विद्यापति समारोह सँ मैथिलीभाषी मे नव क्रान्तिक संचार

विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

अपन ठेकाने नहि आ सूरदास केर घटकैती!

स्वयं केर योगदान बिना कएने हमरा ई अधिकार के देलक जे हम समाज मे प्रचलित व्यवहार पर सवाल ठाढ करब? सन्दर्भ उठबैत छी विद्यापति स्मृति पर्व समारोहक आयोजन सँ प्रवासक क्षेत्र पर मैथिल जनसमुदाय केँ जोड़बाक आधुनिक आयोजन पर व्यर्थक टीका-टिप्पणी कयनिहार छूछ आलोचक लोकनिक।

विद्यापति स्मृति समारोह पर विद्वान् डा. हेतुकर झा

कन्सेप्ट पब्लिशिंग कंपनी – दिल्ली द्वारा प्रकाशित सच्चिदानंद व ए. के. लाल केर सम्पादित पोथी ‘एलिट एन्ड डेवलपमेन्ट’ हुनका लोकनि केँ निश्चित पढक चाही जे मैथिली भाषा आ मिथिला लिपि केर हेरा जेबाक चिन्ता करैत छथि। एहि पोथी मे डा. हेतुकर झा केर लिखल एकटा सुन्दर आलेख ‘एलिट-मास कन्ट्राडिक्सन’ मे हमरा लोकनि सब बात केँ एकटा महाविद्वान् व्यक्तिक सूक्ष्म मीमांसा सहितक वर्णन पढि सकैत छी। एकर प्रिव्यु एहि लिंक पर पढय लेल भेटैत अछिः

https://books.google.com.np/books?id=VjKcfqnwZtwC&printsec=frontcover#v=onepage&q&f=false

एतबा नहि, विद्यापति कविकोकिल जखन बंगला-हिन्दी आदिक कवि नहि रहि ‘मैथिली कविकोकिल’ बनि गेलाह, विश्व परिवेश मे हुनकर लेखनी आ हस्तलेख आदि सँ ई सिद्ध भऽ गेल छल – ताहि उपरान्त १९२० ई. सँ कोना एलिट्स वर्गक वैह ब्राह्मण-कायस्थक अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त युवा सब अपन मिथिलाक समस्त जनमानसक मातृभाषा मैथिली लेल काज करब शुरू केलक, कोन तरहें विद्यापतिक तस्वीर सँ जादू होयब आरम्भ भेल, मैथिली भाषा मे लेखनीक क्रान्ति आयब आरम्भ भेल, एहि भ्रम केँ चीरय मे ओ सब सफल भेलाह जे मैथिली मे पढब-लिखब प्रतिष्ठा केँ दाँव पर लगायब नहि वरन् महाकवि कोकिल केर ओ नारा ‘देसल बयना सब जन मिठ्ठा’ केर क्रान्ति आनब होयत। आर, एक बेर फेर २००३ मे भारतीय संविधानक आठम अनुसूची मे मान्यता भेटलाक बाद ई क्रान्ति आगाँ बढब शुरू केलक।

मैथिली लेखनी मे नव‍‍-वर्तमान केँ स्वर्ण युग कहि सकैत छी

मैथिली लेखनी मे २००७-०८ सँ सामाजिक संजाल यथा ओर्कुट, फेसबुक आदिक आगमन सँ पुनः नया क्रान्ति हमरा देखाएत अछि। हम स्वयं पहिने अंग्रेजी लेखनीक दीवाना लोक रही, ओर्कुट पर एकटा प्रसिद्ध स्पिरिच्युअल कम्युनिटी ‘धर्म मार्ग’ केर स्थापना आर ताहि मे लगभग ३०० अत्यन्त प्रबुद्ध आ सक्रिय आध्यात्मिक सदस्य लोकनिक सङ्गोर केर युग याद अबैत अछि। ताहि समय मैथिली लेखनीक अनेकों कम्युनिटी मे सदस्य रहि थोड़-बहुत लेखनी आरम्भ कयलहुँ। आर तदोपरान्त अपन मातृभाषाक चुम्बकत्व तेना आकर्षित कयलक जे ओर्कुट सँ फेसबुक पर २००९ मे प्रवेशोपरान्त २०१० सँ नहि सिर्फ लेखनी मे रुचि जागि गेल बल्कि जमीन पर सुसुप्त अपन लोक-समाज केँ सेहो जगेबाक लेल विद्यापति स्मृति हमर बाल्यावस्था मे श्रेष्ठजन द्वारा आयोजन सँ सुनल-सीखल कला मार्फत अपन मिथिला समाजक लोक केँ भाषा-संस्कृति संग जोड़बा मे पर्यन्त जुड़ाव बनि गेल। २०१० सँ आइ २०१८ केर लगभग ५ मास पूरा होएत भारत, नेपाल वा विश्वक कोनो एहेन स्थान नहि बचल देखैत छी जतय अपन मैथिली-मिथिला अभियानक १० गोट समर्थक नहि होएथ।

विद्यापति समारोह पर सवाल केनिहार के?

एखन धरि किछु लोक केँ विद्यापति पर्व पर सवाल ठाढ करैत देखैत छी त हमरा छगुनता होएत अछि। सच कही त एहि पर्व सँ ओहने लोक केँ जरैत देखैत छी जे स्वयं कोनो आयोजन, कोनो छोटो प्रयास अपन भाषा-संस्कृति-सभ्यता लेल नहि करत, उल्टा हिन्दी मे लिखत-पढत आ अपनहि घरक कमी-कमजोरी केँ सरेआम बाजार मे लीलामी करबैत जगहँसारत करबैत रहत। एहने एकटा भटकल युवा जे भारतीय जनता पार्टी मे बड़का नेता बनबाक सपना रखैत अछि तेकरा देखलहुँ जे एहने कुकाठी प्रश्न हिन्दी मे कय केँ मटरगस्ती कय रहल छल। एकरा सब केँ हम यथार्थतः नपूंसक मानैत छी, कारण एहेन बेटा सँ पोता कहियो भेटत। ओकरा नपूंसक शब्द जखन अमर्यादित बुझेलैक त पुनः बुझबैत एतबे टा कहलः

“कथी के अमर्यादित? अहाँ केँ विद्यापति आ मैथिल केर समुदायिक हित केर कार्य पर एना सरेआम गुंहाँगिज्जी जँ नीक लागि सकैत अछि बौआ, त अहाँ लोकनिक नपूंसकता पर कियो सवाल ठाढ करय त अमर्यादित भऽ गेलैक?

अहाँ ई बताउ जे अपन मातृभूमि, मातृभाषा, मातृसंस्कृति, मातृसभ्यता, मातृपहिचान आ मातृवैशिष्ट्य लेल कि सब करैत छी – वा कि सब कय सकलहुँ? कहियो सोचबो करैत छियैक?

हिन्दी मे अहाँ मैथिल समुदायक काज केर जगहँसाई करब आ अहाँ सब भाजपाक तरबा चाटनिहार दिल्ली मे नेतागिरीक दिवास्वप्न देखनिहार केँ मैथिल समुदाय केर हित लेल दिन-राति एक कय केँ चिन्तन कयनिहार खुलेआम छोड़ि दियए? कि विचार!”

हरिः हरः!!