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प्रवीण नारायण चौधरी

रामचरितमानस मोतीः कौसल्या सुनयना-संवाद, श्री सीताजीक शील

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती कौसल्या सुनयना-संवाद, श्री सीताजीक शील १. सब गोटे कहि रहल छथि जे हम एहि सुखक योग्य नहि छी, हमरा एहेन कतय भेटत? दुनू समाज केँ श्री रामचन्द्रजीक चरण मे सहज स्वभावहि सँ प्रेम छन्हि। एहि तरहें सब कियो मनोरथ कय रहल छथि। हुनका लोकनिक प्रेमयुक्त वचन सुननिहारोक मोन रामचरितमानस मोतीः कौसल्या सुनयना-संवाद, श्री सीताजीक शील

रामचरितमानस मोतीः जनकजीक पहुँचब, कोल किरातादिक भेंट, सभक परस्पर मिलाप

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती जनकजीक पहुँचब, कोल किरातादिक भेंट, सभक परस्पर मिलाप १. ताहि समय सब कियो प्रेम मे मग्न रहथि। एतबे मे मिथिलापति जनकजी केँ अबैत सुनि सूर्यकुल रूपी कमल केर सूर्य श्री रामचन्द्रजी सभा सहित आदरपूर्वक तुरन्त उठिकय ठाढ़ भ’ गेलाह। भाइ, मंत्री, गुरु आर पुरवासी लोकनि केँ संग लय रामचरितमानस मोतीः जनकजीक पहुँचब, कोल किरातादिक भेंट, सभक परस्पर मिलाप

रामचरितमानस मोतीः श्री राम-भरतादिक संवाद

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती श्री राम-भरतादिक संवाद १. पहिने भरतक विनती आदरपूर्वक सुनि लिअ, फेर ओहि पर विचार करू। तखन साधुमत, लोकमत, राजनीति आर वेद केर निचोड़ (सार) निकालिकय ओहि मुताबिक कयल जाउ। गुरु वशिष्ठजी श्री रामजी केँ बुझबैत ई बात कहलखिन। २. भरतजी पर गुरुजीक स्नेह देखिकय श्री रामचन्द्रजीक हृदय मे रामचरितमानस मोतीः श्री राम-भरतादिक संवाद

मिथिला पर्यटन क्षेत्र परिचय: पाण्डव कृष्णधाम समस्तीपुर

मिथिलाक धरोहर: पाण्डव कृष्णधाम, पाँड – समस्तीपुर विदित हो जे मिथिलाक हर डेग पर एकटा न एकटा ऐतिहासिक धरोहर आइयो कोनो न कोनो अवस्थामे विद्यमान अछि। चूँकि मिथिलाक लोककेँ वर्तमान बिहार राज्य केर व्यवस्थापन मे पलायन मजबूरी छैक, तखन धरोहरक रक्षा केनाय एक चुनौतीक विषय छैक। एखन मित्र राकेश सिंह (आसनसोल) सँ कहलैथ जे हुनकर मिथिला पर्यटन क्षेत्र परिचय: पाण्डव कृष्णधाम समस्तीपुर

कखन बुझब जे अहाँक लेखन परिश्रम सफल भ’ रहल अछि

लेख के सार्थकता लेख/पोस्ट* के सार्थकता पाठक पाबिकय होइत छैक। लाइक-कमेन्ट के आधार पर पोस्ट के सार्थकता कदापि नहि बुझब। सिर्फ ई देखियौक जे अहाँ या हमर या केकरो पोस्ट कतेक बेर पढ़ल जाइत छैक आ पढ़निहार के आचरण आ व्यवहार मे ओकर प्रभाव कतेक दूर तक पड़ैत छैक अथवा पड़ि सकैत छैक। यदि लिखिकय कखन बुझब जे अहाँक लेखन परिश्रम सफल भ’ रहल अछि

अभियानक सफलता लेल सार्थक योगदान आवश्यक

अभियानक फुल – कागज के या असली? एकटा कहावत छै न ओ हिन्दीवला – ‘खुश्बू आ नहीं सकती है कागज के फूलों से’? ई कहावत छै आ कि शायरीक हिस्सा, जे हो, लेकिन बहुत बच्चे सँ हमरा पर ई गहींर छाप छोड़ने अछि। किनको मोन हुए त कनी पूरा लिखि देब। किदैन त कहय छय… अभियानक सफलता लेल सार्थक योगदान आवश्यक

रामचरितमानस मोतीः वन मे राम-भरतकेँ वशिष्ठजी द्वारा सम्बोधन

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती श्री वशिष्ठजीक सम्बोधन १. भरतजी गुरुक चरणकमल मे प्रणाम कय आज्ञा पाबि बैसि रहलाह। ताहि समय ब्राह्मण, महाजन, मंत्री आदि समस्त सभासद सेहो ओतहि जुटि गेलाह। श्रेष्ठ मुनि वशिष्ठजी समयोचित वचन बजलाह – “हे सभासद लोकनि! हे सुजान भरत! सुनू। सूर्यकुल के सूर्य महाराज श्री रामचन्द्र धर्मधुरंधर और रामचरितमानस मोतीः वन मे राम-भरतकेँ वशिष्ठजी द्वारा सम्बोधन

मशाल लेने चलैत अग्रदूतः मैथिली साहित्यकार रामलोचन ठाकुर पर प्रदीप बिहारी

लेख – प्रदीप बिहारी मशाल लेने चलैत अग्रदूत राम लोचन ठाकुर माटिपानिक एकटा एहन कवि, कथाकार, अनुवादक, सम्पादक आ रंगकर्मी छथि, जिनक रचनाक कण-कणसं मातृभूमि आ मातृभाषाक प्रति अनुराग छिटकैत अछि। जें मिथिला आ मैथिलीक सर्वांगीण विकास हेतु आग्रह छनि, तें मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक प्रति सरकारी उपेक्षाक विरोध सेहो हिनक रचनामे पाओल जाइत अछि। मशाल लेने चलैत अग्रदूतः मैथिली साहित्यकार रामलोचन ठाकुर पर प्रदीप बिहारी

रामचरितमानस मोतीः वनवासी द्वारा भरतजीक मंडली केर सत्कार, कैकेइ केर पश्चाताप

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती वनवासी द्वारा भरतजीक मंडली केर सत्कार, कैकेइ केर पश्चाताप १. भरि पोखरि कमल फुलायल अछि। जलपक्षी सब कूजि रहल अछि। भमरा सब गुंजार कय रहल अछि। रंग-बिरंगक चिड़ैयाँ आ जंगली जानवर सब वैररहित भ’ विहार कय रहल अछि। २. कोल, किरात आर भील आदि वन मे रहयवला लोक रामचरितमानस मोतीः वनवासी द्वारा भरतजीक मंडली केर सत्कार, कैकेइ केर पश्चाताप

रामचरितमानस मोतीः भरतजीक मन्दाकिनी स्नान, चित्रकूट पहुँचनाय, भरतादि सभक परस्पर मिलाप, पिताक शोक आर श्राद्ध

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती भरतजीक मन्दाकिनी स्नान, चित्रकूट पहुँचनाय, भरतादि सभक परस्पर मिलाप, पिताक शोक आर श्राद्ध १. लक्ष्मणजी, श्री रामचंद्रजी और सीताजी देवता लोकनिक वाणी सुनि बहुते सुख पओलनि जेकर वर्णन नहि कयल जा सकैत अछि। एम्हर भरतजी समूचा समाजक संग पवित्र मंदाकिनी मे स्नान कयलनि। पुनः सब लोक केँ नदीक रामचरितमानस मोतीः भरतजीक मन्दाकिनी स्नान, चित्रकूट पहुँचनाय, भरतादि सभक परस्पर मिलाप, पिताक शोक आर श्राद्ध