संस्कृत नीति श्लोक भाग १ – अर्थ सहित – अत्यन्त पठनीय आ मननीय

सरस्वती माताक पूजा-अर्चना भव्यता सँ सर्वत्र

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

बाल्यकाल मे संस्कृत पाठ सँ बहुत रास जीवनोपयोगी नैतिक शिक्षा भेटैत रहल अछि। प्राचीन परंपरा मे शिक्षाक अवधारणा संस्कृत केर समुचित ज्ञान होएत छल। कालान्तर मे देशक राजनीतिक स्थिति-परिस्थिति जेहेन बनैत गेल – तहिना आधुनिक शिक्षा प्रणालीक प्रवेश भेल ताहि मे संस्कृतक महत्व कतहु न कतहु पाछू छूटल अछि। एकर सुखद आ दुखद पक्ष पर भविष्य चिन्तन करत, व्यक्तिगत हमर विचार मे एहि सँ लाभक बजाय हानि अधिक भेल अछि आ विश्व समुदाय सेहो एहि बात केँ क्रमशः मनन करय लागल अछि। आइ जखन परमाणु युद्ध सँ विश्व मे महाप्रलयक संभावना सब केँ पता चलि गेल छैक ताहि अवस्था मे महाप्रलयक वैदिक परिकल्पना आ संस्कृत पाठ सब केँ अपन वरीयता स्वतः प्रमाणित करैत छैक। मैथिली जिन्दाबाद केर पाठक आ विशेष रूप सँ मैथिली पढनिहार-बुझनिहार लेल बेसी सँ बेसी उपयोगी द्रष्टव्य आलेख सब संकलन करैत आबि रहल छी। आइ नीतिश्लोक केर श्लोक आ अर्थ एतय राखि रहल छी।

श्रियः प्रसूते विपदः रूणद्धि, यशांसि दुग्धे मलिनं प्रमार्ष्टि ।

संस्कार सौधेन परं पुनीते, शुद्धा हि बुद्धिः किलकामधेनुः ॥

शुद्ध बुद्धि निश्चय कामधेनु समान होएछ, एहिसँ धन-धान्यक प्राप्ति होएत छैक आर भविष्य मे आबयवला केहनो आफद सँ बचबैत छैक। यश और कीर्तिरूपी दूध सँ मलिनता (दोष) केँ धोए दैत छैक। दोसरो केँ अपन पवित्र संस्कार सँ पवित्र करैत छैक। (एहि तरहें विद्या सब गुण सँ परिपूर्ण होएछ।)

शोको नाशयते धैर्य, शोको नाशयते श्रृतम्।

शोको नाशयते सर्वं, नास्ति शोक समो रिपुः॥

शोक केला सँ धैर्यक नाश होएत छैक। शोक सँ ज्ञानक नाश होएत छैक। शोक सर्वस्व नाश करैत छैक। तैँ शोक समान आन कोनो शत्रु नहि होएछ।

आर्ता देवान् नमस्यन्ति, तपः कुर्वन्ति रोगिणः।

निर्धनाः दानम् इच्छन्ति, वृद्धा नारी पतिव्रता॥

संकट मे पड़लाक बाद लोक भगवानक प्रार्थना करैत अछि, रोगी तप करबाक प्रयत्न करैत अछि, निर्धन व्यक्ति दान करबाक इच्छा करैत अछि आर वृद्ध स्त्री पतिव्रता होएत अछि। (लोक केवल परिस्थितिवश नीक बनबाक ढोंग टा करैत अछि। हेबाक ई चाही जे हर परिस्थिति मे एक समान नीक बनल रही।)

उपाध्यात् दश आचार्यः आचार्याणां शतं पिता।

सहस्रं तु पितृन् माता गौरवेण अतिरिच्यते॥

आचार्य उपाध्याय (पुरहित) सँ दस गुना श्रेष्ठ होएत छथि। पिता सौ आचार्यक समान होएत छथि। आर, माता पिता सँ हजार गुना श्रेष्ठ होएत छथि। (मनुस्मृति)

दूरस्थाः पर्वताः रम्याः वेश्याः च मुखमण्डने।

युध्यस्य तु कथा रम्याः त्रीणि रम्याणि दूरतः॥

पहाड़ दूर सँ बहुत सोहाओन देखाय दैछ। मुख विभूषित कयला उत्तर वेश्या सेहो सुन्दर देखाय दैछ। युद्ध केर खिस्सा सुनय मे खूब नीक लगैछ। आर ई तीनू चीज पर्याप्त अन्तर रखले सँ नीक लगैछ।

सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा।

शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम् बान्धवाः॥

सत्य हमर माय, ज्ञान हमर पिता, धर्म हमर भाय, दया समस्त सखा, शान्ति हमर पत्नी आ क्षमा हमर पुत्र – यैह छः गोट हमर बान्धव सब छथि।

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।

मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्॥

महान् व्यक्तिक मन मे जे विचार होएत अछि वैह ओ बजितो छथि आ ओकरे ओ कृति मे सेहो आनैत छथि। एकर बिपरीत नीच लोकक मनमे एक विचार रहैत अछि, बाजैत दोसर अछि आ करैत तेसर अछि।

न मर्षयन्ति चात्मानं संभवयितुमात्मना।

आदर्शयित्वा शूरास्तू कर्म कुर्वन्ति दुष्करम्॥

शूर (वीर) लोक केँ अपना मुंह सँ अपन प्रशंसा करब सहन नहि होएछ। ओ वाणी सँ प्रदर्शन नहि कय दुरुह कार्य कय केँ वीरता सिद्ध करैत छथि।

चलन्तु गिरयः कामं युगान्तपवनाहताः।

कृच्छेरपि न चलत्येव धीराणां निश्चलं मनः॥

युगान्तकालीन हवाक झोंक सँ पर्वत भले चलय लागय, मुदा धैर्यवान पुरुषक निश्चल हृदय केहनो संकट मे नहि डगमाएत अछि।

एकेन अपि सुपुत्रेण सिंही स्वपित निर्भयम्।

सह एव दशभिः पुत्रैः भारं वहति गर्दभी॥

सिंहीन केँ जँ एकटा बच्छो होएत छैक त ओ आराम करैत अछि, कियैक तँ वैह बच्छा ओकरा समयपर भक्ष्य (भोजन) सेहो आनिकय दैत छैक। मुदा गधिन केँ दस टा बच्चा भेलोपर अपन भार ओकरा स्वयं वहन करय पड़ैत छैक।

विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।

व्याधितस्योषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥

विद्या प्रवासक समयक मित्र छी। पत्नी अपन घर मे मित्र छी। रोगसँ ग्रस्त शरीर लेल औषधि मित्र छी। मृत्युक बाद धर्म अपन मित्र छी।

अधर्मेणैथते पूर्व ततो भद्राणि पश्यति।

ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति॥

कुटिलता आ अधर्म सँ मानव क्षणिक समृद्धि आ संपन्नता पबैत अछि। नीक दैवयोगक सेहो अनुभव करैत अछि। शत्रु पर सेहो विजयी प्राप्त करैत अछि। मुदा अन्त मे ओकर समूल नाश होयब सुनिश्चित अछि। (खोप सहित कबुतराय नमः!)

क्रमशः – भाग २ मे….

सरस्वती पूजाक हार्दिक शुभकामना – वर दे वीणाधारिणी वर दे, विद्या बुद्धि विवेकसँ भर दे!! जय माँ!!

हरिः हरः!!