकारात्मकता आ नैराश्यता प्रसार करबाक तोरा कोनो अधिकार नहि। चुपचाप बैस जाह। अपन सीट धऽ लैह। तोरा कारण समाज मे नैराश्यता आबि रहल अछि। जँ मर्जी हुअ तऽ तोँ अपन समाज छोड़ि आगाँ दोसरहि केर समाज मे अपन रक्त सम्बन्ध बना सकैत छह। हमर मिथिला जेहेन अछि तेहेन मे नीक। हँ, अधलाह केँ अपन व्यवहार मे परिवर्तन आनिकय सुधार करबाक चाही।”
 
एहि बुजुर्गक बात सुनिकय ओ सज्जन तऽ चुप हेबे केलाह, सभागार मे थोपड़ी धरि गरगराकय बाजय लागल। नैराश्यता आ नकारात्मकता केँ मिथिला समाज बहुत काल धरि माथ नहि चढा सकैत अछि।
 
बाकी अहाँ पर एकर प्रभाव कि पड़ल, से अहाँ कमेन्ट बौक्स मे लिखू!! 🙂
 
हरिः हरः!!