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प्रवीण नारायण चौधरी

रामचरितमानस मोतीः श्री सीताहरण एवं श्री सीताविलाप

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती श्री सीताहरण एवं श्री सीताविलाप १. रावण सून्न अवस्था देखिकय यति (संन्यासी) केर वेष मे श्री सीताजीक समीप आयल। जेकर डर सँ देवता आ दैत्य तक एतेक डराइत छथि जे राति केँ नीन्द नहि अबैत छन्हि आ दिन मे भरिपेट अन्न तक नहि खाइत छथि – वैह दस रामचरितमानस मोतीः श्री सीताहरण एवं श्री सीताविलाप

रामचरितमानस मोतीः मारीच प्रसंग व स्वर्णमृग रूप मे मारीचक मारल गेनाय, सीताजी द्वारा लक्ष्मण केँ पठेनाय

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती मारीच प्रसंग व स्वर्णमृग रूप मे मारीचक मारल गेनाय, सीताजी द्वारा लक्ष्मण केँ पठेनाय १. रावण सँ फेर मारीच ओकर पूजा कयकेँ आदरपूर्वक पुछलक – हे तात! अहाँक मोन कोन कारणे एतेक बेसी व्यग्र अछि आर अहाँ असगरे कियैक आयल छी? भाग्यहीन रावण सम्पूर्ण कथा अभिमान सहित मारीचक रामचरितमानस मोतीः मारीच प्रसंग व स्वर्णमृग रूप मे मारीचक मारल गेनाय, सीताजी द्वारा लक्ष्मण केँ पठेनाय

‘हम आबि रहल छी’ – मैथिली धारावाहिक भाग १०

साहित्यः मैथिली उपन्यास ‘हम आबि रहल छी’ – रबीन्द्र नारायण मिश्र हम आबि रहल छी – भाग दस 10 देखिते-देखिते लोकक करमान लागि गेल । लोककेँ देखि हम जोर-जोरसँ हाकरोस करए लगलहुँ । गौआँसभ मुखिआक गट्टा पकड़लक । ओहीमेसँ केओ युवक ओकर झोरा छिनि लेलक । सभ एतबे कहैक – “जरूर तूँ किछु गलत काज ‘हम आबि रहल छी’ – मैथिली धारावाहिक भाग १०

खोंइछ : मिथिलाक एकटा पुरान बिध

संस्कृति-परम्परा साभारः मिथिला धरोहर एवं सुजीत मिश्र केर फेसबुक पोस्ट (दहेज मुक्त मिथिला) खोंइछ : मिथिलाक एकटा पुरान बिध मिथिलाक एकटा पुरान परंपरा जे पता नै कहिया सं चलि आबि रहल अछि ‍- एहि परंपराक शुरुआत होइत अछि जहन लड़की बियाहक बाद पहिल बेरा दुरागमन भऽ सासुर जाइत अछि तऽ माँ हुनकर आंचर मे अरवा खोंइछ : मिथिलाक एकटा पुरान बिध

रामचरितमानस मोतीः सुपनेखाक रावण लग पहुँचब आ सीताजीक अग्नि प्रवेश व माया सीता

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती सुपनेखाक रावण लग जायब, श्री सीताजीक अग्नि प्रवेश और माया सीता १. खर-दूषण केर विध्वंस देखि सुपनेखा (शूर्पणखा) जा कय रावण केँ भड़केलक। ओ बहुत क्रोध कयकेँ वचन बाजल – “तूँ देश आर खजाना केर सुधिये बिसरा देलह।” करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर रामचरितमानस मोतीः सुपनेखाक रावण लग पहुँचब आ सीताजीक अग्नि प्रवेश व माया सीता

मिथिला के हर गाम छय सुन्दर – बचाउ एहि ठामक सब धरोहर

मिथिलाक धरोहर – प्रवीण नारायण चौधरी अभियान विशेष – दहेज मुक्त मिथिला मिथिला के हर गाम छय सुन्दर बचाउ एहि ठाम के सब धरोहर   ई नारा थिकैक ‘दहेज मुक्त मिथिला’ अभियान के। हम सब निर्णय कएने रही, कएने छी जे अगबे ‘दहेज हंटाउ, बेटी बचाउ’ आदिक खोखला नारा नहि लगेबाक अछि, बल्कि मनुष्यक चरित्र मिथिला के हर गाम छय सुन्दर – बचाउ एहि ठामक सब धरोहर

धियापुताक खेल – मिथिला तहिया आ आइ

अपन मिथिलाक ई सुन्दर खेल किनका-किनका स्मृति मे बनल अछि?   जहिया ई खेलाइत रही ताहि समय मे एकर महत्व भले नहि बुझि सकल होइ, आइ अहाँ जरूर बुझैत होयब जे एहि खेल सँ कि-कि ज्ञान भेटैछ, केना-केना बुद्धि बढैछ, कतेक लाभदायक अथवा कतेक बोरिंग आ समय खर्च करयवला नुक्सानदेह।   ई एकटा ‘विम्ब’ थिक धियापुताक खेल – मिथिला तहिया आ आइ

रामचरितमानस मोतीः सुपनेखाक कथा आ खरदूषणादिक वध

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती सुपनेखा (शूर्पणखा) केर कथा आ खरदूषणादिक वध १. सुपनेखा (शूर्पणखा) नाम के रावण केर एक बहिन छल जे नागिन समान भयानक आ अत्यन्त दुष्ट हृदय के रहय। एक बेर पंचवटी मे गेल आ दुनू राजकुमार केँ देखिकय कामातुर (विकल) भ’ गेल। २. काकभुशुण्डिजी कहैत छथि – हे गरुड़जी! रामचरितमानस मोतीः सुपनेखाक कथा आ खरदूषणादिक वध

रामचरितमानस मोतीः रामजीक दंडकवन मे प्रवेश, जटायु मिलन, पंचवटी निवास तथा श्री राम-लक्ष्मण संवाद

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती रामजीक दंडकवन मे प्रवेश, जटायु मिलन, पंचवटी निवास तथा श्री राम-लक्ष्मण संवाद १. अगस्त्य मुनि श्री रामजी केँ आगू कहैत छथि – “हे प्रभो! एकटा परम मनोहर आर पवित्र स्थान अछि पंचवटी। हे प्रभो! अपने दण्डक वन जतय पंचवटी अछि तेकरा पवित्र करू। श्रेष्ठ मुनि गौतमजीक कठोर श्राप रामचरितमानस मोतीः रामजीक दंडकवन मे प्रवेश, जटायु मिलन, पंचवटी निवास तथा श्री राम-लक्ष्मण संवाद

रामचरितमानस मोतीः राक्षस वध केर प्रतिज्ञा, सुतीक्ष्णजीक प्रेम, अगस्त्य मिलन व संवाद

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती राक्षस वध केर प्रतिज्ञा करब, सुतीक्ष्णजीक प्रेम, अगस्त्य मिलन, अगस्त्य संवाद १. ऋषि-मुनि केँ राक्षस सब द्वारा खा लेबाक प्रसंग सुनि श्री रामजी अपन हाथ उठाकय प्रण कयलनि जे हम पृथ्वी केँ राक्षस सँ रहित कय देब। फेर समस्त मुनि लोकनिक आश्रम सब मे जा-जा कय हुनका सब रामचरितमानस मोतीः राक्षस वध केर प्रतिज्ञा, सुतीक्ष्णजीक प्रेम, अगस्त्य मिलन व संवाद