मैथिली पर पटना उच्च न्यायालयक ओ ऐतिहासिक फैसला, सरकारक बदनियत पर कठोर टिप्पणी

विशेष संपादकीय

फोटो साभारः पटना डेली डट कम

बिहार मे भाषा-राजनीति केर बड पैघ इतिहास भेटैत अछि। मैथिली भाषा जे कि बिहार केर विरासत थिक ताहि पर बदनियतपूर्ण ढंग सँ कतेको तरहक कूतर्की निर्णयक जँ सूची बनायल जायत त एकटा महाग्रन्थ तैयार भऽ सकैत अछि। अफसोस जे मैथिली लेखन मे निपुण कतेको सर्जक आन-आन विषय पर लेखनी करैत छथि, मुदा मैथिली भाषा पर राज्य द्वारा दमन आ विद्वेष भाव केर कुठाराघात पर किनको ध्यान जा सकल तेहेन पोथी हमरा नजरि मे नहि पहुँचि सकल अछि। एहि लेखक माध्यम सँ एक बेर फेर अपील करब जे ब्रिटिशकालीन भारतीय शासन सँ लैत स्वतंत्र भारत मे मैथिली भाषा पर कयल गेल उपद्रवी षड्यन्त्र सभक कियो गोटा सिलसिलेवार ढंग सँ शोध-आलेख लिखने होएथ त एक बेर जरूर प्रतिक्रिया खाना मे सूचना उपलब्ध करायब।

कथित समाजवाद आ सामाजिक न्याय केर प्रखर चिन्तक – लोहियावाद आ जेपीवाद केर कलियुगी पोषक जखन बिहार मे १९८९-९० मे सत्ता परिवर्तन कय पटनाक सत्ता पर आसीन होएत अछि त कोना एकटा राकेश कुमार द्वारा बिहारक १९९०‍-९१ केर जनगणना केँ आधार पर मैथिलीभाषीक संख्या बिहारक दोसर भाषा सँ कम रहबाक बात केँ आधार बनाकय भोजपुरी लेल अधिकारक मांग करैत अछि, कोना मैथिली केँ हँटेबाक एकटा पूर्वाधार बनाकय आखिरकार बिहार सरकार द्वारा निदेश (सरकारी निर्णय) जारी करैत मैथिली केँ ऐच्छिक विषयक सूची सँ बिपीएससी सँ हँटायल जाएत छैक आर फेर कोना कुल ८ वर्ष बाद बिहार सरकारक एहि निर्णय पर सम्माननीय पटना उच्च न्यायालय द्वारा सरकार केँ फटकार आ राजनैतिक खेल नहि खेलेबाक अनेकों कठोर टिप्पणी संग संविधानक विभिन्न अनुच्छेद आ संवैधानिक भावना ओ मर्यादाक पाठ सिखबैत अन्ततोगत्वा सरकार निदेश केँ खारिज करैत अछि – ताहि समस्त बातक जनतब निम्न आदेशक प्रतिलिपि मे भेटैत अछि।

वर्तमान समय एहि आलेख केँ सिर्फ एहि वास्ते सोझाँ आनल जे नेपालक संघीय सरकार आ प्रदेश सरकार लेल ई एकटा नजिर केर काज करय। हालहि संपन्न एकटा मैथिली भाषा-साहित्य तथा मिथिला जीवन-सृजनक कार्यक्रम मे किछु क्षुद्र टीका-टिप्पणी आ जानि-बुझिकय मैथिली भाषा केँ मानकीकरण ओ प्रयोगक आधार अत्यन्त न्युन लोक द्वारा आदि बात कहैत ‘अल्पसंख्यक उच्चवर्गीय समुदाय’ केर भाषा सिद्ध करबाक कुत्सित प्रयास होयबाक स्थिति मे ई आलेख उचित प्रकाश पसारत से अपेक्षा राखल जा रहल अछि। नेपाल मे पूर्वक शासन-प्रशासन द्वारा एकल भाषानीतिक कारण नेपाली बाहेक दोसर सर्वाधिक बाजल जायवला भाषा मैथिली मे पठन-पाठन तकक व्यवस्था सुचारू नहि करबाक स्थिति मे पूर्व राष्ट्रपति डा. रामबरण यादव, नेपाली काँग्रेसक वरिष्ठ नेता प्रदीप गिरि, नेपाल कम्युनिष्ट पार्टीक नेता रामचन्द्र झा, आदिक संबोधन सँ मैथिली भाषा जनसामान्यक भाषा नहि बनि सकबाक बात कहलनि ई स्वयं मे एकटा विद्वेषपूर्ण राजनैतिक स्थितिक परिचायक थिकैक। हिनका लोकनि संग समस्त मैथिलीभाषी केँ सतर्क रहबाक बेर अछि जे आगामी समय मे भाषा आयोग जेकर अध्यक्षता डा. लबदेव अवस्थी कय रहला अछि ओतहुओ किछु एहि तरहक षड्यन्त्र नहि भऽ जाय आर देशक विरासत मैथिली कतहु जानि-बुझि कतिया नहि देल जाय। जखन मैथिली भाषाक पृष्ठभूमि सँ आयल राजनीतिक विचारधाराक पोषक लोकनि मैथिली मंच पर आबिकय नेपाली आलेख पठन करथि त स्थिति कतेक भयावह छैक ई सब बुझि सकैत छी।

प्रस्तुत अछि बिहारी शासन द्वारा मैथिली प्रति विद्वेषपूर्ण हमला पर पटना उच्च न्यायालयक ऐतिहासिक आदेशः

मैथिली भाषा पर उच्च न्यायालय पटना केर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण निर्णय

प्रस्तुत रिट केर विषय मैथिली-भाषा केँ हँटायल जेबाक थिक। एहि रिट याचिका मे शिकायत कयल गेल अछि जे जखन एक बेर मैथिली भाषा केँ बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित परीक्षा मे विषयक रूप मे सम्मिलित कय लेल गेल छल, तखन एहि भाषा केँ हँटेनाय असंवैधानिक, गैरकानूनी एवं मनमाना कार्य थिक। दुर्भाग्यवश, एकर प्रमुख कारण एक दोसर रिट याचिका छल जे कि प्रस्तुत रिट याचिका सँ संबद्ध छल।

मैथिली विषय केँ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित परीक्षा सँ भाषाक रूप मे हँटायल जेबाक कारण उत्पन्न विवाद केर अभिलेख पर उपस्थापित पत्रक द्वारा, सबसँ नीक जेकाँ बुझल जा सकैत अछि। राज्य सरकारक ई आदेश स्वयं तथ्य सभ केँ अभिलेख पर उपस्थापित करैत अछि आर शासकीय आदेश केर वाद-विषय एहि तरहें प्रकट होएत अछि –

“निदेशानुसार उपर्युक्त विषय पर कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग केर पत्रांक १५८४२ दिनांक २६।०८।१९७२ द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा मे ‘मैथिली भाषा’ केँ ऐच्छिक भाषाक रूप मे सम्मिलित करबाक स्वीकृति प्रदान कयल गेल छल। जेकर विरुद्ध पटना उच्च न्यायालय मे एकटा याचिका श्री राकेश कुमार एवं अन्य बनाम सरकार दाखिल कयल गेल अछि जाहि मे कहल गेल अछि कि १९९०-९१ केर जनगणना अनुसार बिहार मे भोजपुरी, आदिवासी एवं मगही भाषा-भाषी केर तुलना मे मैथिली भाषा-भाषीक संख्या कम अछि। अतएव भोजपुरी, आदिवासी, मगही भाषा एवं साहित्य केँ छोड़िकय आयोग केर परीक्षा मे मैथिली केँ ऐच्छिक भाषा केर रूप मे राखब न्यायोचित नहि अछि।

राज्य सरकार द्वारा एहि मामिला मे पूर्णरूपेण विचार कयलाक बादे निर्णय कयल गेल अछि जे बिहार असैनिक सेवा (भर्ती) नियमावली, १९५१ केर नियम १५ केर अन्तर्गत अनुसूची-डी मे सम्मिलित मैथिली भाषा एवं साहित्य केँ ऐच्छिक विषय केर रूप सँ हँटा देल जाय।

शासकीय आदेश दिनांकित २६ फरवरी १९९२ सँ ई स्पष्ट अछि आर अभिलेख पर सेहो जे उच्च न्यायालय मे एकटा वाद (१९९१) केर सी.डब्ल्यू.जे.सी. संख्या ६५८२ (राकेश कुमार बनाम बिहार सरकार एवं अन्य) केर लंबित रहबाक कारण मैथिली भाषा केँ परीक्षा पाठ्यक्रम सँ विषय केर रूप मे हँटायल गेल। स्पष्टतया सरकार केँ या त उच्च न्यायालय केर निर्णयक इंतजार करबाक चाहैत छल या मामिला केँ यथावत छोड़ि देबाक चाहैत छल। मात्र एकटा मामिला केर उच्च न्यायालय मे लम्बित रहबाक कारण राज्य सरकार द्वारा मैथिली भाषा केँ बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित परीक्षाक विषय सँ हँटायल गेनाय सहज कारण नहि मानल जा सकैत अछि – ई एक राजनैतिक चाइल छल।

प्रत्यर्थीक रूप मे राज्य सरकार द्वारा जे प्रतिशपथ-पत्र दाखिल कयल गेल अछि ओ गैर-जिम्मेदाराना अछि। ई प्रतिशपथ-पत्र एक प्रशाखा पदाधिकारी द्वारा दाखिल कयल गेल अछि जे कि एक लिपिक केर श्रेणीक अछि जेकरा सरकार केर नीति सभक सम्बन्ध मे टीका-टिप्पणी करबाक लेल न्यायालय जिम्मेदार व्यक्ति नहि मानैत अछि। स्पष्टतया सरकार केर सचिव स्तरक पदाधिकारी केँ प्रतिशपथ-पत्र दाखिल करबाक चाहैत छल लेकिन याचिकाक उत्तर देबाक लेल प्रशाखा पदाधिकारी केँ अधिकृत कय राज्य सरकार द्वारा अपन दायित्व केँ टालि देल गेल अछि। प्रतिशपथ-पत्र मे पहिने ई स्वीकार कयल गेल अछि जे परीक्षा मे मैथिली भाषा एक ऐच्छिक विषय छल आर मंत्रिमंडल केर निर्णयक बाद यानि परिषद केर सहमति सँ, एकरा बिहार लोक सेवा आयोग केर पाठ्यक्रम मे सम्मिलित कयल गेल छल। एहि तरहें ई स्पष्ट होएत अछि जे कि मैथिली केँ विषय केर रूप मे वैध रूप सँ पाठ्यक्रम मे सम्मिलित कयल गेल छल।

ओ कोन निर्णय छल जेकरा द्वारा मैथिली केँ ऐच्छिक विषयक रूप मे सरकार द्वारा प्रतिपादित नीतिक अनुसार लोक सेवा परीक्षा मे शामिल कयल गेल छल आर तदुपरान्त ओकरा हँटा देल गेल अछि, एहि विषयक सम्बन्ध मे सच्चाई केर पता लगेबाक लेल उच्च न्यायालय मूल अभिलेख केर मांग केलक। १८ सितम्बर, २००० केँ महाधिवक्ता एहि पर निर्णय पर ई कहैत स्थगन लेने छलाह जे ओ विषय-वस्तुक गहिंराई मे जेबाक लेल सम्पूर्ण अभिलेखक जांच करय चाहैत छथि, ओहि दिन ओ कहलथि जे अभिलेख हुनका उपलब्ध नहि करायल गेल।

ई आश्चर्यजनक बात छल कि शासकीय अभिलेख विद्वान् महाधिवक्ता तक केँ पर्यन्त उपलब्ध नहि करायल गेल छल। विद्वान् महाधिवक्ता २५ सितम्बर २००० केँ न्यायालय केर सोझाँ कहलनि जे अभिलेख गलत जगह पर राखल गेल छल तथा ओकरा ताकल नहि जा सकल अछि तथा एहि आधार पर ओ स्थगन चाहि रहल छलाह जेकरा मंजूर कयल गेल। २५ अक्टुबर २००० केँ सरकारी अधिवक्ता द्वारा ई बयान देल गेल कि गुम भेल अभिलेखक खोज जारी अछि। गुम भेल अभिलेखक बात न्यायालयक मामिला मे या तऽ हल्लुक ढंग सँ लेल गेल या सरकारक कियो व्यक्ति चाहैत छल कि ई अभिलेख न्यायालयक नजरि धरि नहि पहुँचय। एहेन लागि रहल अछि जे राज्य सरकार एहि तथ्य केँ बुझय मे चूक केलक अछि कि जखन उच्च न्यायालय उत्प्रेषण (Certiorari) जारी केने हो तखन सरकारक समक्ष अभिलेख प्रस्तुत करबाक सिवाय आर कोनो विकल्प नहि रहि जाएत छैक। कानूनी तौर पर विशेषाधिकार केर दावा करब मात्र एकटा बचाव अछि तथा विशेषाधिकार केर दावा सेहो एतेक हल्लूक तरीका सँ नहि कयल जा सकैत अछि। अतः २५ अक्टुबर २००० केँ उच्च न्यायालय आदेश देलक जे गुम भेल अभिलेख केर ओ मामिला उच्च न्यायालयक सोझाँ शपथ पत्र दाखिल कय प्रस्तुत कयल जाय तथा ३० अक्टुबर २००० केँ विशेष सचिव, कार्मिक तथा प्रशासनिक सुधार विभाग, बिहार सरकार द्वारा ई औपचारिक बयान दैत शपत पत्र दाखिल कयल गेल जे मैथिली भाषा एवं साहित्य केँ सम्मिलित कयल जेबाक सम्बन्धी प्रशासकीय अभिलेख केँ तमाम प्रयासक बावजूद ताकल नहि जा सकल अछि। न्यायालय केँ बतायल गेल जे तकबाक काज एखनहुँ चलिये रहल छैक। ई स्पष्टीकरण आश्चर्यजनक अछि कि जहिया मैथिली भाषा एवं साहित्य केँ ऐच्छिक विषय सँ निकालबाक प्रश्न छलैक तहिया ओ अभिलेख उपलब्ध छलैक मुदा जखन ई मामिला न्यायालय मे लम्बित छैक तखन ओ अभिलेख उपलब्ध नहि छैक।

भाषाक रूप मे मैथिलीक उत्पत्ति पुरान अछि। आवेदक (प्रथम रिट याचिका मे) केर इच्छा जे ओहि विशेष वर्षक प्रतियोगिता परीक्षा अर्थात् ३६म संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा, १९९० केर पाठ्यक्रम मे भोजपुरी भाषा केँ एक विषय केर रूप मे सम्मिलित कयल जाय, सरकार केर लेल विचारक मुद्दा भऽ सकैत छैक। एखन ई अभिलेख पर अछि जे राकेश कुमार द्वारा दायर कयल गेल पूर्वक याचिका मैथिली भाषा केँ बिहार लोक सेवा आयोग केर पाठ्यक्रम सँ निकालल जेबाक कारण बनल तथा सरकार द्वारा एकरा हँटायल जेबाक आदेशक परिणामस्वरूपे ई प्रस्तुत याचिका दायर कयल गेल अछि।

पूर्व केर याचिका मे न्यायालय केर समक्ष प्रस्तुत तथ्य सँ बेसी तथ्य एहि याचिका मे नहि अछि। २६ फरवरी १९९२ केर शासकीय आदेश मे प्रत्यक्षतः बेसी कारण देल गेल अछि।

शासकीय आदेश सँ ई प्रतीत होएत अछि जे राकेश कुमार द्वारा दायर रिट याचिका केर लंबित रहबाक कारणे राज्य सरकार द्वारा बिहार मे किछु भाषा केर प्रचलन केँ इंगित करबाक लेल सांख्यिकीक प्रयोग कयल गेल। ई अंकगणित एहि तथ्य केँ प्रस्तुत करबाक लेल प्रयोग कयल गेल जे किछु भाषा कम प्रचलन मे अछि। एहि मूल्यांकन केर लेल जनगणनाक आंकड़ाक सेहो प्रयोग कयल गेल। एहि तरहें बिहार सरकार मैथिलीक अप्रचलन केर वास्ते तर्कसंगत व्याख्या देलक। ई घातक खेल थिक। अनुभव देखबैत अछि जे प्राचीन उच्च भाषा उच्चतर शैक्षिक अथवा व्यक्ति जे एहि भाषा केँ पढय आर एकरा आगाँ बढेबाक धुन रखैत छथि, तिनका बुनियादी तौर पर पाछाँ धकेल देलक अछि। जेना संस्कृत, फारसी, लैटिन, ग्रीक, पाली तथा मन्डारिन केर नाम उल्लेखनीय अछि। सूची बड लंबा नहि अछि। एहि मे सँ किछु भाषा प्रत्यक्षतः अप्रचलन सँ प्रचलन मे सेहो आयल अछि तथा एक जीवंत भाषाक रूप मे ओकरा पुनर्जीवित कयल गेल छैक – जेना कि हिब्रू। एकर पुनर्जीवन इजरायल राज्य केर सृजनक प्रत्यक्ष परिणाम छल।

भाषाई समानता इतिहास केर विशिष्टता नहि थिक। परम्परानुसार, भाषा एक सभ्यताक संग जीवित रहैत अछि तथा ओकरा संगहि समाप्त भऽ जाएत अछि। भाषा संरक्षण मे उन्नति करैत अछि तथा एकर अभाव मे अप्रचलन दिस लौटि जाएत अछि। कोनो भाषाक प्रति विद्वेष ओहि राज्य केर अंत साबित होयत। कोनो भाषाक प्रति राज्यक विद्वेष ओहि व्यक्तिक प्रति विद्वेष थिक जे एकर व्यवहार करैत अछि। एहि तरहें एक प्रमुख भाषाक पृष्ठभूमि मे लौटि सकैत अछि।

राज्य सरकार ऐच्छिक विषयक रूप मे भाषाक चुनाव करबाक लेल आन एहेन भाषाक अनुमति देलक अछि जे कि भाषाक रूप मे बेसी लोकप्रिय आ प्रचलित नहि अछि। एहि मे अंग्रेजी, संस्कृत, फारसी, अरबी, पाली तथा बंगला भाषा सब अछि। मैथिली केँ हँटायल जेबाक कार्यवाही सेहो बिहार केर जनताक बीच सामंजस्य मे बाधा उत्पन्न करैत अछि। ई मैथिलीक गरिमा केँ कम करबाक संदेश दैत अछि।

भारत केर संविधान मे भाषा विषयक उल्लेख अछि। भाग XVII मे राजभाषाक उल्लेख अछि। एहि भाग मे चारि अध्याय छैक। अध्याय I मे संघ केर भाषा, अध्याय II मे क्षेत्रीय भाषा, अध्याय III मे सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय इत्यादिक भाषा आ अध्याय IV मे विशेष निदेश सभक उल्लेख अछि। मुदा ४२म संविधान संशोधन १९७७ मे आन भाषा सभ केँ सेहो आदर आ सम्मान देबाक उल्लेख अछि। ई उल्लेख भाग II केर मौलिक कर्तव्य शीर्षकक अन्तर्गत कयल गेल छैक। एहि भाग मे केवल एक्के टा अनुच्छेद ५१ क छैक। एहि प्रसंग मे कहल गेलैक अछि – ५१ (क) मूल कर्तव्य – भारतक प्रत्येक नागरिक केर ई कर्तव्य होयत कि ओ –

क…..
ख…..
ग….
घ….
ङ. भारतक सब लोक मे समरसता आर समाज भ्रातृत्वक भावना केर निर्माण करी जे धर्म, भाषा आर प्रदेश या वर्ग पर आधारित सब भेदभाव सँ दूर हो, एहेन प्रथा सभक त्याग करी जे स्त्री लोकनिक सम्मानक विरुद्ध छैक,
च. हमरा लोकनिक सामासिक संस्कृतिक गौरवशाली परम्पराक महत्व बुझी आर ओकर परिरक्षण करी।
छ…..
ज……
झ….
ञ….

तेकरा बाद अक्सरहाँ अदृष्टिगत, संविधानक प्रस्तावनाक उद्घोषणा अछि। भारतक संविधान गणतंत्रक समस्त नागरिक केर विचार व अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता तथा अवसर केर समानता केँ सुनिश्चित करैत अछि। प्रस्तावना मे उल्लेखित “भ्रातृत्व” एतय निरर्थक आर खोखला नहि अछि बल्कि ई व्यक्तिक सम्मान केँ सुनिश्चित करबाक आश्वासन सेहो दैत अछि। वैयक्तिक अभिव्यक्ति, समानता, अवसर एवं प्रतिष्ठा क्रमशः संस्कृति, विरासत, शिक्षा एवं सभ्यताक उपादान थिकैक। भाषा एहि संरचनाक केवल एकटा हिस्सा थिक।

भारतक संविधान मे भाषायी क्षेत्रीय अथवा आंचलिक विविधता सँ दूर, लोकक बीच सामंजस्य एवं आपसी भाईचाराक सम्बन्ध मे उल्लेख अछि। संविधान मे सम्मान करबाक बात कहल गेल अछि जाहि सँ कि हमरा सभक मिश्रित संस्कृतिक समृद्ध विरासतक महत्ता बढय एवं एकर रक्षा कयल जा सकय।

अध्याय II क्षेत्रीय भाषा अनुच्छेद ३४७ केर कोनो राज्यक जनता द्वारा बाजल जायवला भाषा केँ मान्यता देल जेबाक संबंधी आकांक्षाक उल्लेख थिक।

ई सब तथ्य मिलाकय संविधान केर ओहि भावना केँ प्रस्तुत करैत अछि, जाहि मे भारतक लोक केर विविध विरासतक आदर करबाक बात कहल गेल अछि, नहि कि एकर कोनो हिस्साक अनादर करय केर। अगर कोनो राज्य सरकार स्वीकृत मापदण्ड अन्तर्गत कोनो खास क्षेत्रक जनताक हित मे तथा कोनो विशेष समूहक लेल सकारात्मक डेग उठाबय चाहैत अछि तऽ ओ एना कय सकैत अछि। भारतक संविधान वंचित जनसमूहक लेल उठायल गेल सकारात्मक डेग लेल अनुमति प्रदान करैत अछि। संविधान अपकर्मी डेग उठाकय लोकक संस्कृति व विरासत केँ नोक्सान नहि पहुँचबैत अछि। एक क्षेत्रक जनभाषा केँ प्रोत्साहित कयल जा सकैत अछि, लेकिन दोसर क्षेत्रक भाषा केँ नोक्सान नहि पहुँचायल जा सकैत छैक।

भोजपुरी केँ प्रोत्साहन देल जेबाक चाही। लेकिन मैथिली केँ अनादर केर पात्र नहि बनाबक चाही। ओहेन भाषा सभ जे कि प्रयोग मे नहि अछि तथापि ओकरा लोक सेवा परीक्षा मे अनुमति दय देल गेल छैक। फेर मैथिली केँ हँटेबाक बात कियैक? प्रारम्भ मे मैथिली केँ शामिल करबाक लेल प्रोत्साहित कयल गेलैक अछि।

लोक सेवा परीक्षा, जेना बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित परीक्षा मे भाषा केँ एक विषय केर रूप मे चुनबाक मामिला राज्य सरकार द्वारा एक अपवर्ती डेग केर रूप मे नहि उलझायल जेबाक चाही। एहेन डेग एकटा क्षेत्रक लोक केर संस्कृति व विरासत केर निरादन नहि करबाक संविधानक गारंटीक विपरीत अछि।

मैथिली एक प्राचीन भाषा थिक जेकर अपन लिपि अछि आ बाजल जायवला शब्द सभ अछि। ई भाषा सेहो बिहार केर विरासत थिक। भाषाविद् एखनहुँ लिपि एवं स्वर विज्ञान केर गुत्थी सब केँ सुलझेबाक प्रक्रिया मे एहि निष्कर्ष पर पहुँचय मे लागल छथि जे ‘कि मैथिली आधुनिक बंगला भाषा केर अग्रगामी भऽ सकैत अछि?’

ई सबटा विवाद उच्च न्यायालय मे विचाराधीन एकटा मुकदमा केर लाभ लय केँ उत्पन्न कयल गेल अछि। एहि वाद मे भोजपुरी केँ परीक्षा मे एकटा ऐच्छिक विषयक रूप मे शामिल करबाक मांग कयल गेल अछि। संभवतः एहेन कयल जा सकैत छैक। बिहार सरकार द्वारा एहि तरहक सकारात्मक डेग उठायल जा सकैत छैक लेकिन दोसर व्यक्तिक विरासत एवं भाषाक निरादर करबाक लेल उठायल गेल ई अपमानजनक डेग, नीक दिशा मे उठायल गेल डेग केँ उल्लंघन करबाक समान अछि। संविधान सकारात्मक डेग उठेबाक अनुमति प्रदान करैत अछि। लेकिन एक भाषाक माध्यम सँ स्वतंत्र रूप सँ सोचनाय आ व्यक्त करनाय केर अधिकार केँ जेकर गारंटी संविधान दैत अछि, तेकरा नोक्सान पहुँचेबाक इजाजत नहि देल जा सकैत छैक।

एहि परिस्थिति मे दिनांक २१ फरवरी, १९९२ केर सरकारी आदेश केँ अभिखंडित कयल जाएत अछि। पूर्व केर जेकाँ मैथिली भाषा केँ बिहार लोक सेवा आयोग केर पाठ्यक्रम मे शामिल करबाक आदेश राज्य सरकार केँ देल जाएत अछि। अभिलेख सँ ई पूर्णतः स्पष्ट अछि कि मैथिली भाषा हँटेबाक कार्य मुकदमाक मात्र एकटा बहाना बनाकय उच्च न्यायालय केर कान्ह पर बन्दूक राखिकय चलेबाक समान अछि। न्यायालय एकर इजाजत नहि देत। आगाँ जँ सरकार अगर दोसर भाषा केँ शामिल करबाक कोनो निर्णय लेबय चाहैत अछि तऽ से कय सकैत अछि। बशर्ते कि ओ कानून केर परिधि एवं भारतक संविधानक अंतर्गत हो।

परिणामतः याचिका संख्या २२६३, वर्ष १९९२ विनय कुमार मिश्रा बनाम बिहार सरकार सी. डब्ल्यू. जे. सी. संख्या ३३७९ वर्ष १९९२, ३६२४ वर्ष १९९२, ३६६९ वर्ष १९९२, ५१६० वर्ष १९९४ एवं ५१६३ वर्ष १९९४ खर्च सहित स्वीकृत कयल जाएत अछि, सी. डब्ल्यू. जे. सी. संख्या ६५८२ वर्ष १९९१ राकेश कुमार बनाम बिहार सरकार व अन्य केँ खर्चक संग खारिज कयल जाएत अछि।

हस्ताक्षर
रवि एस. धवन, मुख्य न्यायाधीश

हस्ताक्षर
आफताब आलम, न्यायाधीश

पटना उच्च न्यायालय, ३० अक्टुबर, २००० ।

(सौजन्यः मैथिली समाचार, अंक १९ व २०, १३ तथा २७ अक्टुबर, २००१ ।)

स्रोतः जयकान्त मिश्र समज्ञा, मूल-भाषाः हिन्दी, पृष्ठ संख्या – २४० सँ २४५, अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी

हरिः हरः!!