मनुष्य देहक महत्व – पं. रुद्रधर झाः अत्यन्त मननीय मीमांसा

पंडित रुद्रधर झा केर गूढ तत्त्व समीक्षाक लेख मैथिली जिन्दाबाद पर

स्वाध्याय

मनुष्य देह केर महत्व
 
– पं. रुद्रधर झा (मूल आलेख – हिन्दी, अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी)
 
पंडित रुद्रधर झा केर गूढ तत्त्व समीक्षाक लेख मैथिली जिन्दाबाद पर

संसार मे ८४ लाख योनि अछि जाहि मे २७ लाख वृक्ष आदि स्थावर (अचर) प्राणी केर, २३ लाख कीट-पतङ्ग केर, १७ लाख समुद्र आदि मे स्थित जलचर केर, १३ लाख पशु-पक्षी केर, ३ लाख ९९ हजार ९ सौ ९९ देव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, भूत, प्रेत, पिशाच, जिन एवं रसातल, महातल, पाताल आदि लोक मे स्थित प्राणी सभक योनि अछि। मनुष्य केर केवल १ योनि अछि। एहि ८४ लाख योनि मे प्रत्येक योनिक बहुतो भेद छैक, जेना – एक चुट्टी योनिक अनेकों प्रकार देखय मे अबैत अछि। आर एहि ८४ लाख योनि मे मात्र एक मनुष्य योनि टा कर्म तथा भोग (सुख या दुःख केर साक्षात्कार) केर अछि। एहि सँ इतर अन्य समस्त योनि मात्र भोग केर अछि जाहिमे देव योनिक लोकक दुर्दशा देखू – देव लोकनिक आयु ड्यूटी पर्यन्तक होएत छन्हि – जेना सूर्यक आयु ४ अरब ३२ करोड़ वर्ष केर होएत छन्हि, जाहि मे एक हजार चौयुगी (सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग) बितैत छैक। ई देव अपन कार्यकाल केर भीतर मरियो नहि सकैत छथि, अतः अमर कहाइत छथि। बूढ सेहो नहि भऽ सकैत छथि, अतः निर्जर, सुतियो नहि सकैत छथि अतः अस्वप्न, आर खाइयो नहि सकैत छथि अतः अभोजी कहाइत छथि। वेद मे लिखल छैक जे – ‘न वै देवा अश्नन्ति’। चारि समय मे कार्य रुकैत अछि – १. मरलाक बाद, २. बूढ भेला पर, ३. सुति रहला पर, आर ४. भोजनक समय। अतः एहि चारि १. मरण, २. बुढापा, ३. सुतनाय आ ४. भोजन केर रोक अछि देवता लोकनि लेल। जखन भोग तथा कर्म केर एकमात्र मनुष्य योनिक अतिरिक्त समस्त योनि मे श्रेष्ठतम देवयोनि केर उक्त दुर्दशा अछि, तखन ओहि सँ इतर कोनो भोग योनिक समीक्षा व्यर्थ छैक। गरूड़ पुराण मे भगवान् कृष्ण केर वचन –

 
चतुरशीतिलक्षेषु शरीरेषु शरीरिणाम्।
न मानुषं विनान्यत्र तत्वज्ञानं तु लभ्यते॥१॥
अत्र जन्म सहस्राणां सहस्त्रैरपि कोटिभिः।
कदाचिल्लभते जन्तुर्मानुष्यं पुण्यसंचयात्॥२॥
सोपानभूतं मोक्षस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम्।
यस्तारयतिनात्मानं तस्मात् पा पतरोऽत्रकः॥३॥
नरः प्राप्येतरज्जन्म लब्धा चेन्द्रियसौष्ठवम्।
न वेत्तयात्महितं यस्तु सभवेद्ब्रह्मघातकः॥४॥
 
प्राणी सभक चौरासी लाख (योनिक) शरीर मे मानव शरीर केर बिना अन्य शरीर मे तत्त्वज्ञान (आत्म साक्षात्कार) नहि भेटैत अछि। एहि ठाम (भारतवर्ष मे) हजारों जन्म केर हजारों करोड़ जन्मक बाद कहियोक पुण्य संचय सँ मनुष्य शरीर प्राणी केँ भेटैत छैक। मोक्ष केर सोपान (अन्तिम सीढी) बनल दुर्लभ मानव शरीर पाबिकय जे अपन उद्धार नहि करैछ, ओकरा सँ पैघ पापी एतय के भऽ सकैत अछि। जे मनुष्य (पशु आदि सँ) भिन्न मानव जन्म पाबियोकय इन्द्रिय सुख केँ प्राप्त करैत आत्मकल्याण नहि जनैत अछि, ओ तऽ ब्रह्म हत्यारा होयत।
 
एहि तरहक असाधारण मानव योनिक सर्वश्रेष्ठताक कारण मानव शरीर केर असाधारण तीन कार्य छैक। जाहि मे प्रथम अछि – एक्के परमेश्वर द्वारा रचित चर (जङ्गम) एवं अचर (स्थावर) जीव केर सर्वथा विषमता केँ उपपन्न करबाक जिम्मेदार केर रूप मे अपन विभिन्न कर्म सँ अर्जित पुण्य तथा पाप केँ उपस्थापित करब।
 
‘व्यासो नारायणं स्वयम्’ एहि वचनक अनुसार भगवदवतार व्यासनिर्मित ब्रह्मसूत्र मे द्वितीय ‘जन्माद्यस्य यतः’ एहि सूत्र सँ सूचित परमात्मा मे सब जीव केर उत्पत्ति, स्थिति आर विनष्टिक कारणता केँ सिद्ध करबयवला श्रुति केँ देखू –
 
‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद् विजिज्ञासस्वं,
आनन्दा खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीवन्ति, आनन्दमेव प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।’
 
अर्थात् जाहि सँ ई प्राणी जन्म लैत अछि, उत्पन्न प्राणी जाहि सँ जिबैत अछि, एवं जतय जाएत अछि आ जेकार सँ भेटैत अछि, ओकरा जनबाक इच्छा करू। आनन्दहि सँ ई प्राणी जन्म लैत अछि, उत्पन्न प्राणी आनन्दहि मे जिबैत अछि, आनन्दहि दिशि जाएत अछि आ आनन्दहि सँ भेटैत अछि। ‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’ – ई श्रुति थिक, आनन्द ब्रह्म (व्यापक) अछि, एना जानू।
 
परमेश्वर यदि अपन इच्छा सँ जीव केँ शरीर केर निर्माण करथि तँ – केकरो सुखी आ केकरो दुःखी, केकरो विद्वान आ केकरो मूर्ख, केकरो धनी आ केकरो दरिद्र, केकरो ससन्तान आ केकरो निःसन्तान एवं केकरो निरोग आ केकरो रोगी इत्यादि बनेबाक कारण हुनकहु मे वैषम्य आ निर्दयत्व दोष केँ आयब अनिवार्य भऽ जायत, तखन ‘समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेषोऽस्ति न प्रियः’ – यानि ‘हम सब प्राणी मे सम (भेदभावरहित) छी, हमर नहि कोनो द्वेष अछि आर नहिये प्रिय’ इत्यादि भगवद्गीतादि ग्रन्थ मे कहल भगवानक वचन असत्य भऽ जायत। ताहि लेल परमात्मा मे वैषम्य आ निर्दयत्व दोष केर निवारणार्थ अष्टादश पुराणक रचयिता व्यासजी मे निज निर्मित ब्रह्मसूत्र मे एक सूत्र बनल अछि – “वैषम्यनैघृण्ये न सापेक्षत्वात् तथाहि दर्शयति’ – अर्थात् परमात्मा मे वैषम्य आर निर्दयत्व दोष नहि अबैत अछि, कियैक तँ परमात्मा प्राणीक फलोन्मुख कर्म (प्रारब्ध) अनुसार टा ओकर शरीर, आयु एवं भोग केर व्यवस्था करैत छथि।
 
यैह बातक उपपादन महर्षि पतञ्जलि सेहो स्वरचित ‘योगसूत्र’ नामक ग्रन्थ मे उल्लेखित ‘सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः’ एहि सूत्र सँ करैत छथि। अर्थात् प्राणी केर शरीरादि केर मूल कारण ‘अविद्या’ केर रहलापर फलोन्मुख कर्म समुदायक परिणाम जन्म, आयु तथा भोग होएत छैक। कोनो प्राणीक मृत्यु उपरान्त ओकर जे-जे कर्म (पुण्य तथा पाप) अपन-अपन फल देबाक लेल उपस्थित होएत छैक, ओकरहि अनुसार टा ओ प्राणी केर जन्म, आयु आ भोग केर व्यवस्था चेतन परमात्माक सन्निधान सँ ओहिना होएत छैक जेना चुम्बकक सन्निधान सँ लौह पदार्थ मे स्पन्दन। तैँ प्राणीक विषम परिस्थिति सभक जिम्मेदार ओकर कर्म टा थिक, नहि कि परमात्मा। ताहि लेल परमात्मा मे वैषम्यादि कोनो दोष नहि अबैत छन्हि। ओ कर्म (पुण्य तथा पाप) मनुष्यहि केर विहित तथा निषिद्ध कर्म सँ उत्पन्न भेल रहैत अछि। तैँ प्राणी केर विभिन्न प्रकारक रचना मे परमात्माक सहायक परम्परया मानव शरीर टा होएत आयल अछि।
 
क्रमशः – मानव शरीरक दोसर आ तेसर असाधारण कार्यक विवरण…
 
(पं. रुद्रधर झा केर अनुवादित लेख पढनिहार सँ निवेदन जे हिनक परिचय पूर्व मे देल गेल लेख आदि सँ प्राप्त करी। एक महान् विद्वान् शास्त्रज्ञ आ नव्य न्याय केर ज्ञाता होयबाक संग-संग एक महान् मीमांसक सेहो छलाह। ग्रामः ठाढी, मधबुनी। जीवनकाल – १९२० – १९९० । उपरोक्त लेख ‘गूढ तत्त्व समीक्षा’ नामक पोथी सँ लेल गेल अछि।)
 
हरिः हरः!!