लक्ष्मीजी केँ सदा दहिन आ संग रखबाक एकमात्र अचल उपाय

आध्यात्म

लक्ष्मीजीक स्थिरताक उपाय

(मानस-मर्मज्ञ पं. श्रीरामकिंकरजी उपाध्याय केर विचारपर आधारित)
 
लक्ष्मीजी केर एक नाम चंचला छन्हि। संसार मे कतहु देखब, कोनो घर, कोनो समाज, कोनो जाति या कोनो देश एहेन नहि अछि, जे हर हमेशा धनी बनल रहय, जे निर्धनता कहियो देखनहिये नहि हो। एहेन कोनो व्यक्ति नहि भेटत, जेकरा ओतय लक्ष्मी पीढी-दर-पीढी निवास कएने होथि, जेकरा ओतय कहियो दरिद्रता आयले नहि हो। जतय अथाह धन अछि, ओतय सेहो धीरे-धीरे लक्ष्मीक ह्रास देखल जाइत अछि।
 
तऽ लक्ष्मी बहुत चंचला होइत छथि आर व्यक्ति बेचारा लक्ष्मीजीक चंचलताकेँ रोकबाक लेल कि नहि करैत अछि! ओ बैंक मे धन रखैत अछि, तिजोरी मे मोट-मोट ताला लगाकय रखैत अछि। नहि जानि कतेको उपाय करैत अछि, मुदा लक्ष्मी छथि जे जखन जाय लेल चाहैत छथि, तखन कोनो न कोनो बाट सँ निकैल जाइत छथि। जाहि चंचला लक्ष्मी केँ आइ धरि कियो रोकि नहि सकल, वैह एतय भगवान् केर चरण मे अपन चंचलता केँ त्यागिकय शान्ति सँ बैसल छथि। गोस्वामी तुलसीदासजी लिखैत छथि – ‘देवता जिनकर कृपाकटाक्ष चाहैत छथि, मुदा ओ हुनका दिस तकितो नहि छथिन, वैह लक्ष्मीजी अपन स्वभाव केँ छोड़िकय प्रभुजीक चरणारविन्द मे प्रीति करैत छथिन।”
 
जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।
राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ॥रामचरितमानस ७/२४॥
 
लक्ष्मीजीक सन्दर्भ मे गोस्वामीजी एकटा बहुत बात आरो कहैत छथि। जखन ओ काव्य केर दृष्टि सँ श्रीसीताजीक सौन्दर्यक वर्णन करय लगलाह त हुनका सब उपमा तुच्छ लागय लगलन्हि। कियो सुझाव देलकनि जे गोस्वामीजी अहाँ सीताजीक तुलना लक्ष्मीजी सँ कियैक नहि कय दैत छियन्हि? गोस्वामीजी कहलखिन – भाइ! लक्ष्मीजी मे अवश्य अनेकों गुण छन्हि, मुदा हुनका संग दुइ गोट जबरदस्त दोष जुड़ल छन्हि –
 
बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही॥रामचरितमानस १/२४६/७॥
 
हुनका अपन विष आर वारुणी – एहि दुइ भाइ-बहिन सँ बहुत प्रेम छन्हि। तैँ एहेन लक्ष्मीजी सँ जानकीजी केर केना उपमा भऽ सकैत अछि?
 
तात्पर्य ई भेल जे लक्ष्मीजी जतय जाइत छथि, ओतय एहि दुइ भाइ-बहिन केँ सेहो संग लय जाइत छथि। संसार मे देखलो यैह जाइत अछि। विष केर अर्थ त स्पष्ट अछिये, वारुणीक अर्थ होइत अछि – शराब। जँ केकरो पास धन आबि गेल अछि त ओ मद सँ मतवाला आर बहुते बकवादी बनि जाइत अछि। ओकर बुद्धि उग्र भऽ जाइत छैक तथा ओकर हृदय मे बड़ा भारी दम्भ भऽ जाइत छैक। भला, लक्ष्मीजीक मद केरा टेढ नहि बना दैछ आर प्रभुता केकरा बहिर नहि कय दैछ? फेर विषक स्वभाव छैक मारनाय। जखन व्यक्ति उन्मुक्त होयत, तखन चाहे शराब पीबिकय अपना केँ मारि दियए अथवा अभिमान-अहंकार सँ मतवाला भऽ अपन सर्वनाश कय लियए त कि लक्ष्मीजीक परित्याग कय देल जाय?
 
नहि! एक उपाय करू। स्त्रिगण अपन भाइ-बहिन सँ कहिया धरि प्रेम करैत छथि? जाबध धरि हुनकर विवाह नहि भऽ गेल रहैत छन्हि। विवाह सँ पूर्व ओ अपन भाइ-बहिनक संग रहैत छथि आर विवाह भऽ गेलापर भाइ-बहिन केँ छोड़ि पतिक संग रहय चलि जाइत छथि। अतः जिनकर जीवन मे नारायण सँ विवाहिता लक्ष्मी रहती, ओ विष आर वारुणी केँ छोड़िकय रहती आर जतय मात्र लक्ष्मी रहती, ओतय हुनकर ई दुनू भाइ-बहिन सेहो निश्चिते टा रहत। नारायण टा एहेन छथि जिनकर चरण मे लक्ष्मी अचंचला होएत छथिन।
 
‘लक्ष्मीजी चंचला बनिकय मानू संसार केँ ई बता देली जे देखू, एहि चंचलताक मात्र हमर कमीक रूप मे जुनि देखू, ई त हम अहाँ सब केँ भगवान् दिस जेबाक सन्देश दय रहल छी। जँ हमरा बजायब हम कखनहुँ अहाँ केँ छोड़िकय जा सकैत छी। मात्र नारायण एहेन छथि, जिनकर चरण केँ छोड़िकय हम कहियो नहि जाइत छी। जँ हमरा बजायब त विष आर वारुणीक संग लय केँ आयब, अबैत देरी अहाँ दुःख आर कष्ट देब आर जाइत-जाइत सेहो कनाकय जायब। यदि हमर वास्तविक लाभ उठबय चाहैत छी त भगवान् नारायण केर संग हमरा बजाउ।’
 
(स्रोतः कल्याण, प्रेषकः श्रीअमृतलालजी गुप्ता)
 
हरिः हरः!!