माछ सँ प्रेमक एक अनुपम कथा

प्रसंग चर्चा – मिथिलांग आ माछ

– प्रवीण नारायण चौधरी

शुभे हो शुभे – माछ सँ प्रेम

फोटो साभारः सुधीर सहनी

अपन मिथिलाक विधान केँ यदाकदा अपनहि लोक बड़ा कठिनाह, बोरिंग आ अतिपरंपरावादी, पाखंडी आदि कहैत छैक – नामहि राखि देने छैक ‘मिथिलांग’। बेर-कुबेर कहैत भेटा जायत “बेसी मिथिलांग मे नहि पड़ू’। त कि थिकैक ई मिथिलांग? कतहु यात्रा करब, त दिन आ दिनमानक हिसाबे मात्र जाउ – ई थिकैक मिथिलांग। कोनो शुभ कार्य बिना शुभ मुहुर्त तकौने एकदम नहि करू – ई थिकैक मिथिलांग। भोरे सुति उठि ई करू, एना करू, देव-पितर संग गुरु-सद्गुरु-महापुरुष-माता-पिता आदि केँ एना स्मरण करियौक, प्रणाम करियौन, तखन शुभ दिनक शुभारम्ब करू। मिथिलाक ओ गीत कतेक प्रसिद्ध कतेक उपयोगी छैक जे कोनो शुभ कार्य आरम्भ करयकाल गायल जाएत छैक, “एलय शुभा के लगनमा शुभे हे शुभे”। सच मे वेदान्तर्गत वर्णित हरेक विधान, पूजा-पाठ, देवकर्म, पितरकर्म आदि मे सेहो ‘कार्य शुभ-शुभ सम्पन्न हो’ ताहि लेल अनेकानेक उपाय बतायल गेलैक अछि आर साधक-मुमुक्षु-कर्त्ता आदि सँ पहिने वैह कर्मकांडीय प्रक्रिया करायल जाएत छैक जाहि सँ समस्त वायुमंडल मे ओहि अभीष्ट देव-पितर कर्म केँ पूरा करेबाक लेल प्रकृति दहिन रहथि।

 
आइ, बारी-झारी सँ वापस आबि जखन फेसबुक देवताक दर्शन करय लेल बैसलहुँ त अचानक कोनो नोटिफिकेशन दूतक सन्देश अनुसार आंगूर माउस प्वाइन्टर केँ ओहि दिशा मे जाय लेल बाध्य कय देलक। जखनहि ओ पेज खुजल कि सोझाँ देखैत छी सुधीर सहनी जी अपना हाथ मे जुवायल रोहु माछ धेने कहि रहला अछि जे जिनका सब केँ चाही से आबिकय लय जाउ। मिथिला आ माछ – कि कहू! देवकर्म, पितरकर्म तक बिना माँस-माछ मिथिला मे कम्मे स्थान पर देखल। परिवर्तनक युग मे भले लोक आब देवकर्म लेल छागदान कतहु-कतहु नहि कय मिष्ठान्न आदि समर्पित कय देवता सँ कल जोड़ि विनती करैत अपन ठानल यज्ञ केँ पूरा करय लेल आज्ञा लैत छथि, मुदा पितरकर्म मे आइ धरि बिना माछक पितरकर्म नहि भऽ सकल अछि। कनियो टा गरचुनियो चाहबे करी, बस मछाह तिमन चढेबाक विधान वर्णित देखैत आबि रहल छी। आर, जहाँ धरि रहलैक स्वयं भोग लगेबाक, त ओतय तँ माछक नाम ‘जलपरोर’ आ सांकेतिक भाषा ‘काँट-कुस’ सेहो माछहि केर नाम पड़ि जाएत छैक। बिना माछक तिमन, मिथिलाक लोक रहि जाय सेहो बड़ा नगण्ये देखल। एहेन नहि छैक जे एतय ‘वैष्णव संप्रदाय’ केर लोक नहि छथि, हुनका लेल अलग इन्तजाम हेतनि लेकिन आमवर्ग लेल बिना ‘काँट-कुस’ केर व्यवस्था भोज नहि बनत।
 
कतहु यात्रा कय रहल छी आ ताहि समय माछ, मखान, पान आदिक दर्शन केँ अत्यन्त शुभकारी कहल गेल अछि। नव-नव विवाह भेला पर माछ-दहीक भार साँठल जेबाक परम्परा रहल अछि। वर-पक्ष द्वारा कनियाँ पक्षक ओतय माछक भार बड़ा खास तौर पर साँठल जाएत छैक। चतुर्थी दिनक भोजन सार-बहिनोई संगे करैत आंइठ-कुइठ सेहो एक-दोसराक पात पर फेकैत माछ-भात आ छप्पन प्रकारक भोग लगबैत छथि। सोचू त! विवाहक राति सँ चतुर्थी दिन धरि नून तक वर्ज्य छैक, चतुर्थी दिन विवाहक सिन्दुरदानक अन्तिम प्रक्रिया कहल गेल छैक, ताहि दिन यथार्थतः वर-कनियाँक पहिल मिलन, दुइ अलग शरीर एक-दोसर केँ सौंपि देबाक अत्यन्त विशिष्ट अनुष्ठानक विशेष दिवस होएत छैक आर ताहि दिन एना सार-बहिनोई (नवका जमाय संग सासूरक सारवर्ग, कनियाँ भाइ लोकनि) संगे भोजन करता, माछ वैह बनतैक जे बहिनोई केर गाम सँ भार मे आयल छैक। आब, भरिया नहि भेटैत छैक त कनियाँक गामक बजारे सँ माछ कीनय लेल पाइ बहिनोई पक्ष द्वारा दय देल जाएत छैक। हालांकि ई सब विधान किछु सीमित वर्ग मे मात्र होएत छैक, लेकिन वैदिक रीति अनुरूप जीवनचर्या सम्हारबाक भार सेहो यैह वर्ग पर विशेष रूप सँ रहैत छैक।
 
यैह सब मिथिलांग कहाएत अछि। आब ओ वर्ग अपनो तंग आबि गेल प्रतीत होएछ जिनकर समुदाय मे ई सब विध-विधान सँ चलबाक बात अनिवार्य अछि। कि करब? नौकरी-चाकरी करबाक अछि। घर बाहरे – परदेशे कमाकय चलेबाक अछि। केना जिबैत छी बाहर रहिकय से बात त आत्मा जनैत अछि सभक! कहय छै न! मोन हरखित त गाबी गीत! मोन जखन भीतर सँ प्रसन्न रहत तखन न मिथिलांग सूट करत। व्याकुल जीवन मे कि विध आ कि विधान। आब केकरा पास एतेक समय छैक जे मुड़न, उपनयन, विवाह, कोजगरा, बरसाइत, मधुश्रावणी, द्विरागमन, आदिक फेरा मे समय नाश करत। चाकरी सँ केकरो फुर्सत छैक आब? ऊपरे-ऊपर देखाबटी मे भले हमरा लोकनि आइयो ‘मिथिलांग’ केँ किछु लोक तर्कपूर्ण, वैदिक, विधानसम्मत, वैज्ञानिक आदि किछु कहि दियौक, लेकिन वर्तमान परिस्थिति मे ई सबटा अनविहितक विहित बुझाएत अछि। मिथिलांग ताहि लेल हास्य आ उपहासक दोसराति बनि गेल बुझाएत अछि। लोक खिल्ली उड़बैत छैक जे नियमपूर्वक आइयो चलबाक प्रयास करैत अछि। भोजो खाएत छैक आ हँसियो उड़बैत छैक। ई यथार्थ चेहरा थिकैक अपन समाजक वर्तमान समयक।
 
लेकिन, माछक महिमा महान छैक। फेसबुक पर सेहो लोकक ई आसक्ति ओहिना देखा जायत। गोटे दिन फ्राइड फिश त गोटेक दिन प्योर मिथिला वला झोरायल माछ। कवि लोकनि सेहो एहि माछक प्रति अति-सिनेह केँ रोकि नहि पबैत छथि। एक जमाना मे जँ ‘चोरी भेल चोरी, हमर माछक झोरी’ या ‘माछ-माछ-माछ, माछक महिमा महान्’ हिट गीत भेल त आइ-काल्हि कवि प्रेमेन्द्रक कनियाँ आ सार संग माछक महिमा-गान-काव्य सेहो फेसबुक पर वायरल होएत देखले जाएत अछि। आइये सुधीर सहनी पोखरि पर जलकर (मछ्छर) काल अपना हाथ मे एकटा दू-अढाइ सेरक माछ केँ ठोंठ धेने देखा रहल छलाह त हमरा अपने नहि रहल गेल। एतेक बात एक संग फुरा गेल। ईहो याद आबि गेल जे बच्चा मे बन्सी सँ माछ मारय मे पागल जेकाँ रने-बने छिछियाइत रहैत रही। एक दिन एकटा डेढ किलोक रोहु धेने छल बन्सी मे, नवका नेपलिया घड़ी (इलेक्ट्रीक पिलपिलहावला) केँ पर्यन्त बिना परवाह केने बन्सी मे फँसल आ फेर छुटिकय केँचलीपर चलि गेल माछ केँ पँजियाकय फेरो पकड़य काल बर्बाद कय लेने रही… माछो छुटि गेल आ घड़ियो गेल… लेकिन ओ छल हमर माछ प्रति असह्य प्रेम, ओकर जीवन रक्षाक लेल नहि बल्कि भक्षण लेल छल ओ प्रेम। प्रेम त प्रेमहि होएत छैक। भऽ सकैत छैक कोनो जन्म मे हमरो खेने हो माछ, कारण मनुष्य जन्म त सब जन्म भेलाक बाद भेटल। ओना, डर ईहो होएत अछि जे एना खाय-पीबय के चक्कर मे फेरो कहीं जन्म नहि लेबय पड़ि जाय।
 
तखन सन्तोष ई होएत अछि जे हम मैथिल समुदायक परिचायक धार्मिक झंडा मे सेहो माछहि केर छाप भारतवर्ष मे प्रसिद्ध भेल अछि। राजा-महाराजा लोकनि सेहो अपन राजमोहर मे माछहि केर छाप रखलनि। हव्य-कव्य सब मे माछहि चलैत अछि। आर, सबसँ पैघ बात जे मिथिलाक एक अत्यन्त लुरिगर समुदाय ‘सहनी समाज’ यानि मल्लाह लोकनिक पारम्परिक व्यवसाय थिक माछ पालन। धर्मगुरु कहैत छथि, माछ खायब पाप नहि मुदा माछ मारब पाप थिक। मल्लाह समुदाय केर त घरैया लुरि आ पेशा थिकैक, ओकरा सब केँ वास्ते माछ मारनाय धर्म-कर्म थिकैक। मुदा हमरा लेल ई पाप थिक। तथापि… हाय रे हमर प्रेम…. माछ मारय लेल कन्ठी तक तोड़ि लेने रही… ओह, जनिहऽ हे कमला माय! क्षमा करिहह एहि पाप सब लेल। माछक स्मृति संग अपने पाठक लोकनिक दिन सेहो शुभ हो, यैह शुभकामना। नीक लागय त अपन छोट संस्मरण माछ प्रति ‘प्रेमभाव’ सँ अवश्य राखब। अस्तु!
 
हरिः हरः!!