परम शान्तिक उपाय – स्वामी रामसुखदासजी महाराज केर सर्वोत्तम सनेश

स्वाध्याय

– स्वामी रामसुखदासजी महाराज लिखित ‘जीवनक सत्य’ नामक पोथीक अनुवादित अध्याय “परम शान्तिक उपाय” (अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी)

मनुष्य केवल अपन अनुभवक आदर करय तँ ओकर सब काज सफलता पायत। अनुभव कि थिक? अपना पास जे सब चीज भेटल अछि, ओ सब अपन नहि थिक। ई खास बात छी। जे भेटल वस्तु होएत छैक ओ अपन नहि होएत छैक। शरीर, धन, जमीन, वैभव, सम्पत्ति – जे किछु भेटल अछि, ओ अपन नहि छी। एहि बातपर विचार करी। एना मनला सँ ममता मेटा जाइत छैक। ममते टा नहि, अहंता सेहो मेटा जाइत छैक। एहि शरीर केँ भगवान् –

‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रम्’ (गीता १३/१)

इदम् (ई) कहलनि अछि। जे ‘ई’ होएत अछि ओ ‘हम’ नहि होएत अछि आर जे ‘हम’ होएत अछि से ‘ई’ नहि होएत अछि। ‘इदं शरीरम्’ कहिकय आगू शरीरक विवेचना करैत छथि –

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।

इन्द्रियाणि दर्शकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥ (गीता १३/५)

पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, इन्द्रिय तथा मन-प्रकृति सहित सब ‘इदं शरीरम्’ केर अन्तर्गत अछि। अतः ई शरीर ‘हम’ नहि छी – एहि बात केँ दृढतापूर्वक बुझि ली।

फेर प्रश्न उठैत छैक जे – कि ई शरीर हमर छी? अहाँ एहि शरीर केँ जतेक आर जेना चाहब राखि सकैत छी कि? एहिमे जे परिवर्तन चाहब से कय सकैत छी कि? वृद्धावस्था केँ रोकि सकैत छी कि? एकरा मृत्यु सँ बचा सकैत छी कि? जँ ई अहाँक हाथक बात नहि तँ फेर ई शरीर अहाँक कोना? तैँ ममता आर अहंकार केँ जीविते जान छोड़ि दी।

‘निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति।’ (गीता २/७१)

एहि तरहें शान्ति केँ प्राप्त भऽ जाएब। अहंता-ममता केँ नहि छोड़ब, तैयो ई त छूटबे टा करत। ई ‘हम’पना आ ‘हमर’पना नहि रहि जायत। मुदा अहाँ जँ अपने एकरा नहि छोड़ब त अशान्ति, दुःख, संताप आर जलन होएत रहत। एहि शरीर सँ कयल गेल पाप आ पुण्यक फल भोगबाक लेल अनेक जन्म लेबय पड़त। ताहि लेल जँ अहाँ ई स्वीकार कय ली जे शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा अहम् हमर नहि छी तऽ एकरा द्वारा कयल गेल क्रिया सेहो हमर नहि होयत। एहि बातकेँ गीता एना कहलक अछि –

‘गुणा गुणेषु वर्तन्त’ (गीता ३/२८) – अर्थात् गुणे गुण धारण करैत अछि। 

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ (गीता ३/२७)

वास्तव मे सब कर्म प्रकृतिक गुण द्वारा कयल जाइत छैक। मुदा अहंकार सँ मोहित अन्तःकरणवला पुरुष (अज्ञानी) ‘हम कर्ता छी’ एना मानि लैत अछि। तखन कि कएल जाय?

करबाक चाही जे ‘नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत’ – एना मानि लेनाय जे किछु नहि करैत छी, कियैक तँ हम जानयवला छी आर ई सब जानय मे आबयवला थिक। तखन एकरा सँ होयवला क्रिया आदि हमर केना भेल?

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।

यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥ (गीता १३/२९)

जे ई जनैत अछि कि क्रिया केवल प्रकृतिक द्वारा होइत अछि, ओ अपना केँ अकर्ता देखैत अछि। आर जखन अपना केँ अकर्ता देखैत अछि तखन –

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।

हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥ (गीता १८/१७)

ओ सब लोक केँ मारियोकय वास्तव मे नहि त मरैत अछि, नहिये पाप सँ बन्हाइत अछि। मनुष्य अहंकृत भाव सँ मात्र फँसल अछि आर ओ अहंकृत भाव वास्तव मे छहिये नहि, सिर्फ मानल टा गेल छैक। आर मानल गेल बात नहि मनला सँ छूटि जाइत छैक। यैह अहाँक, हमर आ सभक अनुभव केर बात भेल। तैँ एहि बात केँ मानि लियऽ जे शरीर हम नहि छी आर ई हमर नहि छी। शरीर अलग अछि आर हम अलग छी।

वसांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। (गीता २/२२)

जेना मनुष्य फाटल कपड़ा छोड़िकय नव कपड़ा धारण करैत अछि। तऽ कपड़ा ‘हम’ नहि होएत छैक, तहिना शरीर सेहो हम नहि छी आर ई हमर नहि छी। जँ हम आ हमरपन बढैत रहत जे हम पढि लेब, पण्डित बनि जायब आर हमर धन भऽ जायत, सम्पत्ति भेट जायत, परिवार भेट जायत – एहि तरहें जँ हम आ हमरपन बढैत रहत त शान्ति और सुख केर प्राप्ति नहि होयत। आर जतय अहंता-ममता छोड़ि देब त ओही क्षण ‘स शान्तिमधिगच्छति’ शान्ति केँ प्राप्त भऽ जायब। त प्रश्न छल जे –

शान्ति कोना भेटत?

अहंता-ममता बढाकय अशान्ति अहाँक स्वयं उजपाओल थिक। जतेक अहंता-ममता बेसी होयत, ओतेक अशान्ति बेसी होयत। आर अहंता-ममताक जखनहि त्याग केलहुँ कि तत्काल शान्ति भेट जायत।

‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२/१२)

सीधा सहज बात छैक, व्यवहार मे कहि दी जे जमीन, मकान, स्त्री, पुत्र, परिवार हमर छी; परन्तु भीतर सँ एहि सब मे ममता आर आसक्ति नहि राखू।

एकटा प्रसंग अबैत अछि जे एक बेर एक गोट साधु बाबा नगर मे भिक्षाटन कय केँ एकटा फूलबाड़ी मे बैसल छलाह, तऽ साँझक समय राजा ओतय एलाह आर साधु बाबा सँ पूछलनि जे एतय कोना बैसल छी? कुनु धर्मशाला या सराय मे जेबाक चाही। साधु बाबा कहलखिन जे ई सराइये त छी। राजा कहलखिन जे ई त हमर कोठी थिक। साधु बाबा कहलखिन, “अच्छा, त ई अहाँक कोठी थिक। एहि सँ पहिने के रहैत छलाह?” राजा कहलखिन – “हमर पिताजी रहैत छलाह।” ओहि सँ पहिने के रहैत छलाह? त कहलखिन जे दादाजी रहैत छलाह। हम सब एतय पीढी-दर-पीढी सँ रहैत आबि रहल छी। बाबा पूछलखिन, “कि अहाँ एहि मे सब दिन रहब?” राजा कहलखिन जे जाबत धरि हम जीवित छी, ताबत धरि हम रहब। फेर हमर बेटा रहत। साधु बजलाह, तखन फेर धर्मशाला या सराय केकरा कहल जाइत छैक? एक आयल, एक गेल, यैह न धर्मशाला होएत छैक। व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ – हमरा लोकनि केँ जे किछु भेटैत अछि, ओकर सदुपयोग करैत छी, ओहिपर अधिकार नहि जमेबाक अछि। कबीरदास शरीर केँ चादर मानिकय कहने छथि –

कबीरा चादर है झीनीं, सदा राम रस भीनी । 

फेर अन्त मे कहने छथि –

नौ दस मास बुनता लाग्या, मूरख मैली कीनी,

दास कबीर जुगति से जोड़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी ।

एकर अर्थ भेल जे शरीर मे हम-पन आ हमर-पन नहि करक अछि। एकर सदुपयोग अपन कल्याणक लेल करक अछि। एहि बात पकिया विचार कय ली जे ई शरीर, संसारक वस्तु, सामग्री सब संसारहि केर थिक आर संसारहि केर सेवाक लेल भेटल अछि। एकरा अपन नहि मानिकय संसारक मानब आर संसारहि केर सेवाक लेल मानबाक अछि। एहि सँ वस्तु सभक सदुपयोग हेतैक। मुदा अपन आ अपना लेल मानि लेब तऽ वस्तु सभक दुरुपयोग हेतैक। आर, दुरुपयोग सँ हम सब दण्डक भागी बनब। दण्ड भोगहे टा पड़त। एकरा अपन मानि लेला सँ लाभ तऽ कोनो हैत नहि, हानि धरि कोनो तरहक बाकी नहि रहि जायत। एहिपर अपन अधिकार जमायब, कब्जा करब – बेईमानी थिक आर ई बन्धन थिक। ई भगवानक छी, या संसारक छी, या प्रकृति केर छी, जेकर छी, ओकर मानी, तऽ ई मुक्ति थिक। भक्तियोग मे भगवानक छी, कर्मयोग मे संसारक छी आर ज्ञानयोग मे प्रकृतिक छी। अतएव एकरा अपन आ अपना लेल नहि मानी।

एकटा दोसर बात छैक जे हम एहि शरीर तथा वस्तु सब सँ सुख लेबय चाहैत छी। मुदा ई मानव-शरीर तथा एकर सामग्री सुख तथा भोगक लेल नहि भेटैत छैक।

‘एहि तन कर फल विषय न भाई’

ई त दोसर केँ सुख देबाक लेल आ दोसरक सेवाक लेल भेटल अछि। जँ सुख भोगय चाहैत छी त स्वर्ग मे जाउ, दुःख भोगक अछि त नर्क मे जाउ। सुख-दुःख दुनू सँ ऊँच उठलापर मात्र महान् आनन्द, महान शान्ति केर प्राप्ति होयत। मुदा जँ सुख चाहब त दुःख भोगहे टा पड़त। आर यदि सुखक कामना छोड़ि देब त महान् आनन्द आर महान् शान्ति भेटत। तैँ शान्तिक उपाय ई अछि जे शरीर हम नहि छी, शरीर, संसार हमर नहि अछि आर हमरा सेहो नहि अछि। हमरा दोसर सँ सुख लेबाक नहि अछि लेकिन दोसर केँ सुख देबाक टा अछि।

हरिः हरः!!